भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेजविन्दूपनिषद्वर्णन । १६१
दो० वाकूं जाग्रत है नहीं, वाकूं स्वप्न न कोय ।
सोवन स्वप्ना है नहीं, जाग्रत कैसे होय ॥
अष्टपदी ॥
दुऔ से न्यारा जान जाग्रत अरु स्वप्नसूं ।
ऐसा कोई नाहिं न जानै सत्तहूँ ॥
सबका जानत मूल जु ज्ञानी लोयही ।
दीरघ अरु परकाशी जानै सबको यही ॥
जाकूं लोभ न होय अविद्या^१ होयना ।
भै अभिमान कुकर्म वासना कोयना ॥
गरमी जाड़ा भूख प्यासं व्यापै नहीं ।
पह्ये क्रोध न मोह नेक वामें कहीं ॥
वाहन इच्छा होय न पूरी चाहहीं ।
कुल विद्या अभिमान न उनके माहिहीं ॥
मान नहीं अपमान न मन में लावई ।
सबसूं होय निवृत्त ब्रह्मकूं पावई ॥
तेजविन्द उपनिषद् संपूर्णही भई ।
गुरु शुकदेव के दास चरणदासा कही ॥
ताहि सुनै मनराखि विचाराही करै ।
निश्चय होवै मुक्त जगत में ना परै ॥
दो० कही गुरू शुकदेव ने, मेरी कछू न बुद्धि ।
पढ़ो नहीं मूरख महा, मोकूं नेक न शुद्धि ॥
मेरे हिरदय के बिषे, भवन^२ कियो गुरु आय ।
वई विराजत हैं सदा, मेरी देह दिखाय ॥
जबसूं गुरु किरपाकरी, दर्शन दीन्हों मोय ।
१ माया २ घर ॥