भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५३
जो इसकाही ध्यान हृदय किया जापना ।
तौ करै मस्तक माहिं होय पारायना ॥
शीश में जब सिद्ध होय रोकै नौद्वारही ।
निकसन देवै वायु न काहू बारही ॥
दो० दोय पगण्डी बाँधिये, नीचे के दो द्वार ।
दोउ अंगूठे हाथ के, रोको सरवन बार ॥
अष्टपदी ॥
१तर्जनि अंगुली द्वऊ दृगन पर दीजिये ।
मध्यमें से दोउ नाक छेद बँद कीजिये ॥
अनामिका³ दोउ हाथ कि और कनिष्ठिका४ ।
होंठन को बंद करै जु नीके पुष्टका ॥
नासा के दोउ छेद एकही जित भये ।
दोउ भौंहन के बीच चरणदासा कहे ॥
निश्चय ताह बना रस देह कि जानिये ।
वाहीकी तौ ओर दृष्टि को तानिये ॥
महाकुम्भक इहि नाम इसी विधि साधिये ।
ध्यान किये होय मुक्ति यही अवरा५धिये ॥
इन्द्रिनहूँ के मारग को जो बंद करै ।
वायु विना घट६ माहिं यथा दीपक बरै ॥
होय घना परकाश इसी जो देह में ।
इसही ध्यान प्रताप मिलै जा गेहमें ॥
पावै चेतन शुद्धि किये इस योगही ।
१ अंगूठा के पासकी अंगुली की तर्जनी संज्ञा है २ तर्जनी के पासकी
अंगुली की मध्यमा संज्ञा है ३ चौथी अंगुली की अनामिका संज्ञा है ४ छगु-
नियाँको कहते हैं ५ सेइये ६ देह ॥