भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५७
फिर पावै यह ध्यानही, पीछे कहा जु खोल ।
जावै परमहि धामकूं, छोड़ै सब झकझोल ॥
थोड़ासा यह ध्यानही, मैं समझायों तोहिं ।
परजापति शिष्यसोंकहै, बड़ा जो निश्चय मोहिं ॥
यह पदवी मोकूं मिली, इसी ध्यान परताप ।
जीवन मुक्ताही रहूं, छुटै आप अरु धाप ॥
निश्चल हो या ध्यानकूं, करै जो कोई और ।
जगत छुटै आपामिटै, पावै निरभय ठौर ॥
आनन्दहि आनन्द जहाँ, अवधिन काल कलेश ।
चरणदास या ध्यानसों, पावै ऐसा देश ॥
बहुलोकन में जन्मधरि, पाप मिटा नहिं भूर ।
चरणदास इस ध्यानसों, सबै होत है दूर ॥
दूर करन दुख जगत के, आन उपाव न होय ।
योगी कूं या ध्यानसम, और वस्तु नहिं कोय ॥
उपनिषदा चौथी यही, भई समापत येह ।
चरणदास कहैं पांचवीं, हित चितदै सुनिलेह ॥
इति योगशिखा चौथी सम्पूर्णम् ॥
अथ तेजविन्दउपनिषद्पांचवीं
प्रारम्भः ॥
दो० उपनिषदा जो पांचवीं, वेद अथर्वण माहिं ।
तेजविन्द जिहि नाम है, समझ मुक्ति होजाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तेजविन्दके; अर्थ यही हिय गूंध है।