भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वोपनिषद्वर्णन । १४६
यही जु माया जानिये, यही तिमिर यहि भर्म ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सूं, कही चरणहीं दास ।
यह जु अथर्वणवेद की, सर्व उपनिषद भास ॥
इति सर्वउपनिषद् दूसरीसम्पूर्णम् ॥
अथतृतीयतत्त्वयोगउपनिषद्प्रारम्भः॥
अष्टपदी ॥
तीजी अरु जो कहूँ अथर्वणवेद की ।
तत्त्वयोग जिहि नाम गुपत १ ही भेद की ॥
अपने शिससूं कहा जु परजापत्ति २ ने ।
योगसार में कहूँ जु पावै तत्त्वने ॥
योगेश्वर कूं लाभ होय जाके किये ।
पढ़े पाप भजि जाय सुने राखे हिये ॥
निश्चय होवे मुक्त यही तू जानियो ।
चौथे पद लहै वास सांच करि मानियो ॥
बड़ा योगेश्वर विष्णु अधिक तप ज्ञान है ।
जाकी मायागूढ़ नहीं परमान है ॥
योगी करिकै योग सुज्योति निहारही ।
दीपक कीसी लोय लखै होय पारही ॥
सो वह विष्णु सरूप सबन के माहिं है ।
घट घट में भरपूर खाली कोई नाहिं है ॥
ऐसी ज्योति कुं छोड़ि और मन लावई ।
१ छिपा हुआ २ ब्रह्मा ॥