भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम रोम में वै रमे, चरणदास नहिं कोय ॥
जातिवरणकुलमनगया, गया देह अभिमान ।
अपने मुखसों कह कहौं, जगही करै बखान ॥
रहे गुरू शुकदेवजी, मैं मैं गई नशाय ।
मैं तैं तैं मैं वही है, नखशिखरहो समाय ॥
इति श्रीचरणदासकृतपंचोपनिषद् संपूर्णम् ॥
अथ चरणदासजीकृत भक्तिपदार्थ
प्रारम्भः ॥
दो० प्रणवों श्रीमुनि व्यासजी, मम हिरदय में आय ।
भक्तिपदारथ कहत हूं, तुम्हीं करौ सहाय ॥
प्रेम पगावन ज्ञान दे, योग जितावन हार ।
चरणदास की बीनती, सुनियो बारंबार ॥
तुम दाता हम माँगता, श्रीशुकदेव दयाल ।
भक्ति दई ब्याधा गई, मेटे जग जंजाल ॥
किसू कामके थे नहीं, कोऊ न कौड़ी देह ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, भई अमोलक देह ॥
को है कोई न जानता, गिनती में नहिं नाँवँ ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, पूजन लागे पावँ ॥
सीधी पलक न देखते, छूते नाहीं छाहिं ।
गुरु शुकदेव कृपा करी, चरणोदक लेजांहिं ॥
दूसरे के बालकहुते, भक्ति बिना कंगाल ।
१ उपद्रव ॥