भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसेही ॐकार में सबको पाइये ॥
वाही को किये ध्यान परमपद को लहै ।
वेद पुराणन माहिं साखि योंही कहै ॥
अब प्रणव का ध्यान जु देहुँ बतायकै ।
सबही याकी सूझ कहूँ समझायकै ॥
हिरदयही के माहिं जु कमल पिछानिये ।
ऊपरको है नाल नीच मुख जानिये ॥
वाही के छिद्र बीच रहत मनभूप है ।
कहैं चरणहीं दास जु भेद अनूप है ॥
दो० अक्षर ॐकार के, पहिला है जु अकार ।
ताहि कहे सों होत है, हिरदा शुद्ध विचार ॥
अष्टपदी ॥
दूजा जपै उकार कमल विकसैं कली ।
शनै शनै खुलिजाय बसै तामें १अली ॥
तीजा जपै मकार प्रकट हो नादही ।
सुनि सुनि आनँद होहि जु परम अगाधही ॥
अर्द्धमात्रा बन्दु सदा थिर जानिये ।
हलन चलन कछु नाहिं यही चित आनिये ॥
वामें मन ह्वै लीन ज्योति ह्वै जाति है ।
निर्मलहू अरु शुद्ध बिलौर की भांति है ॥
सूरज कीसी किरण महा उज्ज्वल वही ।
जोई करै वह ध्यान पुरुष पावै सही ॥
सब में ज्योति स्वरूप सकल भरपूर है ।
निकट निकट सों निकट दूरसों दूर है ॥
१ भ्रमर ॥