सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 648, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 648

सम्प्रभुता के सिद्धान्त की हिमायत की, और लौकिक सत्ता के प्रति उन पोपवादी
पाखण्डों का विरोध किया, जो फाल्सो डिक्रिटल्स पर आधारित थे।
(जनता की सम्प्रभुता)
चूँकि मनुष्य ने नागरिक जीवन अपने पारस्परिक हित के लिए अपनाया
इसलिए क़ानून भी नागरिक के निकाय द्वारा ही बनाये जाने चाहिए; क़ानून जब
तक उन लोगों द्वारा नहीं बनाये जाते, जिनके हित इनसे सीधे प्रभावित होते हैं और
जिन्हें पता होता है कि उनकी आवश्यकताएँ क्या हैं, तब तक न तो वे सर्वोत्तम
कहे जा सकते हैं, और न ही उनका तत्परता से पालन किया जा सकता है।
उसने दावे के साथ कहा कि क़ानून बनाने वाली सत्ता जनता में निहित
होती है, और कि विधायिका का काम कार्यपालिका का गठन करना है, लेकिन
वह उसे भी परिवर्तित या रद्द कर सकती है।
पुनर्जागरण – सुधार!!
पुनर्जागरण में, ज्ञान के सभी क्षेत्र जागरूक हो उठे और जो लीकबद्ध दर्शन
हज़ारों वर्षों से धर्मशास्त्र की चाकरी करता आ रहा था, अब उसका स्थान प्रकृति
और मनुष्य के एक नये दर्शन ने ले लिया, जो अधिक उदार, अधिक गहरा, और
अधिक बोधगम्य था।
बेकन¹ ने मनुष्य को अधिभूतवाद से प्रकृति और यथार्थ की ओर लौटने का
आह्वान किया।
दर्शन की शुरुआत निश्चय ही सार्वभौमिक सन्देहवाद से होनी चाहिए। लेकिन
जल्द ही यह तथ्य असन्दिग्ध पाया जाता है : मनुष्य में चिन्तनशील सिद्धान्त का
अस्तित्व। चेतना का अस्तित्व!
कार्तवादी दर्शन
सुधार काल में आत्मगत सच्चाई पर विश्वास और व्यक्ति की सत्ता का जिस
ज़ोर-शोर के साथ आह्वान किया गया वही कार्तवादी दर्शन का आधार बना।
कार्तवादी – फ्रांसीसी दार्शनिक रेने द कार्त² (1596-1650) और उसके
दर्शन से सम्बन्धित।

  1. सम्भवतः फ्रांसिस बेकन (1561-1626) : अंग्रेज़ दार्शनिक और राजनीतिज्ञ की किसी
    रचना से उद्धृत।
  2. फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ। कार्तवादी दर्शन चेतना और पदार्थ के भेद पर आधारित
    है, जो द कार्त की कृति डिस्कोर्स ऑन मैटर (1673) में उसके इस सूत्र-वाक्य से स्पष्ट
    है : कॉगनिटो अर्गो सम (Cognito ergo sum) – अर्थात “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।”
    642 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़