भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा । २३
सदा सहायक जनन के, मण्डन सन्त समाज १७४
लोक और परलोक के, सुखदायक सिरमौर ।
व्यापिरहै सब विश्व में, भीतर बाहर ठौर १७५
भक्तन के मन भावने, रसिकन के रिझवार ।
प्रेमिन के प्रभु प्राण प्रिय, चरणदास सरकार १७६
शिष्यन के संशय हरन, सेवक जन प्रतपाल ।
आश्रित जन रक्षा करन, श्री रणजीत दयाल १७७
प्रगट भये संसार में, दूर करन भुव भार ।
धर्म सनातन भागवत, चहूँ दिशिकरन प्रचार १७८
जिज्ञासू जन मुमुक्षु, चरण शरण लइ आय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, श्रीहरि दिये मिलाय १७६
सेवा में ठाड़ी सदा, अष्टसिद्धि नव निधि ।
चरणदास दाता बड़े, जग में भए प्रसिद्धि १८०
रंकन को राजा किये, दिये मुल्क अरु माल ।
चरणदास चरणन परे, सो सब हुवे निहाल १८१
भूत भविष्य वर्तमान के, त्रिकालज्ञ महाराज ।
चरणदास की दयासों, सुधरे सब के काज १८२
दै दै परचय विविधिविधि, कलिजिय किये सचेत ।
चरणदास विश्वास दे, प्रगटायो हरि हेत १८३
भगवत धर्म प्रचार हित, लियो अवनि अवतार ।
चरणदास तारण तरण, अधम उधारण हार १८४
चार धाम सातोंपुरी, तीरथ क्षेत्र सुठौर ।
चरणदास बहु रूपधर, रमें रसिक सिर मौर १८५
घर घर सेवा श्याम की, राग भोग रसखान ।
चरणदास की दया सो, भक्ति करी भगवान १८६
पुरुषोत्तम परमात्मा, अवतारी जगदीश ।