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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

योगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५५
इस बिन और उपाय सबनको नाखिये ॥
जाका है ॐनाम ध्यान ताका करै ।
आठपहर संग्राम बिना खांडे १ लरै ॥
देह यही अस्थूल बड़ा घर जानिये ।
तामें दीरघ थंभ एक पहिचानिये ॥
दो० अरु यामें नौ द्वार हैं, छोट थंभ हैं तीन ।
पांच २ देवता तेहि बिषे, लहैं साध परवीन ॥
यह घर जो मैंने कहा, सोइ पुरुपन की देह ।
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास सुनि लेह ॥
अष्टपदी ॥
एक बड़ा जो थंभ मेर ३ ही दंड है ।
सोइ पीठीका हाड़ जासु सब मंड है ॥
अरु वाहीके बीच नाड़ि सुषमन भली ।
सब नाड़िन शिरमौर योगी मानैं रली ॥
नौ द्वारे अब कहूं तिन्हें पहिचानिये ।
दो सरवन दो आंख भली विधि मानिये ॥
नासा छिद्र दोय जु मुखका एक है ।
लिंग गुदा दो जान नवोका लेखहै ॥
तीन जु छोटे थंभ तीन गुणहा कहे ।
सतगुण तमगुण और रजोगुणहीं लहे ॥
पांच देवता कहे सो पांचौ प्रान हैं ।
प्राणापानरु व्यान उदान समानहैं ॥
ऐसे मंदिर माहिं हृदय में छेद है ।
१ तलवार की सदृश्य २ प्राण अपान उदान व्यान समान ३-
कि पैरों से लगाकर पृष्ठभाग से मस्तक तक मिली हुई है ॥