भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ब्रजचरित्रवर्णन ३
वाराहसंहिता में जो गायो । सो मैं भाषा बीच बनायो ॥
गोवर्धन महिमा अति भारी । चरणदास ताके बलिहारी ॥
जाकी महिमा सबनैं गाई । जहां कृष्ण नित गऊचराई ॥
खरिकै बनाय धेनु जहाँ राखी । अजहूं चिह्न देत हैं साखी ॥
दो०—गोवर्धन बिनती करूं, मो बिनती सुनिलेहु ।
जगतफांस सों काढ़िकरि, भक्तिदान मोहिं देहु ॥
हाटकरूप अडोल खरारी । जाकी शरण रही ब्रज सारी ॥
तादिन इन्द्र कोप पठायो । सकल मेघ झुकि ब्रजपर आयो ॥
करपल्लवैं पर गिरि हरि धारो । तबहीं शरण रहो ब्रज सारो ॥
दिव्यदृष्टि बिन दृष्टि न आवै । कञ्चनरूप पुराण बतावै ॥
मथुरामण्डल में गिरि सोई । मथुरामण्डल अब सुनिलोई ॥
चौरासी कोशी परमाना । मथुरामण्डल ब्यास बखाना ॥
हरिके चरण सदा जो परसै । कृष्णरूप में निशि दिन सरसै ॥
सखासंग लीये हरि डोलैं । सखियन के सँग करत कलोलैं ॥
दो०—सदा कृष्ण ब्रजमें रहें, मोहिं मिलत हैं नाहिं ।
लहर महर कबहूं करें, आनि गहैं मोरी बाहिं ॥
जामें बारह वन बड़भागी । बारह उपवन हैं अनुरागी ॥
जिनमाहीं हरि वेणु बजावैं । मधुर मधुर बाँके सुरगावैं ॥
चौथै पदको है वह स्वामी । सब जीवन को अन्तरयामी ॥
भक्तन हेतु रहें ब्रजमाहीं । गुप्त रहें वृन्दावन ठाहीं ॥
फिरत रहें सबही वन सुन्दर । अन्तर बन्यो रास को मन्दर ॥
जगत दृष्टि सों रहें अलोपा । मिलिहैं ताहि ध्यान जिनरोपा ॥
मथुरामण्डल परगट नाहीं । परगट है सो मथुरा नाहीं ॥
मथुरामण्डल यही कहावै । दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै ॥
१ गौओंके रहनेका स्थान २ अंगुली ॥