भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कर्मन को है नाश मिटै मन रोगही ॥
दो० उपनिषदा पूरी भई, नाम योगही तत्त्व ।
अंग अथर्वणवेद की, चरणदास कहि सत्त्व ॥
इति तृतीयतत्त्वयोग उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथयोगशिखाउपनिषद् चतुर्थ
प्रारम्भः ॥
दो० योगशिखा चौथी कहूँ, तामें अद्भुत ध्यान ।
परज'पति ऐसे कही, शिष्य सुनो दै कान ॥
अष्टपदी ॥
यामें अद्भुत राह बड़ेही ज्ञानकी ।
कांपन लागै देह कठिन सुनि ध्यानकी ॥
जब आवै मनमाहिं मोह तन ना रहै ।
पांचनहीं की आग नहीं हियमें दहै ॥
वाकी विधि मैं कहूं सभी सुनि लीजिये ।
बैठि एकांतहि ठौर जु आसन कीजिये ॥
आसनपद्म ³ लगाय कि सुख आसन करौ ।
सीधो राखै मेर नैन नासा धरौ ॥
दोउ पावन के साथ जु हाथ मिलाइये ।
सब स्वादन को रोंकि जो मनको लाइये ॥
प्रणवैही का जाप जु मनमें राखिये ।
१ ब्रह्मा २ काम क्रोध लोभ मद मात्सर्य्य ३ पल्थी मारकर बैठना स
को समेट कर उसको पद्मासन कहते हैं ४ ॐकार ।