भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
ज्ञानस्वरोदयवर्णन १२५
घट उपाधि सो जानिये, करत रहैं उतपाथ ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभको इन्द्री कान ।
नासा इन्द्री धरणि की, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचा सुइन्द्री वायु की, पावक इन्द्री नैन ।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय ।
चरणदास पांचौ कही, अग्नि तत्व सों जोय ॥
रक्त बिन्द कफ तीसरो, मेद मूत्र को जान ।
चरणदास परकिरत ये, पानी सों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहूं, रोम जान और मास ।
पृथ्वी की परकिरत ये, अन्त सबन को नास ॥
बल करना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भै, तत अकाश कौ भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकर निर्लिप्त · तू, देही जान अकार ।
आनि देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशो नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान ये, जानै जान सुजान ॥
१२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
पृथ्वी काल जो ठौर है, मुखै जानिये द्वार ।
पीलो रंग पहिंचानिये, पीवन खान अहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
जल को बासा भाल है, लिंग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, धौलो रंग निहार ॥
पवन नाभि में रहत है, नासा जानि दुआर ।
हरो रंग है वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीश में वास है, श्रवण दुआरो जान ।
शब्द कुशब्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीन सों जानिये, मैं मेरी जड़ मूल ॥
चितबुद्धि मन अहंकार जो, अन्तःकरण सुधार ।
ज्ञान अग्नि सों जारिये, करिकरि मीत विचार ॥
शब्द सपरसरु गन्ध है, अरु कहियत रस रूप ।
देह कर्म्म तनमात्रा, तू कहियत निहरूप ॥
निराकार अद्वै अचल, निर्बासी तू जीव ।
निरालम्ब निर्वैर सो, अज अविनाशी सीव ॥
वावों कोठा अग्नि को, दहिने जल परकास ।
मन हिरदय अस्थान है, पवन नाभि में वास ॥
मूल कमल दल चारको, लाल पॅखरी रङ्ग ।
गौरीसुत वासो कियो, छह्यै जाप इकङ्ग ॥
पटदल कमल पियरे वरण, नाभी तले संभाल ।
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२७
षट सहस्र जपि जापले, ब्रह्म सावि¹त्री नाल ॥
दशम पंखरी कमल है, नील वरण सो नाम ।
विष्णुलक्षिमी वासकिनो, षट सहस्र पर जाप ॥
अनहृद चक्र हृदय रहै, द्वादश दलऔर श्वेतं ।
षट सहस्र जपि जापले, शिव शक्ती जहाँ हेत ॥
षोड़शदल को कमल है, कण्ठ वास शशि रूप ।
जाप सहस्र जहाँ जपै, भेद लहै अति गूप ॥
अग्नि चक्र दो दलकमल, त्रिकुटी धाम अनूप ।
जाप सहस्र जहां जपै, पावै ज्योति स्वरूप ॥
दल हजार को कमल है, गगन मण्डल में वास ।
जाप सहस्र जहां जपै, तेज पुंज परकास ॥
जोग जुक्तिकरि खोजिले, सुरत निरत करचीन ।
दश प्रकार अनहद बजै, होय जहाँ लवलीन ॥
कुं० एक भंवर गुंजारसी दूजे घुंघुरू होय ।
तीजे शब्द जु शंखका चौथे घण्टा सोय ॥
चौथे घण्टा सोय पाँचवें, ताल जु बाजै ।
छठे सुमुरली नाद सातवें भेरि जु गाजै ॥
अठवें शब्द मृदंग का नाद नफीरी नोय ।
दसवें गरजनि सिंहसी चरणदास सुनि लोय ॥
दो० दश प्रकार अनहद घुरै, तजत जोगी होय लीन ।
इन्द्री थकि मनुआँ थकै, चरणदास कहि दीन ॥
'तीन बन्ध नौनाटिकाँ२, दशवाईं को जान ।
प्राण अपान समान है, और कहिदेत उदान ॥
'व्यानवायुऔरकिरकिरा, कूरम बाई जीत ।
१ शारदा २ नाड़ी ॥
१२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नाग धनंजय देवदत, दशवाईं रणजांत ॥
नवों द्वार को बन्ध करि, उत्तम नाड़ी तीन ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करैं परवीन ॥
करते प्राणायाम के, तिरगये पतित¹ अनेक ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुम्भक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगायकर, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकरि, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधि करि, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षट चक्कर को छेद ॥
जोग जुक्तिकै कीजिये, कै अजपा को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शरीर है, ब्राह्मण और राजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास औधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरत मिटे, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशा तजौ, तजौ मान और थाप ।
काया मोह विकार तजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानौ आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरत है, सो तू आपहि आप ॥
इच्छा दुई विसारिकर, होय न क्यों निर्वास ।
तूतौ जीवनमुक्त है, तजो मुक्ति की आस ॥
पवन भई आकाश सों, अग्नि वायुसों होय ।
१ पापी ॥
ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२६
पावक सों पानी भयों, पानी धरती सोय ॥
धरती मीठे स्वाद है, खारी स्वाद सुनीर ।
अग्नि चरपरो स्वाद है, खट्टो स्वाद समीर ॥
खट्टा मीठा चरपरा, खारी पर मन होय ।
जबहीं तत्त्व विचारिये, पांच तत्त्व में कोय ॥
स्वाद नाप ओर रंग है, और बताई चाल ।
पांच तत्त्वकी परख यह, साधि पाव ततकाल ॥
तिरकोनी पावक चले, धरती तौ चौकोर ।
शून्यस्वभाव अकाशको, पानी लांबो गोल ॥
अग्नि तत्त्व गुण तामसी, कही रजोगुण बाय ।
पृथ्वी नीर सतोगुणी, नभ है अस्थिर¹ भाय ॥
नीर चलै जब श्वास में, रण ऊपर चढ़ि मीत ।
वैरी को शिर काटकरि, घर आवै रणजीत ॥
पृथ्वी के परकास में, युद्ध करै जो कोय ।
दोउ दल रहैं बराबरी, हारि वायु मैं होय ॥
अग्नि तत्त्वके बहतही, युद्ध करन मति जाव ।
हारि होय जीतै नहीं, अरु आवै तन घाव ॥
तत अकाश में जो चलै, तौ ठाईं रहिजाय ।
रणमाहीं काया छुटै, घर नहिं देखै आय ॥
जल पृथ्वी के जोग में, गर्भ रहै सो पूत ।
वायु तत्त्व में छोकरी², आंबर सूतक सूत ॥
पृथ्वी तत्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप ।
धनवन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप ॥
अग्नि तत्त्व जब चलत है, कभी गरभ रहिजाय ।
१ न चलसकै २ लड़की ॥
१३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
गर्भ गिरे माता दुखी, हो माता मरि जाय ॥
वायु तत्त्व स्वर दाहिने, करै पुरुष जब भोग ।
गर्भ रहै जो तासमै, देही आवै रोग ॥
आसन संयम साधिकरि, दृष्टि श्वास के माहिं ।
तत्त्व भेद यों पाइये, बिन साधे कुछ नाहिं ॥
आसन पदम लगायकै, एक बरत नित साध ।
बैठे लेटे डोलते, श्वासाही आराध ॥
नाभि नासिकामाहिंकरि, सोहं सोहं जाप ।
सोई अजपा जाप है, छुटै पुण्य अरु पाप ॥
भेद स्वरोदय बहुत है, सूक्ष्म कह्यो बनाय ।
ताको समझिबिचारिले, अपनो चित मनलाय ॥
धरणि टरै गिरिवर टरै, ध्रुव टरै सुन मीत ।
वचन स्वरोदय ना टरै, कहै दास रणजीत ॥
शुकदेव गुरूकी दया सों, साधु दया सों जान ।
चरणदास रणजीत ने, कह्यो स्वरोदय ज्ञान ॥
छप्पै—डहरे में मेरो जनम नाम रणजीत पिछानो ।
मुरली को सुत जान जात दूसरि पहिंचानो ॥
बाल अवस्था माहिं बहुरि दिल्ली में आयो ।
रमत मिले शुकदेव नाम चरणदास धरायो ॥
जोग जुक्ति हरि भक्तिकरि ब्रह्मज्ञान दृढ़करि गह्यो ।
आतम तत्त्वविचारिकैअजपा में मन सनिरह्यो ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतज्ञानस्वरोदयसंपूर्णम्
हंसनाथउपनिषद्वर्णन । १३१
अथ श्रीचरणदासकृत पंचउपनिषद्
अथर्वणवेद भाषा प्रथम
हंसनाथलिख्यते ॥
दो० बन्दत श्री शुकदेव को, उनको हिय में लाय ।
छिप्यो भेद परगट कियो, परमारथ के दाय ॥
संस्कृत भाषा करि, ताको यह दृष्टान्त ।
खोलि खोलि सबही कही, समझै छूटै भ्रान्त¹ ॥
ज्यों कूंएं सों नीर लै, बाहर दियो भराय ।
विना यतन कोई पियो, तिरषावन्त² अघाय ॥
पो दीन्ही शुकदेव ने, मैं जल काढ़नहार ।
प्यासा कोइ न जाइयो, टेरों वारंवार ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शूद्रहु जो होय ।
वह पीवैगा हेत करि, बहु प्यासा जो कोय ॥
मुक्तिहु नीकी प्यास जो, काहूही को होय ।
और मनुष जग प्यास में, रहे जु मृतक होय ॥
यह जग ऐसो जानिये, मृगतृष्णा को नीर ।
निकट जाय प्यासा कोई, कभी न भागै पीर ॥
उनकी प्यास बुझै नहीं, होय नहा हिय चैन ।
ज्ञान सुधा तजि जात है, धोखे को जल लैन ॥
ज्ञान नीर तिरपत भये, निश्चल बैठे दास ।
संसारी प्यासे गये, पूरी भई न आस ॥
१ भ्रम २ पियासा ॥
१३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
संस्कृत था कूप सम, भाषा नीर निकास ।
प्याऊं जिज्ञासून को, तिनकीं भगै पियास ॥
अष्टपदी ॥
वेदहि की उपनिषद् जु मैं भाषा करी ।
जो कुछ था वहिमाहिं सोई जैसे धरी ॥
सुनि समझै मन माहिं, और करनी करै ।
आवागमन मिटाय नहीं देही धरै ॥
जगकी व्याधा¹ छूटि मुक्तिपद पावई ।
जाग्रत पहुँचे ठौर स्वप्न बिसरावई ॥
तिमिर² सभी भजिजाय उजारा होय है ।
सूझै आतम रूप द्वैँतता खोय है ॥
उपजै अति आनन्द द्वन्द दुख जाय है ।
तिरंपति निर्मलज्ञान विज्ञान अघाय है ॥
जोपै करै विचार और गुरुसों लहै ।
वाकी गहनी गहै और रहनी रहै ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सो चितते गाइया ।
चरणहिदासा होय सबन शिर नाइया ॥
दो० पूजे ऋषि मुनि देवता, पूजे इन्द्रहु भूप ।
पूजा सबही इष्ट को, देखा हरि के रूप ॥
सर्वत्रहि प्रभु देखिकरि, सबको शीश नवाय ।
उपनिषदैं जो वेद की, परगट कहीं बनाय ॥
अष्टपदी ॥
प्रथम प्रगट करी छिपेही भेदकी ।
हंस नामऽहंनाम अथर्वणवेद की ॥
१ दुःख २ अन्धकार ॥
हंसनादूउपनिषद्वर्णन । १३३
गौतमऋषि करि चाव ऋषीश्वर पै गये ।
संत सुजातजु नाम बहुत आदर किये ॥
गौतम स्तुति करी बहुतही प्रीति सों ।
फिरि पूंछी यह बात जु लघुता रीति सों ॥
परमेश्वर पहिंचान मोहि समुझाइये ।
मुक्तहोन के पन्थ सबै जु दिखाइये ॥
ह्वैकर बहुत प्रसन्न* ऋषीश्वर बोलिया ।
गौरा अरु महादेव की चरचा खोलिया ॥
सब देवन के देव महादेव हैं सही ।
उपनिषदें जो वेद कि गौरा सों कही ॥
सो मैं तुमसों कहौं प्रीति के भाव सों ।
तुमहूं नीके सुनौ अधिकही चाव सों ॥
गुप्त महा यह भेद हिये में राखिये ।
जो जड़ मूरख होय तासु नहिं भाखिये ॥
दो० हरिभक्ता अरु गुरुमुखी, तप करने की आस ।
सतसंगी सांचा यती१, ताहि देहु चरनदास ॥
अष्टपदी ॥
अब मैं कहौं संभाल सुरत ह्वां दीजिये ।
यह तौ अचरज कथा श्रवण सुनि लीजिये ॥
यही श्वास कहि हंस आय अरु जाय है ।
पूरा सतगुरु मिलै तौ भेद लखाय है ॥
जो कोउ याको समझि करै अरु ध्यानहीं ।
ऋद्धि सिद्धि सुखहोहिं जु उपजै ज्ञानहीं ॥
अन्त मुक्तिही होय अभैपद में रहै ।
१ योगी ॥
१३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुरौ जन्म न होय परम आनँद लहै ॥
अब मैं वरणौं हंस और परमहंसही ।
जो समझे है ब्रह्म जाय सब संशही ॥
हंस हंस जो मंत्र अर्थ पहिचानिये ।
वह मैंहूँ यों कहै निश्चय करि जानिये ॥
यह मंतर सब माहिं सदाही भरि रह्यो ।
कोटिन में कोई जानि ध्यान सोइ धरि रह्यो ॥
जैसे काठ में आगि तिलों में तेल है ।
तैसे सब घटमाहिं इसी का मेल है ॥
दो० दूध मध्यज्यों घीव है, मेहँदी माहीं रंग ।
यतन बिना निकसनहीं, चरणदास सो ढंग ॥
जो जानै या भेदकौं, और करै परवेश ।
सो अविनाशी होत है, छूटै सकल कलेश ॥
अष्टपदी ॥
तन मथने को यतन कहूँ अब जानिये ।
ज्यों निकसै ततसार विलोवन ठानिये ॥
पहिले चक्र जानि मूल द्वारे बिषे ।
जितही पाँव की एँडी सूं बन्ध दे रखे ॥
मूल चक्रसों खैंचि अपान चलाइये ।
दूजे चक्र पास जु आनि फिराइये ॥
दहिनी ओरसों तीनि लपेटे दीजिये ।
तीजे चक्र माहिं गमन फिरि कीजिये ॥
चौथे चक्र माहिं पवन जो लाइये ।
बहुरौ पाँचवें चक्र में जू पहुंचाइये ॥
षष्ठम चक्र माहिं जु तांहि चढ़ाइये।
हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३५
सो त्रिकुटी के मध्य तहां ठहराइये ॥
रोकै त्रिकुटी माहिं आनिके वायुको ।
षट्चक्र को भेदि चढ़ै जव धायको ॥
अपान वायु चढ़िजाय वहीं अस्थान है ।
प्रान वायु द्वै जाय साधु कोइ जान है ॥
रोकै प्रानहि वायु त्रिकुटी मध्यही ।
ओं का करै ध्यान शीश में मध्यही ॥
यह तौ ऊंचा ध्यान जु अधिक अनूपही ।
चरणाहदासा होय जु ब्रह्म स्वरूपही ॥
दो० नाम ब्रह्म का है नहीं, है तो ॐकार ।
जानै आपन को वही, मैं हौं तत्त्व अपार ॥
अष्टपदी ॥
अनहद शब्द अपार दूर सों दूर है ।
चेतन निर्मल शुद्ध देह भरपूर है ॥
ताहि निःअक्षर जानि और निष्कर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥
हृदय कमल के माहिं ध्यान सोहं करै ।
वाहि को अजपा जान सुरति मन लै धरै ॥
बिनहिं जपे जप होय- सुसांची बातही ।
सहस इक्कीस अरु छस्सौ जहां दिन रातही ॥
याको कीजै ध्यान होत है ब्रह्मही ।
धारै तेज अपार जाहि सब भ्रमही ॥
वा पटतर कोइ नाहिं जु योंहीं जानिये ।
चन्द सूर्य अरु सृष्टि के माहिं पिछानिये ॥
सो वह तेज अपार आपको मानिये ।
११
१३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निश्चय अरु वहि सांच जु मनमें आनिये ॥
जब लग वाही भेद जो जाना था नहीं ।
जीवातम अरु हंस होरहा था तहीं ॥
जभी अगोचर१ भेद जु मनमाहीं लहा ।
परमातम परमहंस रूप निश्चय भया ॥
दो० जो जीवातम सो भया, परमातम अरु ब्रह्म ।
वाकी सरवर को करै, पाई परै न गम्य ॥
पहुँचै ना वा तेज को, कोटिकोटि ही भान ।
चरणदास कोइ जानहीं, ताको निर्मलज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परम ज्योति को प्राप्त सो नर होत है ।
जिन मन जीता होय लगाया गोत२ है ॥
जिन मन जीता नाहिं विषय आशा बहै ।
हृदय कमलदल आठ 'तहं फिरता रहै ॥
अष्ट पैंखरी जान जु आठौ अंगही ।
वही दिशा हैं आठ करै मन भंग ही ॥
'पंखरी पूरव दिशा जबै मन जात है ।
तब इच्छा हिय पुण्य करन की आत है ॥
अग्नेय दिशा है पैंखरी जब जावै मना ।
ऊंघ नींद अरु आलस जित आवै घना ॥
दक्षिणहिं जु दिशा पैंखरी राजई ।
उपजै बहुत किरोध कठोरता साजई ॥
दिशा जु नऋत पैंखरी पै मन रंगही ।
पाप करन की उपजै हिये तरंग ही ॥
१ न देखपड़ना २ बुड़ी ॥
: हंसनाद् उपनिषद् वर्णन । १३७
पश्चिम दिशा जु पैंखरी पै मन आरहै।
होय खुशी परफुल्ल जु लीला को चहै ॥
दो० बायब दिशा जु पैंखरी, जब मन पहुँचै जाय ।
हलन चलन उपजै हिये, बैठे देहि उठाय ॥
अष्टपदी ॥
उत्तर दिशा जु पैंखरी पै मन आवई ।
मैथुन करनकि चाह हिये उपजावई ॥
ईशान दिशा पैंखरी पर मन आवै जभी ।
दान करन की चाह अधिक उपजै तभी ॥
हृदय कमल के बीच जबै मन जारहै ।
उपजि त्याग वैराग तजन जगको कहै ॥
हृदय कमल को छेदि बाहर मन फिरतही ।
आंसे पांसे जानि होय जाग्रत ही ॥
हृदय कमल के घेर के मध्यम जातही ।
जब आवै वह स्वप्न जहां बहु भांति ही ॥
धान बराबर छेदि तहां मन जात है ।
होहि सबै गुण लीन सखौ पतियात है ॥
हृदय कमल को छोड़ि होय जब न्यारही ।
तुरिया में मन जात जु तत्त्व अपारही ॥
यों जीवातम जान जु अनहद लीन हो ।
सो परमातम होय जीवता जाय खो ॥
दो० अजपाही के जापको, सिद्ध भयो जब जान ।
पहुँचै या अस्थानहीं, रहै न दूजा ज्ञान ॥
यह जो सब कुछ मैं कहो, हिरदै जाना जाय ।
ताही को पहिंचानिये, चरणदास चितलाय ॥
. १३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
कैसे अनहद उठै हिये अस्थान सों ।
यह जीवातम सुनै हृदय बल ध्यान सों ॥
दश प्रकार के नाद कहूं भिन्न भिन्नही ।
सो उपनिषदहि माहिं कहे सब चिह्नही ॥
पहली ऐसे होय चिड़िया ज्यों चीला ।
एकबार कहै चिह्न सुनौ सोई सुरंतला ॥
ऐसेही दोबारा जु दूजी जानिये ।
चिह्न चिह्नही होत ताहि पहिचानिये ॥
क्षुद्रघंटिका तीसरि चौथी शंख ज्यों ।
पंचम ऐसी जान बजत है बीन त्यों ॥
छठीं बजै ज्यों ताल सातवीं बाँसुरी ।
अठवें शब्द मृदङ्ग लगै मन गाँसुरी ॥
नवें नफीरी नाद जु दशवें सिद्धि है ।
बादर कीसी गरज ददह दहंद है ॥
करते में अभ्यास जु नाद सब खुलैं ।
जैसे बटाऊ १ चलत नगर नौ मग मिलैं ॥
दशवें पहुँचे जाय नवें बिसराइया ।
रहत किया वा देश जहां घर छाइया ॥
ऐसेही नौ छोड़ नाद दशवां गहै ।
बादल कीसी गर्ज जहां मन दे रहै ॥
वाकों छोड़ै नाहिं सदा रहै लीनहीं ।
यही जु अनहद सार जानि परबीनहीं ॥
याको प्राप्त कहूं जो मन में आनिये ।
१ रोस्ता चलनेवाला ॥
हंसनादउपनिषद्वर्णन । १३६
गौरासों शिव कह्यो सांच करि जानिये ॥
दो० चरणदास ने अब कही, जुदी जुदी दशनाद ।
वही परापत को लहै, जो कोई साधै साध ॥
अष्टपदी ॥
पहिलि परीक्षा जान जु अनहद नादकी ।
सबै रोमावलि उठै जु वाके गातकी ॥
अरु दूजी जब सुनै नाद चित लावई ।
सब तन अंगन माहिं आलकस आवई ॥
तीजी अनहद नाद सुनै जितही जुटै ।
सब अंगन हियमाहि प्रेम पीड़ा उठै ॥
चौथि सुनै जब नाद परीक्षा पावई ।
तब शिर घूमनलगै अमल¹ ज्यों खावई ॥
पचवीं उठै जो नाद सुनै तामें पगै ।
वाके शीश सों जानि अमी² उतरन लगे ॥
छठा उठै जब नाद सुरति वामें धरै ।
कण्ठ सों नीचे उतरि अमी पीवन करै ॥
सतवीं खुलै जो नाद बिना श्रवणन सुनै ।
अन्तर्यामी होय लखै सबके मनै ॥
दूर दूर के वचन सुनै कोई कहै ।
होय परे की दृष्टि छिप्यो कछु ना रहै ॥
अठविं परीक्षा जानि परापत जो बनै ।
सब माहीं सबठौर नाद अनहद सुनै ॥
है सबही के मांझ बैन समझै सुनै ।
यह समझै अरु सुनै ताहि नीके गुनै ॥
नशा २ अमृत ॥
१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० खुलै नवां जब नादहीं, लक्षण यह पहिंचान ।
सूक्ष्म होय जित तित गमन, करै धरै जो ध्यान ॥
काहू हीकी दृष्टि सों, चहै अगोचर होन ।
होय सकै दीखै नहीं, वह सब देखै जोन ॥
जैसे सुर सबको लखैं, उन्हें न देखै कोय ।
रणजित कहै अस्थूलहो, चाहे सूक्ष्म होय ॥
अष्टपदी ॥
दंशवीं खुलै जो नाद परे सोहंपरे ।
पारब्रह्म होइजाय ध्यान ताको करै ॥
ध्यानी को मन लीन होय अनहद सुनै ।
'आप अनाहद होय वासना १ सब भुनै ॥
पाप पुण्य छुटिजाय दोऊ फल ना रहें ।
होय परमकल्याण जु त्रैगुण २ ना गहैं ॥
होवै बोध स्वरूप तेज ह्वै जात है ।
अटक रहै नहिं कोय सबै ठां समात है ॥
अज अविनाशी शुद्ध पवित्र सत्तही ।
होवै आनँदरूप परम जो तत्त्वही ॥
'निर्विकार निर्लेप और निर्बानहीं ।
आनंद सबको देत आपको जानहीं ॥
या ध्यानी को नाम जु ॐकार है ।
सब नामनमें बड़ा किया जु विचार है ॥
'याको ऐसे मानै कि वह जो मैंहीं हूँ ।
रूप नाम गुण जान कि यह सब वाहीसूं ॥
दो० करतै अनहद ध्यानही, ब्रह्मरूप ह्वै जाय ।
१ मनकी इच्छा २ सत् रज तम ॥
˙हंसनादू उपनिषद् वर्णन । १४१
चरणदास यों कहत है, वाधा सब मिटिजाय ॥
˙इति हंसनाद् उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथ सर्वोपनिषद् द्वितीय प्रारंभः ॥
दो० दूसरि जो उपनिषद है, ताको कहौं बनाय ।
सर्व नाम तिहि जानिये, ताहि देहुँ प्रकटाय१ ॥
अष्टपदी ॥
परजापति२ के शिष्य जो पूँछी आयकै ।
वन्ध मुक्ति का भेद देहु समझायकै ॥
काहि कहत हैं वन्ध मोक्ष कासों कहैं ।
विद्याऽविद्या३ भेद कहौ कैसे लहैं ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति मोहिं बतलाइये ।
अरु तुरिया को भेद सभी जु सुनाइये ॥
कोठे पांच को भेद गुरू वर्णन करो ।
जुदा जुदा समझाय तिमिर४ दुबिधा हरो ॥
पहिल अन्न सों भरा दुजा भरा प्रान सों ।
तीजा मन सों भरा चौथ बुद्धि रानिस ॥
पँचवाँ आनँद भरा मोहिं कहि दीजिये ।
हौं तौ चरणहिंदास कृपा जो कीजिये ॥
आतम को जो अकर्ता कैसे कै कहैं ।
किन अनर्थ सों जीव जु याही को ठहैं ॥
अरु कहैं याको देहका जाननहार. है ।
१ जाहिर करना २ ब्रह्मा ३ माया ४ अँधियारा ॥
१४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देह को साक्षी कहै सो कौन विचार है ॥
दो० ऐसो यह बन्धन बँधो, कहैं तज्ञ निर्बन्ध ।
अन्तर्यामी क्यों कहैं, मोहिं बताओ सन्ध ॥
आतमहीं को क्यों कहैं, जीव आतमा मान ।
माया यासों कहत हैं, दूरि करो अज्ञान ॥
अष्टपदी ॥
परजापति सब सुनिकै यह उत्तर दिया ।
आतमहीं का ज्ञान सभी परगट किया ॥
जीव आतमा देह मानिकै मैं कहैं ।
ताते परो अज्ञान सबै दुख सुख सहैं ॥
आपको लम्बाजान कि ठिंगना१ जानई ।
कबहूँ दुबला जान कि मोटा मानई ॥
आपको जानै वृद्ध कि बालक तरुन२ है ।
जानत नारी पुरुष जु मानत बरन है ॥
देह संग ह्वै देह करै जु विहार है ।
आपन कोगयो भूलि रहै न विचार है ॥
वाको बन्धन यही सुनो चितमें धरो ।
देह भाव छुटिजाय मुक्ति निश्चय करो ॥
जाही वस्तु सों उपजै तन अभिमान है ।
वही अविद्या जान वही अज्ञान है ॥
यही भरम उठिजाय जिसी जु विचार सों ।
वाही विद्या जानि वही कों ज्ञानहूँ ॥
दो० चौदह इन्द्री देवता, मिलि जो करैं व्योहार ।
चरणदास यों कहत हैं, जाग्रत यही निहार ॥
१ छोटा २ ज्वान ॥
सर्वोपनिषद् वर्णन । १४३
जीव जु अन्तःकरणके, चारौ देवत संग ।
सूक्ष्म देही साथही, देखै स्वप्ना रंग ॥
चौदहही सब लीनहै, जीव आतमा माहिं ।
यही सुषुप्ति जानिये, कछु भी सूझै नाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तीन अवस्था मिटैं मिटैऽहंकार है ।
तुरियाही रहिजाय जु तत्व अपार है ॥
परमातम जो पुरुष सदा निर्लेव है ।
केवल ज्ञान स्वरूप जु ब्रह्म अभेव¹ है ॥
अब कोठों की बात कहूं चितदीजिये ।
जुदा जुदा विस्तार सबै सुनिलीजिये ॥
पहला कोठा कहूँ अन्नसेती भरो ।
छह कोठे तेहि माहिं सोई श्रवणन धरो ॥
तीन पिताकी ओर सो लाया संगही ।
बीरज मींगी हाड़ सफ़ेद जु रंगही ॥
अब माता के अंश तीनिहीं जानिये ।
लोह त्वचा अरु मांस अरुण पहिचानिये ॥
प्रानसे कोठा भरा दशौ जहां वायु है ।
अगले भी छः कहे जु रहे समाय है ॥
तीजा कोठा जानि धरो तहँ शुद्धिही ।
मन चित अरु अहंकार भरी जहँ बुद्धिही ॥
चौथा कोठा देख इन्हीं का जानना ।
तामें भरो है ज्ञान सभी को पिछानना ॥
पाँचवाँ कोठा जानि जो आनंद सों भरा ।
१ जो न जानाजाय ॥
१४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैसे सगरो वृक्ष बीजमाहीं धर्रा ॥
दो० चारौ कोठे जो कहे, अरु कारण को देखि ।
जहाँ सभी ये रहत हैं, वा ठौरी को पेखि ॥
वा ठौरी को जानिये, ज्यों तरुवर को बीज ।
डाल पात फल फूलही, रहै जु वाके बीच ॥
ऐसे वाको समझिकै, रहै जु आनँद आहि ।
आनँदही आनँद भरा, पाँचवें कोठे मांहि ॥
अष्टपदी ॥
आतम करता जानु जु जामें बुधि रहै ।
दुख सुख वाही माहिं सभी आशा गहै ॥
इच्छा पूरी भये होत मन मोद¹ है ।
जब पूरी नहिं होय घना दुख होत है ॥
दुख सुख दोनों होत जो पांचन के बिषे ।
सो वे इन्द्री जान बिना इनके कसे ॥
सरवन² सों सुनि शब्द बुरा भल को यही ।
और त्वचा सों जान सपँर्श³ कि होयही ॥
आंखन सों लखि होय जु रूप कुरूपसों ।
अरु जिह्वा सो होय जु षटरँस स्वाद सों ॥
नासासेती होय बुरी भलि गंध ले ।
इनसे उतपति होय जु दुख सुख भै अभै ॥
आतम को जीवातम इस कारण कहैं ।
सूक्ष्म⁵ अरु अस्थूल⁶ देह संगही रहैं ॥
बुरे भले जो करमन के फल में बँधा ।
१ आनन्द २ कान ३ छूना ४ खट्ठाखारी मीठा करुवा चरफरा कपैल
५ हलका ६ मोटा ॥