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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ
  1. नीतिशास्त्रीय विधिशास्त्र : यह क़ानून के सम्बन्ध में न्याय के सिद्धान्त
    से सम्बन्धित है।
    क़ानून और न्याय :
    क़ानून के नीतिशास्त्रीय निहितार्थों की पूर्ण अवहेलना विश्लेषणात्मक
    विधिशास्त्र को एक बेजान प्रणाली में तब्दील कर सकती है।
    इंग्लैण्ड में :
    दो भिन्न-भिन्न शब्द “क़ानून” और “न्याय” लगातार इस बात को याद
    दिलाते रहते हैं कि ये दोनों एक ही चीज़ नहीं बल्कि दो भिन्न चीजें हैं। लेकिन
    इनके इस्तेमाल में इन दोनों के बीच मौजूद वास्तविक और घनिष्ठ सम्बन्ध अक्सर
    आँख-ओझल हो जाया करता है।
    और महाद्वीप में :
    [रेचेट : राइट (अधिकार) = ड्रौइट : लॉ (क़ानून)]
    महाद्वीपीय भाषा-शैली “क़ानून” और “अधिकार” के बीच के फ़र्क़ को
    छिपाती है, जबकि अंग्रेज़ी भाषा-शैली उनके बीच के सम्बन्ध को छिपाती है।
    पृष्ठ 107 (80)
    क़ानून :
    “हम उस किसी भी क़िस्म के नियम या सिद्धान्त को क़ानून नाम दे देते हैं,
    जिसके द्वारा कार्रवाइयाँ निर्धारित की जाती हैं।”
    (हूकर)¹
    “क़ानून अपने सर्वाधिक सामान्य अर्थ में कार्रवाई सम्बन्धी नियम को
    विशिष्टीकृत करता है, और यह सभी प्रकार की कार्रवाई पर बिना भेदभाव के, लागू
    होता है, चाहे वे तर्कपरक हों या तर्कहीन, जीवधारी से सम्बन्धित हों, या निर्जीव
    से। इसीलिए हम गति के, गुरुत्वाकर्षण के, प्रकाश के, भौतिकी के, प्रकृति के और
    राष्ट्रों के नियमों की बात करते हैं”।
    (ब्लैकस्टोन)²
  2. सम्भवतः अंग्रेज़ धर्मशास्त्रीय रिचर्ड हूकर (1554-1600) जिसने द लॉ ऑफ़
    एक्लेसिएस्टिकल पॉलिसी में एंगलीकनिज़्म के सिद्धान्तों को संहिताबद्ध किया।
  3. सम्भवतः सर विलियम ब्लैकस्टोन (1723-1780) : अंग्रेज़ विधिवेत्ता, जिसने कमेण्ट्रीज़
    ऑन द लॉज़ ऑफ़ इंग्लैण्ड (1765-1769) लिखी, जो अंग्रेज़ी क़ानून के सिद्धान्त पर एक
    आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 623

क़ानूनों के प्रकार

  1. अनिवार्य क़ानून
  2. भौतिक नियम या वैज्ञानिक क़ानून
  3. प्राकृतिक या नैतिक क़ानून
  4. प्रचलित क़ानून
  5. परम्परागत क़ानून
  6. व्यावहारिक या तकनीकी क़ानून
  7. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून
  8. नागरिक क़ानून या राज्य का क़ानून
    पृष्ठ 108 (81)
    अनिवार्य क़ानून की \ 1. अनिवार्य क़ानून का अर्थ है कार्रवाई का नियम,
    अनुज्ञप्ति – 1. सजा, ) जो किसी ऐसी सत्ता द्वारा लोगों पर लागू किया जाता है
    युद्ध आदि / जो इसका अनुपालन बलपूर्वक करवा लेती है।
    ‘क़ानून एक आदेश है जो व्यक्ति या व्यक्तियों को एक निश्चित आचरण करने
    के लिए विवश करता है’
    (ऑस्टिन)¹
    समाज की प्रत्यक्ष नैतिकता भी अनिवार्य क़ानूनों के दायरे में आती है।
    हॉब्स का दृष्टिकोण :
    मनुष्य और हथियार ही क़ानूनों की शक्ति और सम्बल हैं।
    (हॉब्स)²
  9. भौतिक क़ानून चल रही कार्रवाइयों की अभिव्यक्ति है। (नैतिक क़ानून
    या विवेक का क़ानून कार्रवाइयों की इस रूप में अभिव्यक्ति है, जैसी वे होनीं
    चाहिए)।
  10. प्राकृतिक या नैतिक क़ानून का अर्थ है प्राकृतिक रूप से सही या ग़लत
    के सिद्धान्त – यानी सभी सही कार्रवाइयों समेत प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त।
    न्याय के दो प्रकार हैं – प्रत्यक्ष और प्राकृतिक।
    प्राकृतिक न्याय वह न्याय है जो वास्तव में और सचमुच हो।

  1. जॉन ऑस्टिन (1811-1680) : ब्रिटिश दार्शनिक राजनीतिक चिन्तक
  2. टॉमस हॉब्स (1588-1689) : अंग्रेज़ दार्शनिक-राजनीतिक चिन्तक। राज्य की उत्पत्ति
    के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का जनक। राजतन्त्रात्मक निरंकुशतावाद का समर्थक था।
    624 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

प्रत्यक्ष न्याय न्याय का वह रूप है जिस रूप में उसे समझा जाता है, स्वीकार
किया जाता है, और अभिव्यक्त किया जाता है।
<u>पृष्ठ 109 (82)</u>
4. प्रचलित क़ानून : ऐसा कोई भी नियम या नियमों की प्रणाली है जिस
पर लोग अपने आचरण के नियमन के लिए सहमत होते हैं। सहमत होने वाले पक्षों
की सहमति ही क़ानून है।
5. परम्परागत क़ानून : मनुष्यों द्वारा वास्तव में की जाने वाली कार्रवाई का
कोई भी नियम – जो स्वैच्छिक कार्रवाई की किसी वास्तविक समरूपता की
अभिव्यक्ति है। परम्परा उन लोगों का क़ानून है जो इसे मानते हैं।
6. व्यावहारिक या तकनीकी क़ानून : इसमें ऐसे नियम आते हैं जो
व्यावहारिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए होते हैं। खेलों में, ‘प्रचलित क़ानून’ और
‘व्यावहारिक क़ानून’ दोनों ही आते हैं, जिनमें पहले प्रकार के क़ानूनों के अन्तर्गत
वे नियम आते हैं जिन पर खिलाड़ियों की सहमति होती है, और दूसरे प्रकार के
क़ानूनों के अन्तर्गत वे नियम आते हैं, जो खेल को सफल बनाते हैं, या खेल को
सफलतापूर्वक चलाने के लिए होते हैं।
7. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून : इसमें वे नियम आते हैं जो सम्प्रभुतासम्पन्न राज्यों
के आपसी सम्बन्धों एवं एक-दूसरे के प्रति आचरण का नियमन करते हैं।
(i) एक्सप्रेस क़ानून (सन्धियाँ आदि)
(ii) अन्तर्निहित क़ानून (परम्परागत)
पुनः दो प्रकारों में विभाजित :
(i) सामान्य क़ानून (सभी राष्ट्रों के बीच)
(ii) विशिष्ट क़ानून (दो या अधिक राष्ट्र विशेष के बीच)
8. नागरिक क़ानून : राज्य या देश का क़ानून, जो न्यायिक अदालत में
प्रयुक्त होता है।
<u>पृष्ठ 110 (83)</u>
सज़ा :
राजनीतिक जुर्म : हम विधि-निर्माताओं के भारी समुदाय की इस सोच से
सहमत हैं कि, भले ही, आमतौर पर उस व्यक्ति पर कड़ी कार्रवाई नहीं की जानी
चाहिए, जो ऐसी मुजरिमाना साज़िश में शामिल रहा हो, जिस साज़िश को अंजाम
नहीं दिया गया हो, फिर भी राज्य के ख़िलाफ़ किये गये बड़े जुर्मों के सिलसिले
में इस नियम का एक अपवाद ज़रूर रखा जाना चाहिए, कारण कि राज्य के
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 625

ख़िलाफ़ किये जाने वाले जुर्मों की ख़ासियत यह होती है कि यदि उनमें मुजरिम
क़ामयाब हो जाता है, तो वह सज़ा से तक़रीबन साफ़ बच जाता है। क़ातिल क़त्ल
करने के बाद, क़त्ल करने की अपेक्षा कहीं अधिक ख़तरे में होता है, लेकिन
राजद्रोही जब सरकार का तख़्ता पलट देता है, तो वह ख़तरे से बाहर हो जाता है।
चूँकि दण्डात्मक क़ानून एक क़ामयाब विद्रोही के विरुद्ध नपुंसक ही सिद्ध होता
है, इसलिए ज़रूरी है कि इसे विद्रोह की पहली शुरुआत के ख़िलाफ़ ही सशक्त
और कड़ा बनाया जाये...।"
(II एल.सी.सी. जजमेण्ट 1906, पृष्ठ 120)¹

पृष्ठ 111 (84)

सज़ा :
स्वप्न जो प्राणदण्ड का कारण बना : जब मार्सेंज ने सपना देखा कि उसने
डायोनीसियस² का गला काट दिया है, तब निरंकुश शासक ने उसे प्राणदण्ड दे
दिया, जिसके पीछे उसकी दलील यह थी कि यदि उसने दिन में ऐसा सोचा न
होता तो रात में यह सपना कदापि नहीं देखता।
प्राणदण्ड और ड्रैको का क़ानून : ड्रैको³ के क़ानून में लगभग सभी प्रकार
के जुर्मों, जैसे मामूली चोरी से लेकर धर्म-द्रोह और हत्या तक के लिए एक समान
मौत की सज़ा का विधान था, और कहा जाता है कि इसका एकमात्र स्पष्टीकरण
जो ड्रैको ने दिया था, वह यह कि छोटे-मोटे जुर्मों की तो यही सज़ा होनी चाहिए
और बड़े जुर्मों के लिए इसे बड़ी सज़ा वह सोच नहीं सका।
सज़ा को बहुतेरे दार्शनिकों ने एक आवश्यक बुराई माना है।
राज्य और मनुष्य : राज्य अपनेआप में कोई लक्ष्य नहीं है, और मनुष्य क़ानून
या राज्य के लिए नहीं, बल्कि ये ही मनुष्य के लिए होते हैं।

  1. स्रोत और विवरण अनुपलब्ध
  2. डायोनीसियस द एल्डर (430-367 ई. पू.) : सिसली का यूनानी राजनेता, जो 400
    ई.पू. में साइरेक्यूस का निरंकुश शासक बना।
  3. ड्रैको (ई.पू सातवीं सदी) : एथेंस (यूनान) का राजनीतिज्ञ जिसने परम्परागत अलिखित
    संविधान को संहिताबद्ध किया, छोटे से लेकर, बड़े तक सभी प्रकार के जुर्मों के लिए प्राणदण्ड
    देने के लिए कुख्यात उसका क़ानून (ड्रैकनियन लॉ) आज भी ऐसे काले क़ानूनों के लिए
    मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होता है।
    626 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 112 (85)
न्याय : राज्य की भौतिक ताक़त के जरिये एक राजनीतिक समुदाय के भीतर
अधिकार बनाये रखना।
इसने उस व्यक्तिगत प्रतिशोध का स्थान ले लिया है, जब लोग ग़लतियों का
प्रतिशोध स्वयं या अपने बन्धु-बान्धवों के सहयोग से ले लिया करते थे। उन दिनों,
'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धान्त काम करता था।
दीवानी और फ़ौजदारी न्याय :
नागरिक न्याय अधिकार लागू करता है। फ़ौजदारी न्याय ग़लतियों के लिए सज़ा
देता है।
एक आदमी अपने बकाये का, या उससे ग़लत ढंग से दबा ली गयी सम्पत्ति
को फिर से वापस पाने का दावा करता है। यह दीवानी (न्याय का मामला) है।
फ़ौजदारी के मामले में, प्रतिवादी पर ग़लत करने का आरोप लगा होता है।
अदालत इस मुल्ज़िम को कर्तव्य की अवहेलना के जुर्म में तथा अधिकार के
उल्लंघन के जुर्म में, सज़ा देती है, जिसमें यदि हत्या का जुर्म है तो फाँसी और
यदि चोरी का जुर्म है तो जेल की सज़ा देती है। [पृष्ठ 113 (86) पर जारी]
दीवानी और फ़ौजदारी, दोनों ही प्रकार की कार्रवाई में, ग़लती की शिकायत
दर्ज की जाती है।
दीवानी (कार्रवाई) में अधिकार का दावा किया जाता है,
फ़ौजदारी (कार्रवाई) में ग़लती का आरोप लगाया जाता है।
दीवानी न्याय का सरोकार, प्राथमिक तौर पर, वादी और उसके अधिकारों से
होता है,
फ़ौजदारी (न्याय) का प्रतिवादी और उस पर लगे आरोप से।
फ़ौजदारी न्याय के उद्देश्य
सज़ा :
यह तटस्थ 'अपराधकर्ताओं' जैसे राजनीतिक व्यक्तियों के मामलों में उपयोगी
नहीं हो सकती। यह उनके लिए एक बुरा सौदा सिद्ध हो सकती है।

  1. निवारक : क़ानून का प्रमुख उद्देश्य दोषी व्यक्ति को एक नज़ीर बनाना
    और उस जैसे बाक़ी सभी व्यक्तियों को एक चेतावनी देना है। यह प्रत्येक अपराध
    को "अपराधकर्ता की एक दुर्भावना" सिद्ध करता है। (इरादे का बदलाव)
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 627
  1. निरोधक : दूसरे मामले में, यह निरोधक या अयोग्य सिद्ध करने वाला है।
    इसका विशेष उद्देश्य अपराधकर्ता को नाकाम कर उसे पुनः ग़लत काम करने से
    रोकना है।
    प्राणदण्ड हम हत्यारों को फाँसी महज इसीलिए नहीं देते कि यह दूसरों को
    का (हत्या करने से) विरत करती है, बल्कि उसी कारण से, जिस
    औचित्य : कारण से हम, उदाहरण के लिए, साँप को मार डालते हैं, क्योंकि
    हमारे लिए यही बेहतर है कि वे इस दुनिया में रहने के बजाय इससे
    बाहर हो जायें।
  2. सुधारात्मक : अपराध चरित्र के ऊपर इरादों के प्रभाव से किये जाते हैं,
    और वे या तो इरादों के बदलाव से या चरित्र के बदलाव से रोके जा सकते हैं।
    निवारक सज़ा पहले मामले में दी जाती है, (कुछ शब्द अस्पष्ट – स.)
    जबकि सुधारात्मक (सज़ा) दूसरे मामले में दी जाती है।
    पृष्ठ 114 (87)
    “सुधारात्मक सिद्धान्त” के पैरोकार सज़ा के सिर्फ़ उन्हीं रूपों की हिमायत
    करते हैं, जो अपराधी की शिक्षा और उसे अनुशासित करने के लिए उपयोगी होते
    हैं, और बाक़ी उन सभी (सज़ाओं) को अमान्य ठहराते हैं जो लाभकारी तौर पर
    सिर्फ़ निवारक या अयोग्यकारी (होती हैं)। उनकी दृष्टि में मृत्यु कोई उपयुक्त सज़ा
    नहीं हैं, 'हमें अपने अपराधियों का इलाज करना चाहिए, उनकी हत्या नहीं।'
    पिटाई और अन्य शारीरिक सज़ाएँ बर्बरता की निशानी कहकर निन्दित की जाती
    हैं। वे ऐसी सज़ाओं को सज़ा भोगने वाले और सज़ा देने वाले दोनों को ही नीचे
    गिराने वाली और क्रूर मानते हैं।
    कड़ी सज़ा का नतीजा। राज्य की बलप्रयोग की कार्रवाई जितनी सक्षम होती
    अपराधियों का ख़तरनाक है, वह सभी सामान्य मनुष्यों को ख़तरनाक रास्तों (पर
    और दुस्साहसिक वर्ग जाने) से रोकने में उतनी ही सफल होती है, लेकिन
    पैदा हो जाता है। क़ानून तोड़ने वालों में अधःपतन का अनुपात भी
    उतना ही अधिक होता है।
  3. प्रतिकारात्मक सज़ा :
    सर्वाधिक भयावह सिद्धान्त! ऐसी सोच रखने वाले लोग वास्तव में प्राचीन और
    सभ्यतापूर्व कालों की बर्बर मनःस्थितियों के हिमायती होते हैं।¹
    यह प्रतिशोध या बदले की उस नैसर्गिक प्रवृत्ति को तुष्ट करती है, जो सिर्फ़

  1. हाशिये पर लिखा हुआ
    628 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ग़लती का शिकार हुए व्यक्ति में ही नहीं मौजूद रहती, बल्कि व्यापक पैमाने पर
समाज में उसके प्रति हमदर्दी के रूप में भी मौजूद रहती है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, यह सही और उचित है कि बुराई का बदला बुराई
से लिया जाये। आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत प्राकृतिक न्याय का
एक सीधा और अपनेआप में पूर्ण नियम माना जाता है। सज़ा खुद में एक मक़सद
बन जाती है।
पृष्ठ 115 (88)
सज़ा एक बुराई :
सज़ा अपनेआप में ही एक बुराई है, और इसे सिर्फ़ एक महत्तर उद्देश्य की
प्राप्ति के साधन के तौर पर ही उचित ठहराया जा सकता है।
लेकिन प्रतिकारात्मक सिद्धान्त के समर्थक इस ढंग से दलील देते हैं : “दोष
धन सज़ा बराबर निर्दोषता।”
“उसने न्याय के क़ानून का जिस ग़लती द्वारा उल्लंघन किया है, उससे उसके
ऊपर एक ऋण आयद हो गया है। अतः न्याय का तक़ाज़ा है कि वह ऋण चुका
दिया जाये...सज़ा का पहला उद्देश्य भंग किये गये क़ानून को तुष्ट करना है।”
Peine forte et dure : यातना देकर मौत...जिसका फ़ैसला निम्नलिखित रूप
में दिया गया :
“कि तुम्हें फिर उसी जेल में वापस ले जाया जाये जहाँ से तुम आये थे, यानी
कि उसी लम्बी कालकोठरी में, जिसके भीतर कोई रोशनी न जा सके, फिर तुम्हें
वहाँ नंगी फ़र्श पर पीठ के बल लिटाया जाये, सिर्फ़ तुम्हारी कमर में एक कपड़ा
लिपटा रहे, जबकि शेष सभी भाग नंगा रहे, कि तुम्हारे शरीर पर लोहे का एक इतना
भारी बोझ रखा जाये जितना कि तुम बरदाश्त कर सको, और फिर उससे भी
अधिक भारी, कि तुम्हें पहले दिन खाने के लिए मोटी से मोटी रोटियों के सिवाय,
और कोई चीज़ न दी जाये, दूसरे दिन जेल के फाटक के सबसे नज़दीक के गड्ढे
में जमा पानी के तीन घूँट दिये जायें, तीसरे दिन फिर पहले जैसा ही खाना दिया
जाये, और ऐसी रोटियाँ और ऐसा पानी एक-एक दिन के अन्तर पर तब तक दिया
जाये, जब तक कि तुम मर न जाओ।”¹
यह सज़ा स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से उन सभी प्रकार के जुर्मों
**के लिए दी गयी जो ग़ैर-मामूली नहीं थे।**²

  1. उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में इंग्लैण्ड में एक जज द्वारा सुनायी गयी मौत की सज़ा
  2. हाशिये पर नोट किया हुआ और रेखांकित
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 629

पृष्ठ 116 (89)
विदेशी अधीनता :
विदेशी जुवे की अधीनता राष्ट्रों के पतन के सबसे प्रबल कारणों में से एक है।
– प्रो.ए.ई.रॉस ¹
जनतन्त्र का एक विदेशी जनता के ऊपर एक जनतन्त्र की कार्रवाइयाँ
प्रभुत्व और जितनी झपट्टामार और निर्मम होती हैं, उतनी और किसी
विदेशी राष्ट्र : भी शासन की नहीं होती।
– लालाजी ²
विवाह :
डॉ. टैगोर³ का मानना है कि आदिम युगों से लेकर आज तक विवाह की
प्रणाली सिर्फ़ भारत में ही बल्कि सारी दुनिया में स्त्री और पुरुष के सच्चे मिलन
के रास्ते में एक बाधा ही बनी हुई है, जोकि केवल तभी सम्भव है जब समाज
इतना सक्षम हो जाये कि वह स्त्री को, घर में रचनात्मक कार्य करने से रोके बग़ैर,
उसकी विशिष्ट प्रतिभा को रचनात्मक कार्य में लगाने के लिए एक व्यापक क्षेत्र
मुहैया कर सके।
पृष्ठ 117 (90)
नागरिक और मनुष्य :
स्पार्टावासी पेडार्कटीज़ तीन सौ की परिषद में दाख़िले के लिए उपस्थित हुआ,
परन्तु उसे वापस कर दिया गया; वह इस खुशी में चला गया कि 300 स्पार्टावासी
उससे बेहतर तो थे। मैं समझता हूँ कि इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं कि वह
सच्चा था,
वह एक सच्चा नागरिक था।

  1. अज्ञात
  2. लाला लाजपत राय (1865-1928), लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध करने पर
    ब्रिटिश पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया, और इसी में लगी सांघातिक चोट के फलस्वरूप बाद
    में, लाला जी की मृत्यु हो गयी। उनकी मौत और पंजाब के अपमान का बदला लेने के लिए
    भगतसिंह और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने ब्रिटिश पुलिस अफ़सर, साण्डर्स की गोली मार
    कर हत्या कर दी।
  3. रवीन्द्रनाथ ठाकुर
    630 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

एक स्पार्टावासी माँ के पाँच बेटे सेना में थे। एक दास आया। काँपते हुए
उसने समाचार पूछा। “तुम्हारे पाँचों बेटे मार डाले गये।”
“तुच्छ दास, क्या तुमसे मैंने यह पूछा था?”
“हमने विजय हासिल कर ली है”। वह देवताओं को धन्यवाद देने के लिए
दौड़ी-दौड़ी मन्दिर चली गयी।
वह एक सच्ची नागरिक थी।
– एमिली, पृष्ठ 8¹
जीवन और शिक्षा :
लोग सिर्फ़ अपने बच्चे की ज़िन्दगी की सलामती के ही बारे में सोचते रहते
हैं, लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है, अगर वह मनुष्य है तो उसे स्वयं भी अपनी
ज़िन्दगी की सलामती के बारे में शिक्षित होना ज़रूरी है, ताकि वह भाग्य के थपेड़ों
को सह सकें, सम्पदा और ग़रीबी का बहादुरी से मुक़ाबला कर सके, ज़रूरत पड़ने
पर आइसलैण्ड की बर्फ़ के बीच या माल्टा की तपती चट्टानों पर निवास कर
सकें। बेकार ही तुम मौत के ख़िलाफ़ खैर मनाते हो, उसे मरना तो है ही, और भले
ही तुम अपनी सतर्कताओं के चलते उसे न मरने देना चाहो, लेकिन यह मुगालता
ही है।
उसे मौत से बचने के बजाय जीने की शिक्षा दो! जीवन साँस लेना
नहीं बल्कि कर्म है। अपनी इन्द्रियों का, अपने दिमाग़ का, अपनी क्षमताओं का,
और अपने अस्तित्व को चेतन बनाये रखने वाले प्रत्येक भाग का इस्तेमाल करना
है। जीवन का अर्थ उम्र की लम्बाई में कम, जीने के बेहतर ढंग में अधिक
है। एक आदमी सौ वर्ष जीने के बाद क़ब्र में जा सकता है, लेकिन उसका
जीना निरर्थक भी हो सकता है। अच्छा होता कि वह जवानी में ही मर गया
होता।
– एमिली, पृष्ठ 10
पृष्ठ 118 (91)
सत्य :
सत्य कोई खज़ाना नहीं प्रदान करता, और जनता कोई राजदूत या प्रोफ़ेसर का

  1. एमिली – फ़्रांसीसी दार्शनिक ज्याँ जाक रूसो (1712-1778) का उपन्यास (1762)
    जिसमें यह सिद्धान्त निरूपित किया गया है कि बच्चे को सभ्यता के बुरे प्रभावों से बचाने के
    लिए प्राकृतिक वातावरण में विकास का पूर्ण अवसर दिया जाना चाहिए।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 631

पद या पेंशन नहीं प्रदान करती।
— रूसो, 122
एस.सी.¹
जुर्म और मुजरिम :
"...पकी-पकायी धारणाएँ देकर जुर्म को समझा नहीं सकता। लोग जैसा सोचते
हैं उससे इसका फ़लसफ़ा कुछ अधिक ही जटिल है। यह तो मानी हुई बात है कि
न तो कोई क़ैद, न कोई कालकोठरी और न कोई कड़ी मशक़्क़त की प्रणाली ही
किसी मुजरिम को सुधार सकती है। दण्ड-विधान के ये रूप सिर्फ़ उसे दण्डित
करते हैं और समाज को यह आश्वासन देते हैं कि वह और जुर्म नहीं करेगा। क़ैद,
नियम-विधान और कड़ी से कड़ी मशक़्क़त उस पर कोई असर नहीं डाल पाते,
सिवाय इसके कि ऐसे व्यक्तियों में एक भारी नफ़रत, वर्जित काम को और चाव
से करने की एक ललक, और एक ख़ौफ़नाक नाफ़रमानी ही विकसित हो जाती
है। इसीलिए मेरा पक्के तौर पर मानना है कि यह कालकोठरी वाली परम्परागत
प्रणाली दिखावटी और कपटपूर्ण नतीजे ही देती है। यह मुजरिम से उसकी ताक़त
निचोड़ लेती है, उसे अशक्त करके और डरा कर उसकी आत्मा को निस्तेज कर
डालती है, और इस प्रकार अन्ततः उसे पश्चाताप और सुधार के एक नमूने के तौर
पर, एक बेजान यादगार के रूप में ही प्रस्तुत करती है।
द हाउस ऑफ़ डेड पृष्ठ, 17
फ़ेदोर दोस्तोव्स्की²
पृष्ठ 119 (92)
इच्छा बनाम सन्तुष्टि!
यदि एक चेतन प्राणी की शक्तियाँ उसकी इच्छाओं के बराबर होतीं तो वह
पूरी तरह सुखी होता...। लेकिन सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को सीमित करना ही काफ़ी
नहीं है, क्योंकि यदि वे हमारी शक्तियों से कम हैं, तब तो हमारी क्षमताओं का एक
अंश यों ही बेकार चला जायेगा, और तब हम अपने पूरे अस्तित्व का आनन्द भी

  1. रूसो की पुस्तक सोशल काण्ट्रैक्ट : इसमें एक ऐसे आदर्श राज्य का वर्णन प्रस्तुत किया
    गया है जिसमें सम्प्रभुता पूरी जनता में निहित थी। उसके विचार 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति
    की एक महत्त्वपूर्ण प्रेरकशक्ति बने।
  2. फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोयेव्स्की (1821-1881) का उपन्यास द हाउस ऑफ़ डेड,
    जो स्वयं उनके कारावास के अनुभवों के आधार पर 1861 में लिखा गया।
    632 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

नहीं ले पायेंगे। इसी तरह, अपनी शक्तियों का महज विस्तार भी पर्याप्त नहीं है,
क्योंकि यदि हमारी इच्छाएँ भी बढ़ जायें, तब तो हम और अधिक दुखी ही हो
जायेंगे। सच्चा सुख तो अपनी इच्छाओं और अपनी शक्तियों के बीच के अन्तर को
घटाते जाने में निहित है।
– 44 एमिली
पृष्ठ 120 (93)
“बुर्जुआ क्रान्ति का जन्म अपनी पूर्ववर्ती शासन-व्यवस्था में पहले से मौजूद
परिस्थिति से होता है।
“बुर्जुआ क्रान्ति आमतौर पर सत्ता पर क़ब्ज़े के साथ ही ख़त्म हो जाती है।
लेकिन सर्वहारा क्रान्ति के लिए सत्ता पर क़ब्ज़ा तो महज एक शुरुआतभर है, सत्ता,
जब क़ब्ज़े में आ जाती है, तब वह पुरानी अर्थव्यवस्था के रूपान्तरण और एक नयी
अर्थव्यवस्था के संगठन के लिए एक उत्तोलक के रूप में इस्तेमाल की जाती है।”
पृष्ठ 20¹
“अभी भी दो भारी-भरकम और अत्यन्त दुष्कर कार्यभार बाक़ी हैं – (एक
देश – यानी रूस – में मौजूदा शासन-व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के बाद भी)।
“सबसे पहला कार्यभार है आन्तरिक संगठन।
“दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या विश्व क्रान्ति की... – अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं को
हल करने की, विश्व क्रान्ति को आगे बढ़ाने की है (जिसके हल किये बिना
कम्युनिस्ट शासन-व्यवस्था अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवाद के ख़तरे के विरुद्ध सुरक्षित नहीं
रह सकती। )
पृष्ठ 21-22²
पृष्ठ 121 (94)

  1. यदि सर्वहारा को आबादी के बहुमत को अपने पक्ष में करना है तो उसके
    लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि वह बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंके और राज्य सत्ता
    पर क़ब्ज़ा करे।
  2. दूसरे, उसे पुराने राज्य उपकरण को तोड़कर सोवियत सत्ता स्थापित करना,
    और एक झटके में उस प्रभाव को ख़त्म कर देना ज़रूरी है, जिसे बुर्जुआ वर्ग और
  3. और 2. लेनिन की रचनाओं से उद्धृत अंश
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 633

वर्ग-सहयोग के निम्न बुर्जुआवर्गीय समर्थक मेहनतकश (गैर-सर्वहारा) जनसमुदायों
के ऊपर डालते रहते हैं।
3. तीसरे, सर्वहारा वर्ग के लिए आवश्यक है कि वह उस प्रभाव को पूरी तरह
और अन्तिम रूप से नष्ट कर दे, जिसे बुर्जुआ वर्ग और निम्न-बुर्जुआ समझौतावादी
बहुसंख्यक मेहनतकश (गैर-सर्वहारा) जनसमुदायों के ऊपर डालते रहते हैं। यह
शोषकों की क़ीमत पर इन समुदायों की आर्थिक आवश्यकताओं के क्रान्तिकारी
तुष्टिकरण के द्वारा किया जाना चाहिए।
निकोलाई लेनिन¹
पृष्ठ 23
———o———
“सर्वहारा अधिनायकत्व का मतलब है जनसमुदायों का कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा
मार्गदर्शन और निर्देशन। यद्यपि पार्टी काफ़ी प्रभाव या नियन्त्रण रखे हुए है, फिर भी
इतना ही सब कुछ नहीं है। अपने मार्गदर्शन के अलावा, जनसमुदायों की 'इच्छा'
भी किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति के लिए आवश्यक होती है।
“हमें यह स्वीकार करना होगा कि मज़दूरों के व्यापक समुदायों का वर्ग-चेतन
अल्पसंख्या द्वारा नेतृत्व और मार्गदर्शन आवश्यक है। और यह पार्टी ही हो सकती
है। पार्टी के पास पार्टी को सर्वहारा मज़दूरों के साथ जोड़ने के लिए 'ट्रेड यूनियनें'
हैं...राजनीतिक क्षेत्र में सभी मेहनतकश जनसमुदायों को इससे जोड़ने के लिए
सोवियतें हैं। [पृष्ठ 122 (95) पर जारी]
आर्थिक क्षेत्र में ख़ासतौर से किसान समुदायों को जोड़ने के लिए 'कोआपरेटिवें'
हैं, उदीयमान पीढ़ी के बीच से कम्युनिस्टों को प्रशिक्षित करने के लिए 'युवा लीग'
है। अन्ततः पार्टी स्वयं ही सर्वहारा अधिनायकत्व के अन्तर्गत एक अनन्य मार्गदर्शक
शक्ति है।”²
पृष्ठ 123 (96)
आँकड़े : आमदनियों में असमानता
उत्पादन :
युद्ध पूर्व यूनाइटेड किंगडम का (इंग्लैण्ड)
{ वार्षिक उत्पादन का मान रहा : £ 2000,000,000
{ विदेशी निवेशों से लाभ £ 200,000,000
योग £ 2200,000,000

  1. और 2. लेनिन की रचनाओं से
    634 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

वितरण :
कुल आबादी के 1/9 अर्थात, { न्यूनतम वार्षिक औसत
पूँजीपति या बुर्जुआ ने ले लिया आय £ 160
कुल उत्पादन का 1/2 अर्थात £ 1100,000,000
कुल आबादी के 2/9 अर्थात { औसत आय £ 160
निम्न बुर्जुआ वर्ग ने शेष आधे का 1/3 या प्रतिवर्ष से कम
कुल का 1/6 ले लिया अर्थात £ 300,000,000
आबादी के 2/3 अर्थात शारीरिक {औसत आय £ 60 वार्षिक
श्रम करने वाले या सर्वहारा को बाक़ी मिला £ 800,00,000
संयुक्त राज्य अमेरिका : 1890 में
कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत (उत्पादन के) साधनों के मालिकों को मिला
कुल उत्पादन का 60 प्रतिशत सभी मज़दूरों को दिया गया।¹
<u>पृष्ठ 124 (97)</u>
जीवन का उद्देश्य
“जीवन का उद्देश्य मन को नियन्त्रित करना नहीं बल्कि उसका सुसंगत
विकास करना है, मरने के बाद मोक्ष प्राप्त करना नहीं, बल्कि इस संसार में ही
उसका सर्वोत्तम इस्तेमाल करना है, केवल ध्यान में ही नहीं, बल्कि दैनिक
जीवन के यथार्थ अनुभव में भी सत्य, शिव और सुन्दर का साक्षात्कार करना है,
सामाजिक प्रगति कुछेक की उन्नति पर नहीं, बल्कि बहुतों की समृद्धि पर निर्भर
करती है, और आत्मिक जनतन्त्र या सार्वभौमिक भ्रातृत्व केवल तभी प्राप्त किया
जा सकता है, जब सामाजिक-राजनीतिक और औद्योगिक जीवन में अवसर की
समानता हो”।²
नोटबुक में पृष्ठ सं. 125 से 164 नहीं है।
हमें उपलब्ध प्रति में पृष्ठ (97) के बाद पृष्ठ (100) है। — सम्पादक

  1. और 2. स्रोत अज्ञात
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 635

पृष्ठ 165 (100)
राज्य का विज्ञान
प्राचीन राज्य व्यवस्था : रोम¹ और स्पार्टा,² अरस्तू³ और प्लेटो⁴ : राज्य के प्रति
व्यक्ति की मातहती इन प्राचीन राज्य व्यवस्थाओं, स्पार्टा और रोम की प्रमुख
विशेषता थी। हेलास⁵ में, या रोम में, नागरिक को बस थोड़े से निजी अधिकार प्राप्त
थे। उसका आचरण काफी हद तक सार्वजनिक सेंसरशिप के अधीन था, और
उसका धर्म राज्यसत्ता द्वारा लागू किया गया होता था। एकमात्र सच्चे नागरिक और
सम्प्रभुतासम्पन्न निकाय के सदस्य विशेषाधिकार प्राप्त कुलीन वर्ग के मुक्त लोग
होते थे, जिनके लिए शारीरिक श्रम दास किया करते थे, जिनके पास कोई नागरिक
अधिकार न थे।
सुकरात :
सुकरात⁶ को यह दलील देते हुए प्रस्तुत किया जाता है कि जो कोई भी
नागरिक राज्य में पहुँचने के बाद, यदि स्वेच्छा से एक नगर में रहने लगे, तो उसे
सरकार की मातहती स्वीकार करनी चाहिए, भले ही उसे इसके क़ानून अनुचित
क्यों न लगें, तदनुसार ही, इस आधार पर कि यदि वह जेल से फ़रार होकर भाग
जाये, तो राज्य के साथ उसका क़रार भंग हो जायेगा, वह एक अनुचित सज़ा के
लागू होने का भी इन्तज़ार करते रहने के लिए तैयार रहे।
प्लेटो : (सामाजिक समझौता)
वह समाज और राज्य की उत्पत्ति को पारस्परिक आवश्यकताओं में देखता है,
क्योंकि मनुष्य अलग-अलग रहकर अपनी बहुविध आवश्यकताओं को तुष्ट करने
में असमर्थ होते हैं। वह एक क़िस्म के आदर्शीकृत स्पार्टा का चित्रण करते हुए
कहता है, “एक आदर्श राज्य में, दार्शनिकों को शासन करना चाहिए, और नागरिकों
के निकाय को इस कुलीन तन्त्र या सर्वश्रेष्ठों की सरकार के प्रति निश्चित रूप

  1. प्राचीन रोमन गणराज्य और साम्राज्य
  2. यूनान का प्राचीन नगरराज्य
  3. अरस्तू (384-322 ई.पू.) : यूनानी दार्शनिक और प्लेटो का शिष्य। उसने बहुतेरे विषयों
    पर लिखा, जिनमें से पालिटिक्स और पोयटिक्स विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
  4. प्लेटो (427-347 ई.पू.): यूनानी दार्शनिक और सुकरात का शिष्य, और आदर्श राज्य
    के यूटोपिया के तौर पर, रिपब्लिक का लेखक, जिसमें उसने एक दार्शनिक राजा और
    विवेकसम्मत राज्य-व्यवस्था की कल्पना की थी।
  5. हेलास : प्राचीन यूनान
  6. सुकरात (469-399 ई. पू.) : यूनानी दार्शनिक जिसे नौजवानों को “भ्रष्ट करने” के
    आरोप में जहर का प्याला पीकर आत्महत्या कर लेने की सज़ा दी गयी।
    636 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

से आज्ञाकारी होना चाहिए।” वह नागरिकों के सचेत प्रशिक्षण और शिक्षा पर ज़ोर
देता है।
अरस्तू :
वह पहला व्यक्ति था जिसने राजनीति को नीतिशास्त्र से मुक्त किया, हालाँकि
वह सतर्क भी था कि ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक न हो जायें। उसकी
दलील थी, “लोगों की बहुसंख्या विवेक के बजाय अपनी भावनाओं से शासित
होती है, और इसीलिए राज्य के लिए ज़रूरी है कि वह उन्हें जीवन-पर्यन्त
अनुशासन में रहने का प्रशिक्षण दे, जैसाकि स्पार्टा में है। जब तक राजनीतिक समाज
स्थापित नहीं होता, तब तक न्याय का कोई प्रशासन नहीं हो सकता...(लेकिन)
इसके लिए आवश्यक है कि सर्वोत्तम संविधान और विधि-निर्माण की सर्वोत्तम
प्रणाली की खोज की जाये...। [पृष्ठ 166 (101) पर जारी]
“राज्य का बीज परिवार या कुटुम्ब में होता है। कई कुटुम्बों के संयुक्त होने
से ग्राम समुदाय की उत्पत्ति हुई है (जिसके) सदस्य पितृसत्तात्मक सरकार के
अधीन होते हैं।
“कई गाँवों को मिलाकर राज्य का निर्माण हुआ, जो एक प्राकृतिक, स्वतन्त्र,
और आत्मनिर्भर संगठन था।
“लेकिन जहाँ कुटुम्ब एक व्यक्तित्व द्वारा शासित होता है, वहीं संवैधानिक
सरकारों में व्यक्ति स्वतन्त्र और अपने शासकों के समान होते हैं।
“प्राकृतिक सामाजिक मैत्री और परस्पर लाभ से एकता गठित होती है। मनुष्य
अपने स्वभाव से एक राजनीतिक ( सामाजिक ) प्राणी है।
“राज्य एक संश्रय से कहीं अधिक है, जिससे व्यक्ति जुड़ सकते हैं या बिना
कोई फ़र्क़ पड़े छोड़ सकते हैं, लेकिन स्वतन्त्र या नागरिकतारहित मनुष्य
अविश्वसनीय, असभ्य, और एक नागरिक से भिन्न कोई चीज़ होता है।
प्लेटो :
प्लेटो ने एक ऐसे निकाय के रूप में राज्य की इस अवधारणा का पूर्वानुमान
किया था जिसके सदस्य एक सर्वमान्य लक्ष्य के लिए सामंजस्यपूर्ण ढंग से
संयुक्त हों।
अरस्तू :
अरस्तू का मानना था कि जहाँ स्वतन्त्रता और समानता हो, वहाँ बारी-बारी से
शासन और अधीनीकरण हो, लेकिन सबसे अच्छा यही है कि यदि सम्भव हो तो,
वे ही व्यक्ति हमेशा शासन करते रहें।
प्लेटो के साम्यवाद के विरोध में उसकी दलील बाक़ायदा नियम निर्धारित
निजी सम्पत्ति के पक्ष में थी, जिसके पीछे उसका विचार यह था कि राज्य में
सिर्फ़ एक नैतिक एकता ही सम्भव या वांछनीय है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 637

( सरकारों के प्रकार )
उसने सरकारों को राजतन्त्रों, कुलीनतन्त्रों और गणतन्त्रों तथा क्रमशः उनके
विकृत रूपों, जैसे निरंकुश तन्त्रों, अल्पतन्त्रों और जनतन्त्रों में वर्गीकृत किया,
जिसका आधार यह था कि इनमें सर्वोच्च सत्ता एक या कुछ या कई के हाथों में
होती है, और इनका उद्देश्य सामान्य हित या शासकों का निजी हित होता है तथा
इनमें स्वतन्त्रता, सम्पदा, संस्कृति और कुलीनता को भी तवज्जो दी जाती है।
प्रत्येक राज्य व्यवस्था के तीन अंग होते हैं : (1) विमर्शात्मक
(2) कार्यात्मक और (3) न्यायिक निकाय। नागरिकता का निर्धारण न तो
निवास से होता है न ही कानूनी अधिकार रखने से, बल्कि न्यायिक सत्ता और
सरकारी कामकाज में भागीदारी से होता है।
नैतिकता का एक निश्चित स्तर प्राप्त करके कइयों को शासन करना चाहिए,
क्योंकि अलग-अलग व्यक्तिगत तौर पर कम योग्य होने के बावजूद, वे सम्मिलित
रूप से, कुछेक चुनिन्दा व्यक्तियों से कहीं अधिक चतुर और अधिक सद्गुणसम्पन्न
होते हैं। लेकिन सारी विमर्शात्मक और न्यायिक कार्यवाहियों को संभालने के
बावजूद, उन्हें उच्चतम कार्यात्मक पदों से बाहर ही रखना चाहिए। सबसे
अच्छी राज्यव्यवस्था वह है जिसमें बहुत धनी और बहुत ग़रीब के बीच का
मध्यम वर्ग सरकार चलाये, कारण कि इस वर्ग का जीवन सबसे स्थायी होता है
तथा यह सबसे विवेकसम्मत, और साथ ही संवैधानिक कार्यवाही में सबसे सक्षम
भी होता है। [पृष्ठ 167 (102) पर जारी] वस्तुतः इसी के लिए यह कहा जाता
है कि सम्प्रभुता को नागरिकों की बहुसंख्या में निहित होना चाहिए, जिसमें
बेशक दास नहीं आते।
जनतन्त्र व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के मामले में समानता पर एकमत होते हैं,
जिसका निहितार्थ यह है कि सभी नागरिक, राज्य के पदों पर आसीन होने या चुने
जाने के लिए, तथा हरेक सब पर और सभी हरेक पर शासन करने के लिए अर्हय
होते हैं।
अरस्तू भी, प्लेटो की भाँति ही जनतन्त्र को सरकार का एक विकृत रूप मानता
था, और कहता था कि यह अन्य किसी प्रकार के राज्यों की अपेक्षा बड़े राज्यों
के लिए अधिक उपयुक्त है।
स्टोइकवादी : सिनिकवादी :
एपिक्यूरसवादी : एपिक्यूरस¹ का कहना था, “न्याय स्वयं में कुछ नहीं है, यह
बस परस्पर नुक़सान रोकने के लिए (न्याय के आधार के तौर पर) समझौते

  1. एपिक्यूरस : (341-270 ई.पू.) यूनानी दार्शनिक, जो मानता था कि आत्मसंयम से जीवन
    सुखमय बनाया जा सकता है। नैतिकता सन्तोषप्राप्ति का एक साधन है।
    638 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की एक तरकीबभर है।
स्टोइक : (वाद)
दार्शनिक ज़ेनो (340-260 ई.पू.)¹ का एक शिष्य, जिसने एथेंस के ‘स्टोआ
पॉइकलाइट’ (पेण्टेड पोर्च) नामक बग़ीचे में अपनी दार्शनिक शाखा का
शिक्षण-संस्थान खोला। बाद में कैटो द यंगर², सेनेका³, मार्क्यूस ऑरिलियस⁴ रोमन
स्टोइकवादी हुए। स्टोइक शब्द का शाब्दिक अर्थ है : ‘वह व्यक्ति जो सुख या दुख
के प्रति विरक्त हो।’
स्टोइकवाद पुराने दर्शन की एक शाखा है, जो जीवन और कर्तव्य के प्रति
अपने दृष्टिकोण में एपीक्यूरसवाद का प्रबल विरोधी है; और सुख या दुख के प्रति
उदासीन है।
सिनिकवाद :
दार्शनिकों का एक सम्प्रदाय जिसकी स्थापना एथेंस के एण्टीस्थेनीज⁵ (जन्म
444 ई.पू.) ने की थी, जिसकी अभिलाक्षणिक विशिष्टता धन-दौलत, कला,
विज्ञान और आमोद-प्रमोद के विरुद्ध एक प्रकट घृणा के रूप में थी। इन्हें सिनिक
इनके रूखे व्यवहार के कारण कहा जाता है। सिनिकवाद कभी-कभी मानव-
स्वभाव के प्रति तिरस्कार भावना के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
एपीक्यूरसवादी :
एपीक्यूरस (341-270 ई.पू.) एक यूनानी दार्शनिक था, जिसकी शिक्षा थी
कि सुख ही असली चीज़ है। एपीक्यूरसवादी उसे कहा जाता है जो खाओ-पीओ
और मौज-मस्ती में विश्वास करता है।


  1. ज़ेनो : यूनानी दार्शनिक, जो आत्मसंयम और प्रकृति की संगति में जीवन जीने का हिमायती
    था।
  2. कैटो द यंगर (95-46 ई.पू.) : रोमन दार्शनिक जो स्टोइकवादियों का संरक्षक सन्त बना।
  3. सेनेका : पूरा नाम ल्यूसियस एनीयस सेनेका (4 ई.पू.-65 ई.) : रोमन लेखक और
    राजनीतिज्ञ तथा रोमन सम्राट नीरो का शिक्षक, जिसने स्टोइकवाद पर कई निबन्ध और दुखान्त
    नाटक भी लिखे। थोड़े समय के लिए वह एक तरह से रोम का शासक भी रहा, फिर बाद
    में आत्महत्या करने की सज़ा मिली।
  4. मार्कस आरेलियस एन्तोनियस : (121-180 ई.) : रोमन दार्शनिक और सम्राट
    (161-180 ई. तक)। उसने मेडिटेशंस नाम से एक क्लासिकीय स्टोइकवादी ग्रन्थ लिखा।
  5. एण्टीस्थेनीज़ (444-365 ई. पू.) : सुकरात से प्रभावित यूनानी दार्शनिक। उसके सादगी
    भरे जीवन और शिक्षाओं ने ग़रीबों को आकर्षित किया।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 639

पृष्ठ 168 (103)
रोमन राज्य-व्यवस्था
रोमनों ने राजनीतिक सिद्धान्त में कम ही ऐसा इज़ाफ़ा किया गया जिसका
प्रत्यक्ष महत्त्व हो, लेकिन एक घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित विभाग, यानी विधिशास्त्र
में – उन्होंने गहरी रुचि वाला और मूल्यवान योगदान किया।
गणतन्त्र के अन्तर्गत, “नागरिक क़ानून” (जस-सिविक)
जस-सिविक के अतिरिक्त, जस-जेण्टियम (राष्ट्र के क़ानून) नाम से
जस-जेण्टियम ढेरों नियम और सिद्धान्त अस्तित्व में आ चुके थे, जो इतालवी
क़बीलों के बीच प्रचलित सामान्य विशेषताओं को प्रतिबिम्बित करते थे।
महान रोमन ज्यूरिस-कंसल्ट्स (क़ानून-विज्ञान के विशेषज्ञ)
जस नेचुरेल (स्तोइकवादियों के विचार से प्रेरणा लेकर) धीरे-धीरे प्रकृति
के क़ानून (जस नेचुरेल) को जस-जेण्टियम के समरूप मानने लगे।
उनकी शिक्षा थी कि यह क़ानून दैवीय और शाश्वत था, और कि यह किन्हीं
विशिष्ट राज्यों के क़ानूनों से अपनी भव्यता और वैधता में कहीं अधिक श्रेष्ठ था।
प्राकृतिक क़ानून को वास्तव में अस्तित्वमान माना जाता था, और इसे नागरिक
क़ानून से सम्बद्ध समझा जाता था।
एण्टोनियाई काल¹ में, जब रोमन क़ानून अपना चरम विकास कर चुका था
और स्तोइकवादी सिद्धान्त सर्वाधिक प्रभावी हो चुके थे, तब विधिवेत्ताओं ने
राजनीतिक सिद्धान्तों के रूप में नहीं, बल्कि न्यायशास्त्रीय रूप से, यह सिद्धान्त
सूत्रबद्ध किया कि :
“सारे मनुष्य जन्मजात स्वतन्त्र होते हैं।”
और कि प्रकृति के क़ानून से, “सारे मनुष्य समान होते हैं” – जिसका
निहितार्थ यह था कि भले ही नागरिक क़ानून में वर्ग-भेद की मान्यता थी, प्रकृति
के क़ानून के समक्ष समूची मानवजाति बराबर थी।
रोमन राज्य व्यवस्था में सामाजिक समझौता :
यद्यपि रोमन विधिवेत्ताओं ने नागरिक समाज की उत्पत्ति के तौर पर किसी
समझौते को स्वीकार नहीं किया था फिर भी स्वीकृत अधिकारों और दायित्वों को
एक कल्पित, लेकिन ग़ैर-मौजूद समझौते से निगमित करने की एक रुझान मौजूद
थी।

  1. रोमन सम्राट एण्टोनियस पायस (86-161 ई.) का शासनकाल (138-161 ई.)। उसका
    शासनकाल शान्ति और उत्तम प्रशासन का काल माना जाता है।
    640 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सम्प्रभुता के मामले में, नागरिक कोमिटिया ट्रिब्यूरा¹ में एकत्र होकर, गणतन्त्र
के स्वर्णिम दिनों में, सर्वोच्च सत्ता के रूप में काम करते थे।
साम्राज्य के अन्तर्गत, सम्प्रभु सत्ता सम्राट में निहित थी, और बाद के ज्यूरिस
कंसल्ट्स के अनुसार, जनता लेक्स रेजिया² के अनुसार, सर्वोच्च कमान प्रत्येक
सम्राट को, उसके शासन के शुरू होते ही, सौंप देती थी, और इस प्रकार शासन
करने और क़ानून बनाने के अपने सारे अधिकार उसे सौंप देती थी।
पृष्ठ 169 (104)
मध्य युग
(टॉमस एक्विनास)
टॉमस एक्विनास³ : (1226-1274) के बारे में कहा जाता है कि वह मध्य
युग के राजनीतिक सिद्धान्त का प्रमुख प्रवर्तक था। उसने, रोमन विधिवेत्ताओं का
अनुसरण करते हुए, एक प्राकृतिक क़ानून को मान्यता दी, जिसके सिद्धान्त मानवीय
विवेक में दैवीय रूप से निविष्ट किये गये (माने गये – स.) और इसके साथ ही
उसने उन प्रत्यक्ष क़ानूनों को भी मान्यता दी, जो भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न
हुआ करते थे।
उसका कहना था कि क़ानून बनाने वाली सत्ता, जोकि सम्प्रभुता की अनिवार्य
विशेषता होती है, सामान्य कल्याण की दिशा में निर्देशित होनी चाहिए, और कि
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, इसे बहुसंख्यक जनता या उसके प्रतिनिधि,
राजा, से सम्बद्ध होना चाहिए। उसे राजा, कुलीनों, और जनता की
मिली-जुली सरकार सर्वोत्तम प्रतीत होती थी जिसमें सर्वोच्च सत्ता के रूप में पोप
हो।
पादुआ का मार्सिलिओ⁴
(1328 में निधन)
समझौते की धारणा
अपनी कृति ‘डिफेंसर पैसिस’ में पादुआ के मार्सिलिओ ने लोकाधारित

  1. राजकीय या शाही कमेटी, जो सम्राट द्वारा गठित की जाती थी।
  2. राजकीय क़ानून
  3. टॉमस एक्विनास (1226-1274) : इतालवी दार्शनिक
  4. पादुआ का मार्सिलिओ (मृत्यु 1328 ई.) : इटली के पादुआ शहर का निवासी
    राजनीतिक सिद्धान्तकार जिसने चर्च और राज्य को एक-दूसरे से पृथक करने को लेकर
    बादशाह लुई चतुर्थ के लिए डिफेंसर पैसिस ग्रन्थ लिखा, जो काफ़ी विवादास्पद सिद्ध हुआ।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 641

सम्प्रभुता के सिद्धान्त की हिमायत की, और लौकिक सत्ता के प्रति उन पोपवादी
पाखण्डों का विरोध किया, जो फाल्सो डिक्रिटल्स पर आधारित थे।
(जनता की सम्प्रभुता)
चूँकि मनुष्य ने नागरिक जीवन अपने पारस्परिक हित के लिए अपनाया
इसलिए क़ानून भी नागरिक के निकाय द्वारा ही बनाये जाने चाहिए; क़ानून जब
तक उन लोगों द्वारा नहीं बनाये जाते, जिनके हित इनसे सीधे प्रभावित होते हैं और
जिन्हें पता होता है कि उनकी आवश्यकताएँ क्या हैं, तब तक न तो वे सर्वोत्तम
कहे जा सकते हैं, और न ही उनका तत्परता से पालन किया जा सकता है।
उसने दावे के साथ कहा कि क़ानून बनाने वाली सत्ता जनता में निहित
होती है, और कि विधायिका का काम कार्यपालिका का गठन करना है, लेकिन
वह उसे भी परिवर्तित या रद्द कर सकती है।
पुनर्जागरण – सुधार!!
पुनर्जागरण में, ज्ञान के सभी क्षेत्र जागरूक हो उठे और जो लीकबद्ध दर्शन
हज़ारों वर्षों से धर्मशास्त्र की चाकरी करता आ रहा था, अब उसका स्थान प्रकृति
और मनुष्य के एक नये दर्शन ने ले लिया, जो अधिक उदार, अधिक गहरा, और
अधिक बोधगम्य था।
बेकन¹ ने मनुष्य को अधिभूतवाद से प्रकृति और यथार्थ की ओर लौटने का
आह्वान किया।
दर्शन की शुरुआत निश्चय ही सार्वभौमिक सन्देहवाद से होनी चाहिए। लेकिन
जल्द ही यह तथ्य असन्दिग्ध पाया जाता है : मनुष्य में चिन्तनशील सिद्धान्त का
अस्तित्व। चेतना का अस्तित्व!
कार्तवादी दर्शन
सुधार काल में आत्मगत सच्चाई पर विश्वास और व्यक्ति की सत्ता का जिस
ज़ोर-शोर के साथ आह्वान किया गया वही कार्तवादी दर्शन का आधार बना।
कार्तवादी – फ्रांसीसी दार्शनिक रेने द कार्त² (1596-1650) और उसके
दर्शन से सम्बन्धित।

  1. सम्भवतः फ्रांसिस बेकन (1561-1626) : अंग्रेज़ दार्शनिक और राजनीतिज्ञ की किसी
    रचना से उद्धृत।
  2. फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ। कार्तवादी दर्शन चेतना और पदार्थ के भेद पर आधारित
    है, जो द कार्त की कृति डिस्कोर्स ऑन मैटर (1673) में उसके इस सूत्र-वाक्य से स्पष्ट
    है : कॉगनिटो अर्गो सम (Cognito ergo sum) – अर्थात “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।”
    642 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़