भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५१
तीनों अक्षर माहँ तीनों हैं थोकही ।
पहले अक्षर में जु रहै भू लोकही ॥
दूजे अक्षर बीच जानौ आकाशही ।
तीजे अक्षर माहिं वैकुंठ निवासही ॥
तीनों अक्षर माहिं जो तीनों वेद हैं ।
ऋग्यजुवेदरु साम तिहूं जो भेद· हैं ॥
तीनों अक्षर माहिं तिहूँ जो देव हैं ।
ब्रह्मा विष्णु महेश बड़े · जो अभेव हैं ॥
तीनप्रकार कि अग्नि तीन अक्षर महीं ।
एक अग्नि यह जान दिखै प्रत्यक्ष हीं ॥
दूजी अग्नि प्रचंड सूर्य की भासई ।
तृतिय अग्नि सब माहिं जठर परकासई ॥
तीनों गुण तिनमाहिं समझ जानौ यही ।
रजगुण सतगुण और तमोगुण है सही ॥
दो० अक्षर ॐकार को, जिनका चौथा भाग ।
अर्द्धमात्रा बोलिये, ऊपर बिन्दी लाग ॥
अष्टपदी ॥
जो कोउ याको जपै समझ अरु ध्याय है ।
ऊपर कही जो वस्तु सबन को पाय है ॥
अक्षर साढ़े तीन प्रणव के माहिं है ।
सब वस्तू वा माहिं वाह्य कछु नाहिं है ॥
ऐसे रह वा माहिं पुष्प में गंध ज्यों ।
जैसे तिल में तेल दूध में घीव त्यों ॥
जैसे पाहन³ माहिं जु कनक⁴ बताइये ।
१ ॐकार २ बाहर ३ पत्थर ४ सोना ॥
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