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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 690 में से

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पृष्ठ 37

६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाकी महिमा सबहुन गाई । रास करें जहाँ कुँवर कन्हाई ॥
जमुना जहाँ परिक्रमा दीन्ही । गुप्तपिया की लीला चीन्ही ॥
गोपसुता जहाँ नित उठि न्हाई । वर पूरण पायो कुँवर कन्हाई ॥
श्यामरङ्ग निर्मल जल गहरी । वृन्दावनके ढिगढिग लहरी ॥
आसा मनसाकरि कोइ न्हावै । सहस सुरसुरी को फल पावै ॥
दिव्य वृन्दावन दिव्य कलिन्द्री । देखे सो जीतै मन इन्द्री ॥
किनार निकट वृक्षनकी छाहीं । आयपरी जमुनाजल माहीं ॥
दो० भक्ति बिना पावै नहीं, वृन्दावन की संध ।
बिन पाये निन्दा करै, भोंदू मूरुख अंध ॥
मिलमिल शुभकी उठत तरंगा । बोलत दादुर अरु सुरभंगा ॥
कालीदह महिमा सुनु भ्राता । सहस गंगके फलकी दाता ॥
विहार* घाट बसि भजन करीजै । जेहिसेवन जमजवाब न दीजै ॥
वंशीवट बसि हठ इमि कीजै । तजै देह जब दर्शन लीजै ॥
अब सुनु वृन्दावन की बतियां । शीतल करी हमारी छतियां ॥
वनघन कुञ्जलता छबिछाई । झुक टहनी धरणी पर आई ॥
करत मंद समीर पयाना । बसत सुगन्ध सबै अरघाना ॥
बरसत अमृत फूही सुहाई । निकसत कोमल गोभगुहाई ॥
दो० वृन्दावन में रहत हैं, ज्ञानी गुणी अतीत ।
वृन्दावन को ना मिलें, कोऊ लहत जगजीत ॥
नित बसन्त जहँ सुगन्ध सुरारी । चलतमन्द जहाँ पवनसुखारी ॥
पुहुप विकसि रहे रङ्ग बिरङ्गा । लेत वास गुंजत सुरभृङ्गा ॥
बोलत भँवर महाध्वनि गाजें । मानो अनहदकी गति साजें ॥
जुगुनू दमकि चमकि चक्रावैं । समय जानिकर हर्ष बढ़ावैं ॥
प्रथमपाठ * विहर ।