सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

तत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५१
तीनों अक्षर माहँ तीनों हैं थोकही ।
पहले अक्षर में जु रहै भू लोकही ॥
दूजे अक्षर बीच जानौ आकाशही ।
तीजे अक्षर माहिं वैकुंठ निवासही ॥
तीनों अक्षर माहिं जो तीनों वेद हैं ।
ऋग्यजुवेदरु साम तिहूं जो भेद· हैं ॥
तीनों अक्षर माहिं तिहूँ जो देव हैं ।
ब्रह्मा विष्णु महेश बड़े · जो अभेव हैं ॥
तीनप्रकार कि अग्नि तीन अक्षर महीं ।
एक अग्नि यह जान दिखै प्रत्यक्ष हीं ॥
दूजी अग्नि प्रचंड सूर्य की भासई ।
तृतिय अग्नि सब माहिं जठर परकासई ॥
तीनों गुण तिनमाहिं समझ जानौ यही ।
रजगुण सतगुण और तमोगुण है सही ॥
दो० अक्षर ॐकार को, जिनका चौथा भाग ।
अर्द्धमात्रा बोलिये, ऊपर बिन्दी लाग ॥
अष्टपदी ॥
जो कोउ याको जपै समझ अरु ध्याय है ।
ऊपर कही जो वस्तु सबन को पाय है ॥
अक्षर साढ़े तीन प्रणव के माहिं है ।
सब वस्तू वा माहिं वाह्य कछु नाहिं है ॥
ऐसे रह वा माहिं पुष्प में गंध ज्यों ।
जैसे तिल में तेल दूध में घीव त्यों ॥
जैसे पाहन³ माहिं जु कनक⁴ बताइये ।
१ ॐकार २ बाहर ३ पत्थर ४ सोना ॥
१०