भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १७
चहों ओर ठाड़ी सखी, मनहुँ प्रेम की माल ६७
चमर मोर छल अरु छरी, लिये खरी कोइ बाल ।
इतरदान लीने कोऊ, कोउ कर लिये रुमाल ६८
पानदान लेकर कोऊ, कोउ फूलन की माल ।
कोउ दरपन अरपन करत, छविलखि होत निहाल ६६
सन्मुख श्यामा श्याम के, खड़े सखिन के वृन्द ।
इकटक निरखत युगलको, मनहुँ चकोरी चंद १००
सखी रास रस करन को, बजवत बीन मृदंग ।
कोउ सितार कोउ सरंगी, कोउ बजात मुहचंग १०१
मधुर मजीरा कोउ अली, लिये बजावत संग ।
कोऊ अलापत सप्तस्वर, हिय में भरी उमंग १०२
कोउ उघटत सांगीतअली, नृतत गति नव ढंग ।
भाव बतात नचात दृग, लचकावत कटि अंग १०३
जै जै जुगल किशोर कहि, कोऊ रही हरषाय ।
गोदन भर अति मोद मन, सुमन रही वरषाय १०४
चरणदास तहां अपन का, देखे सखी सरूप ।
नव यौवन सुकुमार तन, नख शिख सुंदर रूप १०५
सिंहासन के सन्निकट, रही दोऊ कर जोर ।
तब हँसि बोले श्री हरिः, चितय चपल दृगकोर १०६
अब नीके लखि लीजिये, लीला रास विलास ।
सुख रासी दासी चरन, आव हमारे पास १०७
चरणदासि कर गहि उठे, श्री मत गोपीनाथ ।
पुनि लालन निरतन लगे, प्राण प्रिया लै साथ १०८
वाम अंग श्री राधिका, दहिने चरणहिदासि ।
मध्य बिहारी लाल जू, नृतत उमँगि हुलासि १०६
चहों ओर आली नचत, मंडल गोल बनाय ।