भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु सब गुण वा माहिं जु अधिक अनूपही ॥
पावै केवल¹ ज्ञानसुं , आप में आपही ।
वावन अक्षर माहिं नाम नहिं थापही ॥
वह तौ निर आनन्द काहु से है नहीं ।
कठिन परापत होय सुलभ देखै नहीं ॥
दो० वह उपजै विनशै नहीं, अज² अविनाशीसोय ।
बिन इच्छा थिरही रहै, चरणदास नित जोय ॥
अष्टपदी ॥
वह सबही को विराट पिण्ड अरु जीव है ।
नाना कौतुक होयं अन्त वहि सीव है ॥
ज्ञान से जुदा न जान निरा वह ज्ञान है ।
वही महा आकाश नहीं परमान है ॥
सबमाहीं परवेश जो आतम सत्त है ।
आपमें पूरण आप परमही तत्त है ॥
अज्ञानी जानै झूठ झूंठ पहुचै नहीं ।
वह तौ सदा नित जान कभी विनशै नहीं ॥
वाकूं कहा नहिं जाय जाप जापक कभी ।
अरु सारे हैं जाप उसी माहीं सभी ॥
और जपाभीगया जाप जापक वही ।
सबकुछ उसकूं जान गुप्त³ परगट सही ॥
वह निर्गुण निर्लिप्त कोई गुण नाहिनै ।
परसूं पर तापरै जानिले वाहनै ॥
वासूं पर नहिं और विचारा जायना ।
कहैं चरणहींदास कछू वा माहिंना ॥
१ सूक्ष्म २ जो पैदा न हो ३ छिपाहुआ ॥