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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 690 में से

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पृष्ठ 185

१५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
वै नर भोंदू जान जु कूर कहावई ॥
दो० दूध पिया जिन कुचनसूं, उनकूं मल सुख लेत ।
जन्म खोय खाली चलै, नारिनसूं करि हेत ॥
अष्टपदी ॥
जिस द्वारेसूं निकस जन्म जग में लिया ।
ताही में परवेश करन फिर मन किया ॥
वही नारिको रूप जु तासूं मां कही ।
लगे भार्या कहन जु अपने संग लई ॥
जाही पुरुष स्वरूप कुं कहते बापहो ।
फिर लगे पुत्तर कहन वाहोकूं आपही ॥
वही पुत्र जो जगत में पिता कहावई ।
सोई पुत्तर भया बढ़ो अति चावई ॥
जैसे कूप का रहंट लोट रीते भरे ।
वस्तु एकही जान कभी ऊपर तरे ॥
याही भरम अज्ञानसूं आशाही दहै ।
बहुलोकन के माहिं सदा भरमत रहै ॥
अब मैं कहूँ उपाय जगतसूं ज्यों छुटै ।
आवागमन का फंद शिताबीही कटै ॥
जासूं भरमैं नाहिं रहै थिर होयकै ।
पावै निज अस्थान बिपति सब खोयकै ॥
दो० ॐकार बड़ नाम है, हिरदै ध्यान करै ।
शुकदेव कहैं चरणदाससूं, सबही ब्याधि टरै ॥
अष्टपदी ॥
ॐकार के अक्षर कहिये तीन हैं ।
अकार उकार मकार, जानै परवीन¹ हैं ॥
१ बुद्धिमान् ॥