भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
बड़े ध्यानके तेजहि की यह बूंद है ॥
उसका है यह ध्यान जो सबसे ऊंच है।
सबसूं पर निहरूप शुद्ध अरु शूच है ॥
हिरदयही के मध्य और सूक्ष्म महा ।
अरु केवल आनन्द किन्हीं ज्ञानी लहा ॥
अनंतशक्ति जिहिमाहिं निराअस्थूल है।
बहुत पिण्ड ब्रह्मांड सबनका मूल है ॥
बड़ा विना परमान गहा नहिं जात है।
वाकि तपस्या ध्यान कउन जु दिखात है ॥
वाका देखन दुलभ सुलभ नहिं जानना ।
वह तौ समुद अथाह कछू परमान ना ॥
ज्ञानी पण्डित और सबै बुद्धिवानहीं ।
पावैं आदि न अन्त और मध्यानहीं ॥
कै बांधै ब्रह्मव्रत करै कै ध्यानहीं ।
वाही के हो रूप पावै तब जानहीं ॥
दो० जीतै पहिल अहारही, दूजे और किरोध ।
बहु मनुषों का संग तजि, छांड़ै प्रीति विरोध ॥
अष्टपदी ॥
परबल इन्द्री जान सवनकूं वश करै ।
शीत उष्ण दुख सुख स्तुति निन्दा हरै ॥
छोड़ै ही अहंकार वासना आसही ।
अपने कारण वस्तु रखै नहिं पासही ॥
पूरी राखै पैज धारणा धारिकै ।
गुरुआज्ञा गुरु सेव करै जु विचारिकै ॥
सकल मनोरथ कामना कूं करै क्षीनहीं ।