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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 788 में से

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पृष्ठ 644

( सरकारों के प्रकार )
उसने सरकारों को राजतन्त्रों, कुलीनतन्त्रों और गणतन्त्रों तथा क्रमशः उनके
विकृत रूपों, जैसे निरंकुश तन्त्रों, अल्पतन्त्रों और जनतन्त्रों में वर्गीकृत किया,
जिसका आधार यह था कि इनमें सर्वोच्च सत्ता एक या कुछ या कई के हाथों में
होती है, और इनका उद्देश्य सामान्य हित या शासकों का निजी हित होता है तथा
इनमें स्वतन्त्रता, सम्पदा, संस्कृति और कुलीनता को भी तवज्जो दी जाती है।
प्रत्येक राज्य व्यवस्था के तीन अंग होते हैं : (1) विमर्शात्मक
(2) कार्यात्मक और (3) न्यायिक निकाय। नागरिकता का निर्धारण न तो
निवास से होता है न ही कानूनी अधिकार रखने से, बल्कि न्यायिक सत्ता और
सरकारी कामकाज में भागीदारी से होता है।
नैतिकता का एक निश्चित स्तर प्राप्त करके कइयों को शासन करना चाहिए,
क्योंकि अलग-अलग व्यक्तिगत तौर पर कम योग्य होने के बावजूद, वे सम्मिलित
रूप से, कुछेक चुनिन्दा व्यक्तियों से कहीं अधिक चतुर और अधिक सद्गुणसम्पन्न
होते हैं। लेकिन सारी विमर्शात्मक और न्यायिक कार्यवाहियों को संभालने के
बावजूद, उन्हें उच्चतम कार्यात्मक पदों से बाहर ही रखना चाहिए। सबसे
अच्छी राज्यव्यवस्था वह है जिसमें बहुत धनी और बहुत ग़रीब के बीच का
मध्यम वर्ग सरकार चलाये, कारण कि इस वर्ग का जीवन सबसे स्थायी होता है
तथा यह सबसे विवेकसम्मत, और साथ ही संवैधानिक कार्यवाही में सबसे सक्षम
भी होता है। [पृष्ठ 167 (102) पर जारी] वस्तुतः इसी के लिए यह कहा जाता
है कि सम्प्रभुता को नागरिकों की बहुसंख्या में निहित होना चाहिए, जिसमें
बेशक दास नहीं आते।
जनतन्त्र व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के मामले में समानता पर एकमत होते हैं,
जिसका निहितार्थ यह है कि सभी नागरिक, राज्य के पदों पर आसीन होने या चुने
जाने के लिए, तथा हरेक सब पर और सभी हरेक पर शासन करने के लिए अर्हय
होते हैं।
अरस्तू भी, प्लेटो की भाँति ही जनतन्त्र को सरकार का एक विकृत रूप मानता
था, और कहता था कि यह अन्य किसी प्रकार के राज्यों की अपेक्षा बड़े राज्यों
के लिए अधिक उपयुक्त है।
स्टोइकवादी : सिनिकवादी :
एपिक्यूरसवादी : एपिक्यूरस¹ का कहना था, “न्याय स्वयं में कुछ नहीं है, यह
बस परस्पर नुक़सान रोकने के लिए (न्याय के आधार के तौर पर) समझौते

  1. एपिक्यूरस : (341-270 ई.पू.) यूनानी दार्शनिक, जो मानता था कि आत्मसंयम से जीवन
    सुखमय बनाया जा सकता है। नैतिकता सन्तोषप्राप्ति का एक साधन है।
    638 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़