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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

सर्वोपनिषद् वर्णन । १४३
जीव जु अन्तःकरणके, चारौ देवत संग ।
सूक्ष्म देही साथही, देखै स्वप्ना रंग ॥
चौदहही सब लीनहै, जीव आतमा माहिं ।
यही सुषुप्ति जानिये, कछु भी सूझै नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तीन अवस्था मिटैं मिटैऽहंकार है ।
तुरियाही रहिजाय जु तत्व अपार है ॥
परमातम जो पुरुष सदा निर्लेव है ।
केवल ज्ञान स्वरूप जु ब्रह्म अभेव¹ है ॥
अब कोठों की बात कहूं चितदीजिये ।
जुदा जुदा विस्तार सबै सुनिलीजिये ॥
पहला कोठा कहूँ अन्नसेती भरो ।
छह कोठे तेहि माहिं सोई श्रवणन धरो ॥
तीन पिताकी ओर सो लाया संगही ।
बीरज मींगी हाड़ सफ़ेद जु रंगही ॥
अब माता के अंश तीनिहीं जानिये ।
लोह त्वचा अरु मांस अरुण पहिचानिये ॥
प्रानसे कोठा भरा दशौ जहां वायु है ।
अगले भी छः कहे जु रहे समाय है ॥
तीजा कोठा जानि धरो तहँ शुद्धिही ।
मन चित अरु अहंकार भरी जहँ बुद्धिही ॥
चौथा कोठा देख इन्हीं का जानना ।
तामें भरो है ज्ञान सभी को पिछानना ॥
पाँचवाँ कोठा जानि जो आनंद सों भरा ।
१ जो न जानाजाय ॥

१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सगरो वृक्ष बीजमाहीं धर्रा ॥
दो० चारौ कोठे जो कहे, अरु कारण को देखि ।
जहाँ सभी ये रहत हैं, वा ठौरी को पेखि ॥
वा ठौरी को जानिये, ज्यों तरुवर को बीज ।
डाल पात फल फूलही, रहै जु वाके बीच ॥
ऐसे वाको समझिकै, रहै जु आनँद आहि ।
आनँदही आनँद भरा, पाँचवें कोठे मांहि ॥
अष्टपदी ॥
आतम करता जानु जु जामें बुधि रहै ।
दुख सुख वाही माहिं सभी आशा गहै ॥
इच्छा पूरी भये होत मन मोद¹ है ।
जब पूरी नहिं होय घना दुख होत है ॥
दुख सुख दोनों होत जो पांचन के बिषे ।
सो वे इन्द्री जान बिना इनके कसे ॥
सरवन² सों सुनि शब्द बुरा भल को यही ।
और त्वचा सों जान सपँर्श³ कि होयही ॥
आंखन सों लखि होय जु रूप कुरूपसों ।
अरु जिह्वा सो होय जु षटरँस स्वाद सों ॥
नासासेती होय बुरी भलि गंध ले ।
इनसे उतपति होय जु दुख सुख भै अभै ॥
आतम को जीवातम इस कारण कहैं ।
सूक्ष्म⁵ अरु अस्थूल⁶ देह संगही रहैं ॥
बुरे भले जो करमन के फल में बँधा ।


१ आनन्द २ कान ३ छूना ४ खट्ठाखारी मीठा करुवा चरफरा कपैल
५ हलका ६ मोटा ॥

सर्वोपनिषद्वर्णन । १४५
बीचहि लिया लगाय नहीं धुरसों फँधा ॥
ज्यों कञ्चन के संग जु टांका जानिये ।
१धौले बस्तर साथ जु मैल पिछानिये ॥
शोधे से है दूर शुद्ध है जात है।
अपनेहिं अङ्गन आय जु श्वेत दिखात है ॥
जीवातम इहि भांति फलन त्यागन करै ।
आतमहीं रहिजाय जीवता ना रहै ॥
खोटे कर्म जु त्यागि भले सहजै करै ।
तिनका फल जो होय नहीं आशा धरै ॥
दौ० जीव ब्रह्म यों होत है, रहै न कछू लगाव ।
चरणदास यों कहत हैं ऐसा किये उपाव ॥
अष्टपदी ॥
देह को जाननहारा ऐसे मानई ।
सूक्ष्म अरु अस्थूल को अपनी जानई ॥
कबहुँ कहै मम शीश आंख मुख हाथ है ।
कभी बतावै पांव कहै मेरा गात है ॥
मन बुद्धि चित-अहङ्कार समझ ये चार हैं ।
अरु पांचों है वायु जु कोइ निहार है ॥
प्राण अपानहि व्यान उदान समान हैं ।
सात्त्विक राजस तामस तीनों जानि हैं ॥
वैर प्रीति अरु तीसरि इनकी द्वूँद्व है ।
चौथा मनोरथ तौनिक सब मिलि झुंड है ॥
भले बुरे जो कर्म और मन आनिये ।
सूक्ष्म शरीर को मूल ये सब पहिचानिये ॥
१ सफेद ॥

:१४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु यह सूक्ष्म शरीर आतमा साथ' जो ।
ताते भासतं सत्य सत्य है बात सो ॥-
जब आतम पहिंचान हिये में आवई ।
तब सूक्ष्म को सांच सबै उठि जावई ॥
दो० सूक्ष्म शरीररु आतमा, भिन्न लखै नहिं कोय ।
यही जु मन की गांठ है, खुले मुक्ति ही होय ॥
जाने जाननहारही, और तीसरी जान ।
इन तीनों को जो लखै, सो साक्षी परधान२ ॥
उपजै तीनों द्वैत सों, मिटै एकता होय ।
उपजन मिटना तीनका, जानै न्यारा सोय ॥
अपनेही परकाश में, आप रहा परकास ।
सोई साक्षी जानिये, कहै चरणहीं दास ॥
यद्यपि बन्धन में बँधा, कहै जु निर्बंध दूर ।
चींटी ब्रह्मा आदिलौं, हिरदय में भरपूर ॥
सबही हिरदय के मिटे, वही एक ठहराय ।
ना कुछ आया ना गया, ज्योंका त्यों रहिजाय॥
बन्धन में आवै सही, लीला करन दयाल ।
निरबंधैं का निरबंध रहै, अजअबिनाशिअकाल॥
अंतर्यामी के अरथ, सब घट रहो समाय ।
जैसे डोरेके विषे, भांतिभांति मणिकाया॥
सबही के भीतर बसै, सबका जाननहार ।
वाहीते परगट भई, नाना वस्तु अपार ॥
घनेरूप किरिया घनी, घनेनाम दृष्टान्त५ ।
१ दिखात २ मुख्य 'जाननेवाला ३ जो बँधा हुआ न हो ४ मणि
समूह ५ मिसाल ॥

सर्वोपनिषद्वर्णन । १४७
सूझ ज्ञानप्रकाश सूं, जब गुरु मेटै आन्त१ ॥
रूप नाम किरियालगी, जबलग याके साथ ।
याहीते जी आतमा, कहलावै यह बात ॥
जैसे कञ्चन मृत्तिका, भांड़े किये संचार ।
नामरूप किरिया भई, देखो दृष्टि निहार ॥
रूपनाम किरिया मिटै, रहै न कछू विचार ।
जो था सोई रहगया, परमातम ततसार ॥
आतम अरु जीवात्मा, देह धरे से दोय ।
ताते बढ़ो उपाधही, मैं तू तू मैं होय ॥
तत्त्वम२सी जो यह कहा, ताको याहीं अर्थ ।
वह तूही हैं जानले, परम तत्त्व है सत्य ॥
अष्टपदी ॥
अरु वह ज्ञान स्वरूप अनन्द अनन्त है ।
उपजावन सब सृष्टि को जीवन कन्त है ॥
वस्तु काल अस्थान तीनों मिटि जातु है ।
वह एकरस सतरूप ब्रह्म रहिजातु है ॥
सब को जाननहार मिटै उपजै नहीं ।
तासूं कहैं वहि ज्ञान अर्थ जानो तहीं ॥
और कहैं जु अनन्त सो यासूं जानिये ।
सब भांड़े में इक माटी जु पिछानिये ॥
कनक के बरतन बहुत जु सोना एकिये ।
सब बसनन के माहिं जु सूतहि देखिये ॥
ऐसेहि आदिरु अन्त ब्रह्म सब माहिं है ।
कहिये याहि अनन्त भेद कछु नाहिं है ॥
१ हृदय का संदेह २ वेदान्त ॥

१४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु जो आनँद कहै समझ लीजो वही ।
वाही को अंश पिछान जु आनँद हो कही ॥
ऐसेही मोहिं समझायो गुरु शुकदेव ने ।
चरणहिंदासा होय लखो या भेवने ॥
दो० चार पते ये ब्रह्म के, सत आनन्द अनन्त ।
चौथा ज्ञानस्वरूप है, कहैं वेद अरु सन्त ॥
अष्टपदी ॥
सर्व समय सब ठौर जु एकरस नित्त है।
तत्वंमसी के अर्थ वही तू सत्य है ॥
जब तू करिकै ज्ञान होय परब्रह्महीं ।
आपनहीं कूं पाय जाय सब भर्महीं ॥
मैं तू वह उठिजाय दूसरी वासही ।
आपकुव्यापक जान ज्यों शुद्ध अकासही ॥
अरु जानै निर्लेप सत्त अरु एकही ।
जब परमातम होय रूप नहिं रेखही ॥
माया याते कहैं भरम अरु अन्त है।
ज्ञान भये उठिजाय कछू न रहन्त है ॥
ज्यों रसरी को साँप भरम सूं मानिये ।
समझ लखा जब झूठी माया जानिये ॥
सांच सो लागै झूठ झूठ सच जान है।
माया यही सुभाव भरम अज्ञान है ॥
रसरी कूं कहैं सर्प जु अपने भरम सूं ।
ऐसेही जड़ कहत सनातन ब्रह्म कूं ॥
दो० झूठ जगत दीखत रह, दीखै ना सत ब्रह्म ।
१ मतलब २ वेदान्त ॥

सर्वोपनिषद्वर्णन । १४६
यही जु माया जानिये, यही तिमिर यहि भर्म ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सूं, कही चरणहीं दास ।
यह जु अथर्वणवेद की, सर्व उपनिषद भास ॥
इति सर्वउपनिषद् दूसरीसम्पूर्णम् ॥
अथतृतीयतत्त्वयोगउपनिषद्प्रारम्भः॥
अष्टपदी ॥
तीजी अरु जो कहूँ अथर्वणवेद की ।
तत्त्वयोग जिहि नाम गुपत १ ही भेद की ॥
अपने शिससूं कहा जु परजापत्ति २ ने ।
योगसार में कहूँ जु पावै तत्त्वने ॥
योगेश्वर कूं लाभ होय जाके किये ।
पढ़े पाप भजि जाय सुने राखे हिये ॥
निश्चय होवे मुक्त यही तू जानियो ।
चौथे पद लहै वास सांच करि मानियो ॥
बड़ा योगेश्वर विष्णु अधिक तप ज्ञान है ।
जाकी मायागूढ़ नहीं परमान है ॥
योगी करिकै योग सुज्योति निहारही ।
दीपक कीसी लोय लखै होय पारही ॥
सो वह विष्णु सरूप सबन के माहिं है ।
घट घट में भरपूर खाली कोई नाहिं है ॥
ऐसी ज्योति कुं छोड़ि और मन लावई ।
१ छिपा हुआ २ ब्रह्मा ॥

१५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
वै नर भोंदू जान जु कूर कहावई ॥
दो० दूध पिया जिन कुचनसूं, उनकूं मल सुख लेत ।
जन्म खोय खाली चलै, नारिनसूं करि हेत ॥
अष्टपदी ॥
जिस द्वारेसूं निकस जन्म जग में लिया ।
ताही में परवेश करन फिर मन किया ॥
वही नारिको रूप जु तासूं मां कही ।
लगे भार्या कहन जु अपने संग लई ॥
जाही पुरुष स्वरूप कुं कहते बापहो ।
फिर लगे पुत्तर कहन वाहोकूं आपही ॥
वही पुत्र जो जगत में पिता कहावई ।
सोई पुत्तर भया बढ़ो अति चावई ॥
जैसे कूप का रहंट लोट रीते भरे ।
वस्तु एकही जान कभी ऊपर तरे ॥
याही भरम अज्ञानसूं आशाही दहै ।
बहुलोकन के माहिं सदा भरमत रहै ॥
अब मैं कहूँ उपाय जगतसूं ज्यों छुटै ।
आवागमन का फंद शिताबीही कटै ॥
जासूं भरमैं नाहिं रहै थिर होयकै ।
पावै निज अस्थान बिपति सब खोयकै ॥
दो० ॐकार बड़ नाम है, हिरदै ध्यान करै ।
शुकदेव कहैं चरणदाससूं, सबही ब्याधि टरै ॥
अष्टपदी ॥
ॐकार के अक्षर कहिये तीन हैं ।
अकार उकार मकार, जानै परवीन¹ हैं ॥
१ बुद्धिमान् ॥

तत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५१
तीनों अक्षर माहँ तीनों हैं थोकही ।
पहले अक्षर में जु रहै भू लोकही ॥
दूजे अक्षर बीच जानौ आकाशही ।
तीजे अक्षर माहिं वैकुंठ निवासही ॥
तीनों अक्षर माहिं जो तीनों वेद हैं ।
ऋग्यजुवेदरु साम तिहूं जो भेद· हैं ॥
तीनों अक्षर माहिं तिहूँ जो देव हैं ।
ब्रह्मा विष्णु महेश बड़े · जो अभेव हैं ॥
तीनप्रकार कि अग्नि तीन अक्षर महीं ।
एक अग्नि यह जान दिखै प्रत्यक्ष हीं ॥
दूजी अग्नि प्रचंड सूर्य की भासई ।
तृतिय अग्नि सब माहिं जठर परकासई ॥
तीनों गुण तिनमाहिं समझ जानौ यही ।
रजगुण सतगुण और तमोगुण है सही ॥
दो० अक्षर ॐकार को, जिनका चौथा भाग ।
अर्द्धमात्रा बोलिये, ऊपर बिन्दी लाग ॥
अष्टपदी ॥
जो कोउ याको जपै समझ अरु ध्याय है ।
ऊपर कही जो वस्तु सबन को पाय है ॥
अक्षर साढ़े तीन प्रणव के माहिं है ।
सब वस्तू वा माहिं वाह्य कछु नाहिं है ॥
ऐसे रह वा माहिं पुष्प में गंध ज्यों ।
जैसे तिल में तेल दूध में घीव त्यों ॥
जैसे पाहन³ माहिं जु कनक⁴ बताइये ।
१ ॐकार २ बाहर ३ पत्थर ४ सोना ॥
१०

१५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसेही ॐकार में सबको पाइये ॥
वाही को किये ध्यान परमपद को लहै ।
वेद पुराणन माहिं साखि योंही कहै ॥
अब प्रणव का ध्यान जु देहुँ बतायकै ।
सबही याकी सूझ कहूँ समझायकै ॥
हिरदयही के माहिं जु कमल पिछानिये ।
ऊपरको है नाल नीच मुख जानिये ॥
वाही के छिद्र बीच रहत मनभूप है ।
कहैं चरणहीं दास जु भेद अनूप है ॥
दो० अक्षर ॐकार के, पहिला है जु अकार ।
ताहि कहे सों होत है, हिरदा शुद्ध विचार ॥
अष्टपदी ॥
दूजा जपै उकार कमल विकसैं कली ।
शनै शनै खुलिजाय बसै तामें १अली ॥
तीजा जपै मकार प्रकट हो नादही ।
सुनि सुनि आनँद होहि जु परम अगाधही ॥
अर्द्धमात्रा बन्दु सदा थिर जानिये ।
हलन चलन कछु नाहिं यही चित आनिये ॥
वामें मन ह्वै लीन ज्योति ह्वै जाति है ।
निर्मलहू अरु शुद्ध बिलौर की भांति है ॥
सूरज कीसी किरण महा उज्ज्वल वही ।
जोई करै वह ध्यान पुरुष पावै सही ॥
सब में ज्योति स्वरूप सकल भरपूर है ।
निकट निकट सों निकट दूरसों दूर है ॥
१ भ्रमर ॥

तत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५३
जो इसकाही ध्यान हृदय किया जापना ।
तौ करै मस्तक माहिं होय पारायना ॥
शीश में जब सिद्ध होय रोकै नौद्वारही ।
निकसन देवै वायु न काहू बारही ॥
दो० दोय पगण्डी बाँधिये, नीचे के दो द्वार ।
दोउ अंगूठे हाथ के, रोको सरवन बार ॥
अष्टपदी ॥
१तर्जनि अंगुली द्वऊ दृगन पर दीजिये ।
मध्यमें से दोउ नाक छेद बँद कीजिये ॥
अनामिका³ दोउ हाथ कि और कनिष्ठिका४ ।
होंठन को बंद करै जु नीके पुष्टका ॥
नासा के दोउ छेद एकही जित भये ।
दोउ भौंहन के बीच चरणदासा कहे ॥
निश्चय ताह बना रस देह कि जानिये ।
वाहीकी तौ ओर दृष्टि को तानिये ॥
महाकुम्भक इहि नाम इसी विधि साधिये ।
ध्यान किये होय मुक्ति यही अवरा५धिये ॥
इन्द्रिनहूँ के मारग को जो बंद करै ।
वायु विना घट६ माहिं यथा दीपक बरै ॥
होय घना परकाश इसी जो देह में ।
इसही ध्यान प्रताप मिलै जा गेहमें ॥
पावै चेतन शुद्धि किये इस योगही ।
१ अंगूठा के पासकी अंगुली की तर्जनी संज्ञा है २ तर्जनी के पासकी
अंगुली की मध्यमा संज्ञा है ३ चौथी अंगुली की अनामिका संज्ञा है ४ छगु-
नियाँको कहते हैं ५ सेइये ६ देह ॥

१५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कर्मन को है नाश मिटै मन रोगही ॥
दो० उपनिषदा पूरी भई, नाम योगही तत्त्व ।
अंग अथर्वणवेद की, चरणदास कहि सत्त्व ॥
इति तृतीयतत्त्वयोग उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथयोगशिखाउपनिषद् चतुर्थ
प्रारम्भः ॥
दो० योगशिखा चौथी कहूँ, तामें अद्भुत ध्यान ।
परज'पति ऐसे कही, शिष्य सुनो दै कान ॥
अष्टपदी ॥
यामें अद्भुत राह बड़ेही ज्ञानकी ।
कांपन लागै देह कठिन सुनि ध्यानकी ॥
जब आवै मनमाहिं मोह तन ना रहै ।
पांचनहीं की आग नहीं हियमें दहै ॥
वाकी विधि मैं कहूं सभी सुनि लीजिये ।
बैठि एकांतहि ठौर जु आसन कीजिये ॥
आसनपद्म ³ लगाय कि सुख आसन करौ ।
सीधो राखै मेर नैन नासा धरौ ॥
दोउ पावन के साथ जु हाथ मिलाइये ।
सब स्वादन को रोंकि जो मनको लाइये ॥
प्रणवैही का जाप जु मनमें राखिये ।
१ ब्रह्मा २ काम क्रोध लोभ मद मात्सर्य्य ३ पल्थी मारकर बैठना स
को समेट कर उसको पद्मासन कहते हैं ४ ॐकार ।

योगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५५
इस बिन और उपाय सबनको नाखिये ॥
जाका है ॐनाम ध्यान ताका करै ।
आठपहर संग्राम बिना खांडे १ लरै ॥
देह यही अस्थूल बड़ा घर जानिये ।
तामें दीरघ थंभ एक पहिचानिये ॥
दो० अरु यामें नौ द्वार हैं, छोट थंभ हैं तीन ।
पांच २ देवता तेहि बिषे, लहैं साध परवीन ॥
यह घर जो मैंने कहा, सोइ पुरुपन की देह ।
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास सुनि लेह ॥
अष्टपदी ॥
एक बड़ा जो थंभ मेर ३ ही दंड है ।
सोइ पीठीका हाड़ जासु सब मंड है ॥
अरु वाहीके बीच नाड़ि सुषमन भली ।
सब नाड़िन शिरमौर योगी मानैं रली ॥
नौ द्वारे अब कहूं तिन्हें पहिचानिये ।
दो सरवन दो आंख भली विधि मानिये ॥
नासा छिद्र दोय जु मुखका एक है ।
लिंग गुदा दो जान नवोका लेखहै ॥
तीन जु छोटे थंभ तीन गुणहा कहे ।
सतगुण तमगुण और रजोगुणहीं लहे ॥
पांच देवता कहे सो पांचौ प्रान हैं ।
प्राणापानरु व्यान उदान समानहैं ॥
ऐसे मंदिर माहिं हृदय में छेद है ।
१ तलवार की सदृश्य २ प्राण अपान उदान व्यान समान ३-
कि पैरों से लगाकर पृष्ठभाग से मस्तक तक मिली हुई है ॥

१५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें सूरजमण्डल अचरज भेद है ॥
ताकी बड़ीही ज्योति किरण उजियारि है ।
पूरा योगी होय सो ताहि निहारि है ॥
दो० ज्योतिमयी मंडल लखै, हृदय कमल में होय ।
तामें दीखै और इक, दीवे की सी लोय¹ ॥
अष्टपदी ॥
दीपककीसी ज्योति मानु ऊपर बलै ।
रहै अपनीहीं ठौर भांति ऐसे हिलै ॥
वाही ज्योति को जानै ब्रह्म स्वरूपही ।
यही समझिकै ध्यान करै जु अनूपही ॥
योगी करै जो ध्यान यही हिय माहिंहीं ।
अंतसमय तन छूटि उपर को जाहिंहीं ॥
सूरजहू का मंडल जावै बेधही ।
सुषमन मारग जाय शीश को छेदही ॥
सायुज² मुक्तिको जाय परापत होयही ।
कोटिन माहों लहै जु बिरला कोयही ॥
सत्र ज्योतिन की ज्योति बड़ी जो ज्योतिहै ।
ताको पाये होय एकही गौत है ॥
आलस सों दुर्भाग्य ध्यान करि ना सकै ।
तौ दिनमें तिरकाल पाठ करनेलगै ॥
दो० प्रातकाल अरु मध्य में, संध्याही की बार ।
उपनिषदन तीनोंसमै, पढ़ै विचार विचार ॥
करम कटे यमही डटे, चौरासी हटजाय ।
देही पावै मनुषकी, पूरा गुरु मिलजाय ॥
१ लपक अर्थात् टेमि २ ब्रह्ममें लीन होजाना ॥

योगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५७
फिर पावै यह ध्यानही, पीछे कहा जु खोल ।
जावै परमहि धामकूं, छोड़ै सब झकझोल ॥
थोड़ासा यह ध्यानही, मैं समझायों तोहिं ।
परजापति शिष्यसोंकहै, बड़ा जो निश्चय मोहिं ॥
यह पदवी मोकूं मिली, इसी ध्यान परताप ।
जीवन मुक्ताही रहूं, छुटै आप अरु धाप ॥
निश्चल हो या ध्यानकूं, करै जो कोई और ।
जगत छुटै आपामिटै, पावै निरभय ठौर ॥
आनन्दहि आनन्द जहाँ, अवधिन काल कलेश ।
चरणदास या ध्यानसों, पावै ऐसा देश ॥
बहुलोकन में जन्मधरि, पाप मिटा नहिं भूर ।
चरणदास इस ध्यानसों, सबै होत है दूर ॥
दूर करन दुख जगत के, आन उपाव न होय ।
योगी कूं या ध्यानसम, और वस्तु नहिं कोय ॥
उपनिषदा चौथी यही, भई समापत येह ।
चरणदास कहैं पांचवीं, हित चितदै सुनिलेह ॥
इति योगशिखा चौथी सम्पूर्णम् ॥
अथ तेजविन्दउपनिषद्पांचवीं
प्रारम्भः ॥
दो० उपनिषदा जो पांचवीं, वेद अथर्वण माहिं ।
तेजविन्द जिहि नाम है, समझ मुक्ति होजाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तेजविन्दके; अर्थ यही हिय गूंध है।

१५८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
बड़े ध्यानके तेजहि की यह बूंद है ॥
उसका है यह ध्यान जो सबसे ऊंच है।
सबसूं पर निहरूप शुद्ध अरु शूच है ॥
हिरदयही के मध्य और सूक्ष्म महा ।
अरु केवल आनन्द किन्हीं ज्ञानी लहा ॥
अनंतशक्ति जिहिमाहिं निराअस्थूल है।
बहुत पिण्ड ब्रह्मांड सबनका मूल है ॥
बड़ा विना परमान गहा नहिं जात है।
वाकि तपस्या ध्यान कउन जु दिखात है ॥
वाका देखन दुलभ सुलभ नहिं जानना ।
वह तौ समुद अथाह कछू परमान ना ॥
ज्ञानी पण्डित और सबै बुद्धिवानहीं ।
पावैं आदि न अन्त और मध्यानहीं ॥
कै बांधै ब्रह्मव्रत करै कै ध्यानहीं ।
वाही के हो रूप पावै तब जानहीं ॥
दो० जीतै पहिल अहारही, दूजे और किरोध ।
बहु मनुषों का संग तजि, छांड़ै प्रीति विरोध ॥
अष्टपदी ॥
परबल इन्द्री जान सवनकूं वश करै ।
शीत उष्ण दुख सुख स्तुति निन्दा हरै ॥
छोड़ै ही अहंकार वासना आसही ।
अपने कारण वस्तु रखै नहिं पासही ॥
पूरी राखै पैज धारणा धारिकै ।
गुरुआज्ञा गुरु सेव करै जु विचारिकै ॥
सकल मनोरथ कामना कूं करै क्षीनहीं ।

तेजबिन्दुउपनिषद्‌वर्णन । १५६
ऐसे जिज्ञासूकूं चाहिये द्वारे तीनहीं ॥
एक जो द्वारा त्याग दुजा जो उपावही ।
तीजा गुरु की निश्चय ऐस सुभावही ॥
इन द्वारों में राह जु आगे की खुलै ।
लुटै थकै वह नाहिं सुखालाही चलै ॥
जीवातम जों हंस कहावत है यही ।
याके हैं स्थान जो तीनोंहीं सही ॥
जाग्रत स्वपन सुषोपत परगट जानिये ।
तुरिया निज अस्थान गुप्त पहिंचानिये ॥
दो० इन तीनों से बड़ा है, तुरिया कूं नितजान ।
चरणदास पोषण¹ जगत, वाके ना अस्थान ॥
अष्टपदी ॥
जैसे भूत अकाश यों व्यापक ह्वै रहो ।
सब इन्द्रिन के माहिं जो सूक्ष्म जो रहो ॥
वाकी सत्तासेती चेतनहीं रही ।
वही बड़ापद जान विष्णु का है सही ॥
वाके नेत्र हैं तीन जो तीनों वेदही ।
अरु वाके गुण² तीन जो किया न खेदही ॥
है सबका आधार³ त्रिलोकी धारई ।
आप रहै निरधार⁴ जो अपरमपारई ॥
है निहरूप अडोल अखंड अगाधही ।
है तौ निस्सन्देह पहुँचे न उपाधही ॥
करि न सकै परवेश वरण गुण रूपही ।
— १ पालन करनेवाला २ सत रज तम ३ धारण कियाजाय ४ जो न धारण
कियाजाय ॥

१६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु सब गुण वा माहिं जु अधिक अनूपही ॥
पावै केवल¹ ज्ञानसुं , आप में आपही ।
वावन अक्षर माहिं नाम नहिं थापही ॥
वह तौ निर आनन्द काहु से है नहीं ।
कठिन परापत होय सुलभ देखै नहीं ॥
दो० वह उपजै विनशै नहीं, अज² अविनाशीसोय ।
बिन इच्छा थिरही रहै, चरणदास नित जोय ॥
अष्टपदी ॥
वह सबही को विराट पिण्ड अरु जीव है ।
नाना कौतुक होयं अन्त वहि सीव है ॥
ज्ञान से जुदा न जान निरा वह ज्ञान है ।
वही महा आकाश नहीं परमान है ॥
सबमाहीं परवेश जो आतम सत्त है ।
आपमें पूरण आप परमही तत्त है ॥
अज्ञानी जानै झूठ झूंठ पहुचै नहीं ।
वह तौ सदा नित जान कभी विनशै नहीं ॥
वाकूं कहा नहिं जाय जाप जापक कभी ।
अरु सारे हैं जाप उसी माहीं सभी ॥
और जपाभीगया जाप जापक वही ।
सबकुछ उसकूं जान गुप्त³ परगट सही ॥
वह निर्गुण निर्लिप्त कोई गुण नाहिनै ।
परसूं पर तापरै जानिले वाहनै ॥
वासूं पर नहिं और विचारा जायना ।
कहैं चरणहींदास कछू वा माहिंना ॥


१ सूक्ष्म २ जो पैदा न हो ३ छिपाहुआ ॥

तेजविन्दूपनिषद्वर्णन । १६१
दो० वाकूं जाग्रत है नहीं, वाकूं स्वप्न न कोय ।
सोवन स्वप्ना है नहीं, जाग्रत कैसे होय ॥
अष्टपदी ॥
दुऔ से न्यारा जान जाग्रत अरु स्वप्नसूं ।
ऐसा कोई नाहिं न जानै सत्तहूँ ॥
सबका जानत मूल जु ज्ञानी लोयही ।
दीरघ अरु परकाशी जानै सबको यही ॥
जाकूं लोभ न होय अविद्या^१ होयना ।
भै अभिमान कुकर्म वासना कोयना ॥
गरमी जाड़ा भूख प्यासं व्यापै नहीं ।
पह्ये क्रोध न मोह नेक वामें कहीं ॥
वाहन इच्छा होय न पूरी चाहहीं ।
कुल विद्या अभिमान न उनके माहिहीं ॥
मान नहीं अपमान न मन में लावई ।
सबसूं होय निवृत्त ब्रह्मकूं पावई ॥
तेजविन्द उपनिषद् संपूर्णही भई ।
गुरु शुकदेव के दास चरणदासा कही ॥
ताहि सुनै मनराखि विचाराही करै ।
निश्चय होवै मुक्त जगत में ना परै ॥
दो० कही गुरू शुकदेव ने, मेरी कछू न बुद्धि ।
पढ़ो नहीं मूरख महा, मोकूं नेक न शुद्धि ॥
मेरे हिरदय के बिषे, भवन^२ कियो गुरु आय ।
वई विराजत हैं सदा, मेरी देह दिखाय ॥
जबसूं गुरु किरपाकरी, दर्शन दीन्हों मोय ।
१ माया २ घर ॥

१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम रोम में वै रमे, चरणदास नहिं कोय ॥
जातिवरणकुलमनगया, गया देह अभिमान ।
अपने मुखसों कह कहौं, जगही करै बखान ॥
रहे गुरू शुकदेवजी, मैं मैं गई नशाय ।
मैं तैं तैं मैं वही है, नखशिखरहो समाय ॥
इति श्रीचरणदासकृतपंचोपनिषद् संपूर्णम् ॥
अथ चरणदासजीकृत भक्तिपदार्थ
प्रारम्भः ॥
दो० प्रणवों श्रीमुनि व्यासजी, मम हिरदय में आय ।
भक्तिपदारथ कहत हूं, तुम्हीं करौ सहाय ॥
प्रेम पगावन ज्ञान दे, योग जितावन हार ।
चरणदास की बीनती, सुनियो बारंबार ॥
तुम दाता हम माँगता, श्रीशुकदेव दयाल ।
भक्ति दई ब्याधा गई, मेटे जग जंजाल ॥
किसू कामके थे नहीं, कोऊ न कौड़ी देह ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, भई अमोलक देह ॥
को है कोई न जानता, गिनती में नहिं नाँवँ ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, पूजन लागे पावँ ॥
सीधी पलक न देखते, छूते नाहीं छाहिं ।
गुरु शुकदेव कृपा करी, चरणोदक लेजांहिं ॥
दूसरे के बालकहुते, भक्ति बिना कंगाल ।
१ उपद्रव ॥