भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेजबिन्दुउपनिषद्वर्णन । १५६
ऐसे जिज्ञासूकूं चाहिये द्वारे तीनहीं ॥
एक जो द्वारा त्याग दुजा जो उपावही ।
तीजा गुरु की निश्चय ऐस सुभावही ॥
इन द्वारों में राह जु आगे की खुलै ।
लुटै थकै वह नाहिं सुखालाही चलै ॥
जीवातम जों हंस कहावत है यही ।
याके हैं स्थान जो तीनोंहीं सही ॥
जाग्रत स्वपन सुषोपत परगट जानिये ।
तुरिया निज अस्थान गुप्त पहिंचानिये ॥
दो० इन तीनों से बड़ा है, तुरिया कूं नितजान ।
चरणदास पोषण¹ जगत, वाके ना अस्थान ॥
अष्टपदी ॥
जैसे भूत अकाश यों व्यापक ह्वै रहो ।
सब इन्द्रिन के माहिं जो सूक्ष्म जो रहो ॥
वाकी सत्तासेती चेतनहीं रही ।
वही बड़ापद जान विष्णु का है सही ॥
वाके नेत्र हैं तीन जो तीनों वेदही ।
अरु वाके गुण² तीन जो किया न खेदही ॥
है सबका आधार³ त्रिलोकी धारई ।
आप रहै निरधार⁴ जो अपरमपारई ॥
है निहरूप अडोल अखंड अगाधही ।
है तौ निस्सन्देह पहुँचे न उपाधही ॥
करि न सकै परवेश वरण गुण रूपही ।
— १ पालन करनेवाला २ सत रज तम ३ धारण कियाजाय ४ जो न धारण
कियाजाय ॥