भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास दृढ़ उपासना, थापी बिश्वा बीश १८७
रसिक अनन्यन की रहनि, रस उपासना भाव ।
चरणदास सबही कहै, सुन उपजै चितचाव १८८
पापी अधम अनेक को, कियो जक्तसों पार ।
चरणदास सन्मुख हरी, पहुँचा ये कर प्यार १८६
बहु जीवनको वपु सहित, कृष्ण ले गये धाम ।
चरणदास की दया सों, मिलो महल बिश्राम १६०
बहुतन को संसार में, श्री हरि दिये मिलाय ।
चरणदास ने सबन की, बिगरी दई बनाय १६१
आचारज को रूप धर, जग में प्रगटे आय ।
चरणदास निज कृष्णहो, दरसन दिये कराय १६२
निर्धन जनको धन दियो, पुत्र हीन सन्तान ।
सबको मन वांछित कियो, चरणदास भगवान १६३
बंधन में जो जन परे, तिनको दिये छुड़ाय ।
मृतक जिवाये बहुत से, महिमा कही न जाय १६४
ज्ञान योग वैराग को, जग में कियो प्रचार ।
कीनो भगवत् धर्म को, चरणदास बिस्तार १६५
ग्रन्थ भक्तिसागर सरस, बानी पांच हजार ।
महाराज बरनन करी, प्रेम भक्ति भंडार- १६६
जोग ज्ञान वैराग को, वरनो विविधि प्रकार ।
अरु गायो निज धामको, अनुपम नित्य बिहार १६७
खंडन मंडन मतन को, कियो न श्री महाराज ।
गीता अरु भागवत मत, बिरचो धर्म जहाज १६८
जो बांचै नित नेमसों, बानी परम पुनीत ।
पावे परमानन्द सुख, धाम् जाय जग जीत १६६
सुन समझे दृढ़ उरधरे, करनी करे जु कोय ।