भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें सूरजमण्डल अचरज भेद है ॥
ताकी बड़ीही ज्योति किरण उजियारि है ।
पूरा योगी होय सो ताहि निहारि है ॥
दो० ज्योतिमयी मंडल लखै, हृदय कमल में होय ।
तामें दीखै और इक, दीवे की सी लोय¹ ॥
अष्टपदी ॥
दीपककीसी ज्योति मानु ऊपर बलै ।
रहै अपनीहीं ठौर भांति ऐसे हिलै ॥
वाही ज्योति को जानै ब्रह्म स्वरूपही ।
यही समझिकै ध्यान करै जु अनूपही ॥
योगी करै जो ध्यान यही हिय माहिंहीं ।
अंतसमय तन छूटि उपर को जाहिंहीं ॥
सूरजहू का मंडल जावै बेधही ।
सुषमन मारग जाय शीश को छेदही ॥
सायुज² मुक्तिको जाय परापत होयही ।
कोटिन माहों लहै जु बिरला कोयही ॥
सत्र ज्योतिन की ज्योति बड़ी जो ज्योतिहै ।
ताको पाये होय एकही गौत है ॥
आलस सों दुर्भाग्य ध्यान करि ना सकै ।
तौ दिनमें तिरकाल पाठ करनेलगै ॥
दो० प्रातकाल अरु मध्य में, संध्याही की बार ।
उपनिषदन तीनोंसमै, पढ़ै विचार विचार ॥
करम कटे यमही डटे, चौरासी हटजाय ।
देही पावै मनुषकी, पूरा गुरु मिलजाय ॥
१ लपक अर्थात् टेमि २ ब्रह्ममें लीन होजाना ॥