भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
अंग्रेज़ मज़दूर नेताओं का विश्वासघात
1911 से 1913 तक के वर्ष आमतौर पर खदान मज़दूर, रेलकर्मियों और परिवहन
मज़दूरों के बेमिसाल वर्ग-संघर्षों का समय था। अगस्त 1911 में, रेलवे की राष्ट्रीय,
दूसरे शब्दों में, आम हड़ताल, फूट पड़ी थी। उन दिनों ब्रिटेन के ऊपर क्रान्ति की एक
धुँधली छाया मँडरा रही थी। लेकिन नेतागण ने इस आन्दोलन को पंगु कर डालने के
लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी। उनका इरादा "देशभक्ति" का था; यह हरकत
अगादिर की उस घटना के समय की जा रही थी, जिसने जर्मनी के साथ युद्ध का
ख़तरा उपस्थित कर दिया था। जैसाकि आज भलीभाँति मालूम है, प्रधानमन्त्री ने
मज़दूर-नेताओं को एक गुप्त बैठक में बुलाया और उनसे पितृभूमि की रक्षा की अपील
की। और नेताओं ने, बुर्जुआ वर्ग को मज़बूत करने के लिए अपने बूतेभर सब कुछ
दिया, और इस प्रकार साम्राज्यवादी नरसंहार के लिए रास्ता साफ़ किया।
(पृष्ठ 3) ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग?$^1$
त्रात्स्की$^2$
<u>पृष्ठ 56 (53)</u>
विश्वासघात :
केवल 1920, यानी 'काले शुक्रवार' के बाद ही, आन्दोलन सीमाओं में वापस
लौटा, जब ख़ानकर्मियों, रेलकर्मियों और परिवहनकर्मियों के त्रिपक्षीय संश्रय के
नेताओं ने आम हड़ताल के साथ विश्वासघात कर दिया।
(पृष्ठ 3)$^3$
सुधार के लिए क्रान्ति का ख़तरा ज़रूरी है :
...ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने यह समझ लिया था कि ऐसे उपाय (सुधार) के जरिये
क्रान्ति को टाला जा सकता है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि सुधारों तक
- त्रात्स्की की कृति ह्वेयेर इज़ ब्रिटेन गोइंग?
- लिओन त्रात्स्की : लेव दवीदोविच त्रात्स्की (1879-1940) – लेनिनवाद के घोर
विरोधी। रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी (बोल्शेविक) की छठी कांग्रेस में (1917)
बोल्शेविक पार्टी के सदस्य बन गये। अक्टूबर क्रान्ति में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी। क्रान्ति के
बाद कई सरकारी पदों पर रहे। 1923 में पार्टी की आम नीति और समाजवाद के निर्माण
के लेनिन के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ गुटबाज़ी भरा संघर्ष चलाया तथा इस बात का प्रचार
किया कि सोवियत संघ में समाजवाद की विजय असम्भव है। कम्युनिस्ट पार्टी ने
त्रात्स्कीवाद को पार्टी में निम्न पूँजीवादी प्रवृत्ति के रूप में बेनकाब किया और उसे संगठन
व विचारधारा के दृष्टिकोण से पराजित किया। त्रात्स्की 1927 में पार्टी से निकाल दिये गये
ओर 1929 में सोवियत विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें देश निकाला दे दिया गया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 603
को भी लागू करवाने के लिए, सिर्फ़ धीरे-धीरे काम करते रहने का सिद्धान्त पर्याप्त
नहीं है, और कि क्रान्ति का एक वास्तविक ख़तरा ज़रूरी है।
(पृष्ठ 29)¹
सामाजिक एकता :
...ऐसा हो सकता है कि एक बार जब हम एक ऐसे विशेषाधिकारप्राप्त वर्ग
के सफाये के लिए उठ खड़े हों, जो रंगमंच से हटना न चाहता हो, तब वर्ग-संघर्ष
की बुनियादी अन्तर्वस्तु, उसी में निहित प्रतीत हो। लेकिन नहीं। मैकडोनाल्ड²
सामाजिक एकता की चेतना “जागृत” करना चाहते हैं। पर किसकी? मज़दूर वर्ग
की एकता तो बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध संघर्ष में उसकी आन्तरिक सुसम्बद्धता की
अभिव्यक्ति होती है।
मैकडोनाल्ड जिस सामाजिक एकता का उपदेश देते हैं, वह शोषकों के साथ
शोषितों की एकता, या दूसरे शब्दों में, शोषण को बनाये रखने के अलावा और कुछ
नहीं है।³
क्रान्ति एक आफ़त :
“रूस की क्रान्ति ने” मैकडोनाल्ड के कथनानुसार, “हमें बड़ा सबक
सिखाया। इसने दिखा दिया कि क्रान्ति एक बरबादी और विपदा के सिवाय और
कुछ नहीं है।” [पृष्ठ 57 (54) पर जारी]
क्रान्ति तो विपदा को ही जन्म देती है लेकिन ब्रिटिश जनतन्त्र ने तो
साम्राज्यवादी युद्ध को जन्म दे दिया...जिसकी बरबादी की तुलना क्रान्ति की
विपदाओं से तो निश्चित तौर पर तनिक भी नहीं की जा सकती। फिर भी, जिस
क्रान्ति ने ज़ारशाही, कुलीनतन्त्र और बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंका, चर्च को हिला
कर रख दिया, 13 करोड़ लोगों के एक राष्ट्र या राष्ट्रों के एक समूचे कुल में, एक
नये जीवन का संचार किया, उसके सामने यह घोषणा करने के लिए कि
— क्रान्ति एक विपदा के सिवाय और कुछ नहीं है – ऐसे ही बहरे कानों और
निर्लज्ज चेहरों की ज़रूरत है।
(पृष्ठ 64)⁴
- वही
- सम्भवतः जेम्स रैम्ज़े मैकडोनाल्ड (1866-1937) : ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता और दो
बार प्रधानमन्त्री - ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग? 4. वही
604 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शान्तिपूर्ण?
कब और कहाँ सत्ताधारी वर्ग ने शान्तिपूर्ण मतदान के जरिये कभी सत्ता और
सम्पत्ति सौंपी है – और वह भी, खासतौर से ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने, जो सदियों
से दुनियाभर में लूटपाट करता आया है? (पृष्ठ 66)¹
समाजवाद का लक्ष्य : शान्ति
यह एकदम निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद का लक्ष्य, सर्वप्रथम रूप से,
ताक़त के सबसे भोंड़े और ख़ूनी रूपों को ख़त्म करना है, और फिर उसके बाद
उसके और छिपे रूपों को भी ख़त्म करना है। (पृष्ठ 80)
“ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग?”, त्रात्स्की
विश्व क्रान्ति का लक्ष्य :
- पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना
- मानवता की सेवा के लिए प्रकृति का नियन्त्रण करना।
बुख़ारिन ने इसे ऐसे ही परिभाषित किया।
<u>पृष्ठ 58 (55)</u>
आदमी और मशीनरी
द युनाइटेड स्टेट्स ब्यूरो ऑफ़ लेबर का कहना है :
– मशीन पर काम करके एक आदमी 1 घण्टा 34 मिनट में पिनों का 12 पौण्ड
का पैकेट तैयार कर सकता है।
– अगर आदमी मशीन पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ औज़ारों से काम करे तो उतने ही
काम में 140 घण्टा 55 मिनट का समय लगेगा।
(अनुपात – 1.34 : 140.55 मिनट)
– मशीन पर काम करके 100 जोड़े जूते बनाने में 234 घ. 25 मिनट लगते हैं।
– हाथ से इसमें 1,831 घण्टे 40 मिनट लगेंगे।
– मशीन पर काम करने पर श्रम की लागत $ 69.55 आती है।
– हाथ से...$ 457.79 आती है।
– मशीनी श्रम द्वारा 500 गज चारख़ानेदार कपड़ा तैयार करने में 73 घण्टे लगते हैं।
– हाथ के श्रम द्वारा, इसमें 5,844 घण्टे लगते हैं।
– मशीनी श्रम द्वारा 100 पौण्ड सिलाई का सूती धागा 39 घण्टों में तैयार होता है।
– हाथ से इसमें 2,895 घण्टे लगते हैं। - वही
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 605
पुनश्चः कृषि :
– एक भला-चंगा आदमी हँसुआ से एक एकड़ फ़सल एक दिन (12 घं.) में
काट सकता है।
– एक मशीन उसी काम को 20 मिनट में कर देती है।
– छः आदमी मूसल से 60 लीटर गेहूँ की मंडाई आधे घण्टे में कर सकते हैं।
– एक मशीन उतने ही समय में 12 गुना अधिक काम कर सकती है।
“मशीनरी के इस्तेमाल से मानव-श्रम की प्रभावकारिता में होने वाली बढ़ोत्तरी...राई
के मामले में 150 प्रतिशत से लेकर जौ के मामले में 2,244 प्रतिशत तक हो जाती
है...।”¹
पृष्ठ 59 (56)
सं.रा.अ. और उसकी आबादी की सम्पदा : ( 1850-1912 )²
प्रति व्यक्ति कुल आबादी
1850 में कुल सम्पदा थी
$ 7,135,780,000 $ 308 = 23,191,876
1860 $ 16,159,616,000 $ 514 = 31,443,321
1870 $ 30,068,518,000 $ 780 = 38,558,371
1880 $ 43,642,000,000 $ 870 = 50,155,783
1890 $ 65,037,091,000 $ 1,036 = 62,947,714
1900 $ 88,517,307,000 $ 1,165 = 75,994,575
1904 $ 107,104,202,000 $ 1,318 = 82,466,551
1912 $ 187,139,071,000 $ 1,965 = 95,40503
मशीनरी इस्तेमाल के कारण।
मशीन अपनी प्रकृति में सामाजिक है, जैसेकि औज़ार व्यक्तिगत था।³
“हमें ख़राब कपड़ा दो, लेकिन हमें बेहतर आदमी दो”, एमर्सन⁴ का कहना
है।
“सुखण्डी रोग से मरते शिशुओं की प्राण-रक्षा करो, फिर उसके बाद कपड़ा
व्यापार को तरजीह दो।” पृष्ठ 81⁵
- स्रोत अज्ञात 2. स्रोत अज्ञात 3. अज्ञात
- रैल्फ वाल्डो एमर्सन (1803-1882) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि, चिन्तक और निबन्धकार
- टॉमस कार्लाईल (1795-1881), पास्ट एण्ड प्रेज़ेण्ट, बुक IV
606 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आदमी को मशीन पर कुर्बान नहीं किया जा सकता। मशीन को निश्चय ही
मानवजाति की सेवा में लगना चाहिए, जबकि अभी ही इस औद्योगिक व्यवस्था
में मानवजाति के ऊपर भारी कहर बरपा होने का ख़तरा मँडराने लगा है।
पॉवर्टी एण्ड रिचेज़ (पृष्ठ 81), स्काट नीअरिंग ¹
पृष्ठ 60 (57)
आदमी और मशीनरी :
सी. नैनफ़ोर्ड हेण्डरसन अपनी कृति “रे डे” में लिखता है :
यह उद्योग की संस्था, जो सभी संस्थाओं में सबसे पुरानी है, मानवजाति को
चीज़ों की निरंकुशता से मुक्त करने की गरज से संगठित और विकसित हुई, लेकिन
अब यह स्वयं उससे बड़ी निरंकुशता बन चुकी है, जो विशाल आबादी को गुलामों
की दशाओं में – ऐसे गुलामों की दशाओं में धकेलती जा रही है जो लम्बे और
थका देने वाले घण्टों तक काम करते हुए, ढेरों चीजें पैदा करते रहने के लिए
अभिशप्त हैं, जबकि वे जो चीजें पैदा करते हैं, खुद उन्हीं के अभाव से त्रस्त रहने
के लिए विवश हैं।
“पाव. रिचेज़, (पृष्ठ 87) ”
आदमी मशीनरी के लिए नहीं है :
आदमी ने इस्पात और आग के संयोग से जो चीज़ पैदा की है और जिसे मशीन
कहा है, उसे निश्चय ही हमेशा मनुष्य का स्वामी नहीं, बल्कि सेवक ही रहना
चाहिए। न तो मशीन और न ही मशीन के मालिक को मानवजाति पर शासन करने
का अधिकार है। पृष्ठ 88
साम्राज्यवाद :
साम्राज्यवाद विकास के उस चरण का पूँजीवाद है जिसमें इज़ारेदारियों और
वित्तीय पूँजी ने एक प्रभुत्वकारी प्रभाव हासिल कर लिया है, निर्यात-पूँजी भारी
महत्त्व प्राप्त कर चुकी है, अन्तरराष्ट्रीय ट्रस्टों ने दुनिया का बँटवारा करना शुरू कर
दिया है, और सबसे बड़े पूँजीवादी देशों ने पृथ्वी के समूचे भौगोलिक क्षेत्रफल
का आपस में बँटवारा पूरा कर लिया है।” – लेनिन ²
- स्कॉट नीअरिंग (1883-1983) : अमेरिकी पर्यावरणवादी, युद्धविरोधी कार्यकर्ता,
प्रचारक और लेखक। पॉवर्टी एण्ड रिचेज़ 1916 में प्रकाशित हुई थी। - वी.आई. लेनिन, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद की चरम अवस्था
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 607
पृष्ठ 61 (58)
अधिनायकत्व :
अधिनायकत्व एक सत्ता है जो सीधे ताक़त पर आधारित होती है, और किसी
क़ानून से नहीं बँधी होती।
सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी अधिनायकत्व एक ऐसी सत्ता है जो बुर्जुआ वर्ग
के विरुद्ध और उसके ऊपर, सर्वहारा वर्ग द्वारा ताक़त की बदौलत लागू की जाती
है, और जो किसी क़ानून से नहीं बँधी होती।
प्रोलि. रिवो.¹ (पृष्ठ 18) – लेनिन
―――o―――
क्रान्तिकारी अधिनायकत्व :
क्रान्ति एक कार्रवाई है जिसके तहत आबादी का एक तबका दूसरे तबकों
पर रायफलों, संगीनों, बन्दूकों और ऐसे ही अन्य अत्यन्त सत्तावादी उपायों के
जरिये, अपनी इच्छा आरोपित करता है। और जो पक्ष विजयी होता है वह अपना
शासन आवश्यक रूप से, उस भय के जरिये स्थापित करता है, जिसे उसके
हथियार प्रतिक्रियावादियों में उत्पन्न करते हैं। यदि पेरिस के कम्यून ने बुर्जुआ वर्ग
के ख़िलाफ़ हथियारबन्द जनता पर भरोसा नहीं किया होता, तो क्या वह
अपनेआप को चौबीस घण्टे से भी अधिक क़ायम रख सका होता? इसके
विपरीत, क्या हमारी यह आलोचना जायज़ नहीं है कि कम्यून ने इस सत्ता का
बहुत ही कम इस्तेमाल किया?
– एफ. एंगेल्स ²
―――o―――
बुर्जुआ जनतन्त्र :
बुर्जुआ जनतन्त्र, सामन्तवाद की तुलना में, एक महान ऐतिहासिक प्रगति होने
के बावजूद, एक बहुत ही सीमित, बहुत ही पाखण्डपूर्ण संस्था, धनिकों के लिए
एक स्वर्ग और शोषितों एवं ग़रीबों के लिए एक जाल और छलावे के अलावा न
तो कुछ है, और न ही हो सकता है।
लेनिन (पृष्ठ 28)³
―――――――――――――――
- लेनिन, सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउट्स्की से
- फ्रेडरिक एंगेल्स, सत्ता के बारे में से
- वही
608 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
<u>पृष्ठ 62 (59)</u>
श्रम का शोषण और राज्य :
“सिर्फ़ प्राचीन और सामन्ती ही नहीं, बल्कि आज का प्रतिनिधि राज्य भी पूँजी
द्वारा उजरती श्रम के शोषण का एक उपकरण ही है।”
– एंगेल्स¹
अधिनायकत्व :
“चूँकि राज्य सिर्फ़ एक अस्थायी संस्थाभर है जिसका उपयोग अपने शत्रुओं
का बलपूर्वक दमन करने के लिए क्रान्ति में किया जाता है, इसलिए जनता के
स्वतन्त्र राज्य की बात करना कोरी बकवास है, जब तक सर्वहारा वर्ग को राज्य की
आवश्यकता रहती है, तब तक इसकी आवश्यकता स्वतन्त्रता के हित में नहीं,
बल्कि अपने विरोधियों का दमन करने के लिए पड़ती है, और जैसे ही स्वतन्त्रता
की बात करना सम्भव हो जाता है, वैसे ही इसका अस्तित्व अपनेआप ख़त्म हो
जाता है।”
बेबेल को लिखे एंगेल्स के पत्र से, 28 मार्च, 1875²
अधीर आदर्शवादी :
अधीर आदर्शवादी के लिए – और बिना कुछ अधीरता के शायद ही आदमी
प्रभावी सिद्ध हो सके – यह लगभग तय बात है कि दुनिया को खुशहाल बनाने
की कोशिश में उसे अपने विरोधियों की घृणा का पात्र बनना होगा और निराश भी
होना पड़ सकता है।
– बर्ट्रेण्ड रसेल
<u>पृष्ठ 63 (60)</u>
नेता :
कार्लाइल³ लिखता है, “कोई भी समय बरबाद न हुआ होता”, यदि कोई
महान आदमी मिल जाता जो काफ़ी समझदार और नेक होता, जिसमें इतनी
- परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति से
- अगस्त बेबेल (1840-1913) – जर्मन तथा अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन के एक
प्रसिद्ध नेता। 1867 से जर्मन मज़दूर संघों की लीग के नेता, पहले इण्टरनेशनल के सदस्य, 1867
से राइखस्टाग (जर्मन संसद) के सदस्य, जर्मन सामाजिक-जनवाद के संस्थापकों में से एक,
मार्क्स तथा एंगेल्स के मित्र तथा सहयोगी, दूसरे इण्टरनेशनल के प्रमुख नेता - टॉमस कार्लाइल (1795-1881) : ब्रिटिश लेखक व निबन्धकार
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 609
समझदारी होती कि वह सही-सही जान ले कि वक़्त का तक़ाज़ा क्या है; जिसमें
इतना पराक्रम होता कि वक़्त के लिहाज़ से सही रास्ते पर नेतृत्व कर सकता, तब
तो इनकी बदौलत कोई भी समय मुक्ति का समय हो सकता था।
स्वेच्छाचारिता :
काउत्स्की ने “प्रोलितारियत डिक्टेटरशिप” शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी,
जिसमें उसने बोल्शेविकों द्वारा बुर्जुआ वर्ग के लोगों को वोट देने के अधिकार से
वंचित किये जाने की निन्दा की। इस पर लेनिन ने अपनी “प्रोलितारियन
रिवोल्यूशन” : (पृष्ठ 77) में लिखा :
“स्वेच्छाचारिता! ज़रा सोचें तो कि इस खेद प्रकाश में कमीनेपन के किस
निकृष्ट स्तर पर उतरकर बुर्जुआ वर्ग की चापलूसी की गयी है, और कितना अधिक
मूर्खतापूर्ण पाण्डित्य बघारा गया है। जबकि सदियों से, मज़दूरों का दमन करने के
लिए, ग़रीब लोगों के हाथ-पाँव बाँधे रखने के लिए, और जनता के सीधे-सादे और
मेहनतकश समुदायों के रास्ते में एक सौ एक अड़ंगे और अड़चनें खड़े करते रहने
के लिए, पूरी तरह से बुर्जुआ, और उसमें भी पूँजीवादी देशों के प्रतिक्रियावादी
विधिवेत्ता ही नियम-विधान बनाते आये हैं, और वे ही विविध संहिताओं और
क़ानूनों पर सैकड़ों ग्रन्थ और उनकी व्याख्याएँ लिखते आये हैं – जहाँ इतना
सब किया गया है, वहाँ बुर्जुआ उदारपन्थियों और श्री काउत्स्की को कोई
“स्वेच्छाचारिता” नहीं दिखायी देती! तब तो यह सब क़ानून-व्यवस्था है! यह सब
इसलिए सोचा और लिखा गया है कि कैसे ग़रीबों को दबाये रखकर निचोड़ते रहा
जाये। हज़ारों-हज़ार बुर्जुआ वकील और सरकारी अहलकार क़ानूनों की ऐसी
व्याख्या करते रहते हैं कि मज़दूर और औसत किसान उनकी कँटीले तारों की
घेरेबन्दी को कभी तोड़ न सकें। बेशक, यह कोई स्वेच्छाचारिता नहीं है। बेशक,
यह उन गन्दे या मुनाफ़ाखोर शोषकों का अधिनायकत्व नहीं है जो जनता का ख़ून
पी रहे हैं। ओह, यह ऐसा कुछ भी नहीं है! यह तो ‘शुद्ध जनतन्त्र’ है, जो
दिन-प्रतिदिन शुद्धतर होता जा रहा है। [पृष्ठ 64 (61) पर जारी] लेकिन जब,
साम्राज्यवादी युद्ध द्वारा सरहद पार के अपने भाइयों से अलग कर दिये गये
मेहनतकश और शोषित जनसमुदायों ने इतिहास में पहली बार अपनी सोवियतें गठित
कर ली हैं, जब उन्होंने राजनीतिक निर्माण के लिए मज़दूरों का और उन वर्गों का
आह्वान किया है जिन्हें बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़ित और जड़ बनाये रखता था, और जब
से वे एक नया सर्वहारा राज्य निर्मित करने के काम में लग गये हैं, तथा विकट
रूप से जारी युद्ध के दौरान, गृहयुद्ध की ज्वाला में, जब वे ‘शोषकों से रहित राज्य’
के बुनियादी सिद्धान्त निरूपित करने लगे, तब बुर्जुआ वर्ग के सभी पाजी तत्त्व, और
610 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
खून चूसने वालों के सभी गिरोह काउत्स्की के सुर में सुर मिलाकर, स्वेच्छाचारिता
की चीख़-पुकार मचाने लगे हैं!
(लेनिन) पृष्ठ 77-78¹
पार्टी :
लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि जब तक क्रान्ति का नेतृत्व करने के लिए
एक सक्षम पार्टी न हो, तब तक कोई क्रान्ति सम्भव नहीं हो सकती।
(पृष्ठ 15, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर, 1917)²
सर्वहारा क्रान्ति के लिए पार्टी एक अपरिहार्य उपकरण है।
(पृष्ठ 17, वही, त्रात्स्की कृत)
पृष्ठ 65 (62)
[हस्ताक्षर: BK Dutt, दिनांक: 12/7/30, 12/7/30]³
उसके (मेहनतकश, आदमी के) लिए क़ानून, नैतिकता, धर्म ये सब उसके
(सर्वहारा के) लिए नाना बुर्जुआ पूर्वाग्रह मात्र हैं, जिनकी आड़ में इतने ही बुर्जुआ
स्वार्थ घात लगाये रहते हैं।
कार्ल मार्क्स – घोषणापत्र ⁴
- लेनिन, सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउत्स्की
- लिओन त्रात्स्की की किताब, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
- पृष्ठ का ऊपरी लगभग दो-तिहाई भाग ख़ाली है। इसमें सिर्फ़ बी.के. दत्त (बटुकेश्वर
दत्त) का तिरछा हस्ताक्षर है। और दिनांक 12.7.30 दो बार अंकित है। - मार्क्स-एंगेल्स, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 611
पृष्ठ 67 (64)
BK Dutta
12th July '30
⎧ Autograph
⎪ of Mr. BK Dutta
⎪ taken on 12th July '30
⎨ in Cell No: 137
⎪ Central Jail Lahore
⎪ four days before his final
⎩ departure from this jail.
Bhagat Singh
नोटबुक में पृष्ठ 66 (63) नहीं है। इस पृष्ठ, यानी नोटबुक पृष्ठ 67 (64) पर, मध्य में,
बी.के. दत्त का तारीख़ (12.7.1930) सहित हस्ताक्षर है।
इसके नीचे भगतसिंह की लिखावट में पृष्ठ पर नीचे, दायीं तरफ़ यह टिप्पणी अंकित है :
श्री बी.के. दत्त का इस जेल से फ़ाइनल
डिपार्चर से चार दिन पहले कोठरी न. 137,
सेण्ट्रल जेल लाहौर, में 12वीं जुलाई '30
को लिया गया आटोग्राफ़,
इसके नीचे भगतसिंह के हस्ताक्षर हैं। इन प्रविष्टियों के अलावा नोटबुक में और किसी
प्रविष्टि में तारीख़ नहीं है।
नोटबुक में पृष्ठ 68 (65) नहीं है।
612 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 69 (66)
कम्युनिस्टों का लक्ष्य
“कम्युनिस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य छिपाने से घृणा करते हैं। वे खुले तौर
पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ़ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को
बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के द्वारा ही हासिल हो सकता है। शासक वर्गों को
कम्युनिस्ट क्रान्ति के भय से कांपने दो। सर्वहाराओं के पास अपनी बेड़ियों के
सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है। जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है।
दुनिया के मज़दूरो, एक हो!¹
───o───
कम्युनिस्ट क्रान्ति का लक्ष्य
“हम ऊपर देख चुके हैं, कि मज़दूर वर्ग की क्रान्ति में पहला क़दम, सर्वहारा
वर्ग को उठाकर शासक वर्ग की स्थिति में लाना है, जनवाद की लड़ाई को जीतना
है। सर्वहारा अपने राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयोग बुर्जुआ वर्ग से धीरे-धीरे करके सारी
पूँजी छीनने, उत्पादन के सभी उपकरणों को राज्य के, अर्थात शासक वर्ग के रूप
में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रीकृत करने तथा उत्पादक शक्तियों की
समग्रता में यथाशीघ्र वृद्धि करने के लिए करेगा।”
“कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो”²
पृष्ठ 70 (67)
कार्ल मार्क्स की ग़लतियाँ निकालना :
...और यह निश्चित मालूम पड़ता है कि त्रात्स्की मानो उससे सम्बन्धित थे
जिसे जर्मन “असली राजनीति” का स्कूल कहा करते थे, और किसी भी
विचारधारा के प्रति एकदम उतना ही मासूम थे जितना कि बिस्मार्क। और,
इसीलिए, यह देखकर कुतूहल होता है कि त्रात्स्की भी इतने क्रान्तिकारी नहीं हैं
कि कह सकें कि मार्क्स ने एक ग़लती की थी; बल्कि वह एक या अधिक पृष्ठ
अर्थनिरूपण के काम में – अर्थात यह सिद्ध करने में लगाना ज़रूरी समझते हैं कि
पवित्र पुस्तकों में जो कुछ कहा गया है, उसका अर्थ उससे एकदम भिन्न है।
त्रात्स्की कृत ‘लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917’ की भूमिका
भूमिका ए. सूसन लॉरेंस द्वारा लिखित
- कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का आख़िरी पैरा
- कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 613
जनता की आवाज़ :
हमें जितनी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे सबके सब मुख्य रूप से,
जनता के प्रति उदासीन रहकर ही शासन करती रही हैं, वे हमेशा ही देश के
राजनीतिक रूप से सचेत इस या उस तबके की, अल्पसंख्यक सरकारें ही रही हैं।
लेकिन जब यह दैत्य (यानी जनता – स.) जाग जायेगा, तो उसी की मर्ज़ी लागू
होगी, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि यह समय से जागेगा या नहीं।
भूमिका$^1$
पृष्ठ 71 (68)
लेनिन ने जुलाई, 1917 में लिखा, “यह अक्सर होता है कि जब घटनाएँ
अचानक मोड़ ले लेती हैं, तो एक अग्रणी पार्टी भी कुछ समय तक के लिए इस
नयी परिस्थिति के साथ अपनी सुसंगति नहीं बना पाती। वह वे ही पुराने जुमले
दोहराती रहती है, जो इस नयी परिस्थिति में अर्थहीन हो चुके होते हैं, तथा जिस
अनुपात में घटनाओं में 'अप्रत्याशित' परिवर्तन हो चुका होता है, उसी अनुपात में
उनकी अर्थवत्ता भी 'अप्रत्याशित रूप से' ख़त्म हो चुकी होती है।
लेसंस ऑफ़ अक्टूबर (पृष्ठ 17)$^2$
───o───
रणकौशल और रणनीति :
जैसे युद्ध में, वैसे ही राजनीति में भी, रणकौशल का अर्थ है अलग-अलग
कार्रवाई का संचालन करने की कला; रणनीति का अर्थ है विजय पाने की, अर्थात
सत्ता पर वास्तविक क़ब्ज़ा करने की कला।
(पृष्ठ 18)$^3$
───o───
प्रचार और कार्रवाई :
और जब सर्वहारा वर्ग की पार्टी तैयारी से, यानी प्रचार और संगठन एवं
आन्दोलन से, आगे बढ़कर सत्ता के लिए वास्तविक संघर्ष में उतरती है और बुर्जुआ
वर्ग के विरुद्ध एक वास्तविक जन-विद्रोह को अंजाम देने लगती है, तब एक
अत्यन्त अचानक बदलाव घटित होता है। ऐसे में पार्टी के भीतर ऐसे तत्त्व जो
दृढ़संकल्प नहीं रखते, या संदेहशील, या समझौतावादी, या कायर होते हैं – वे
──────────────────────────
- वही
- और 3. 1926 में प्रकाशित त्रात्स्की की पुस्तक लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
614 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जेल नोटबुक, सुखदेव-राजगुरु के पत्र, अन्तिम इच्छा-पत्र व सम्पूर्ण उपसंहार
जन-विद्रोह का विरोध करने लगते हैं, अपने विरोध को उचित ठहराने के लिए
सैद्धान्तिक दलीलें खोजने लगते हैं, और उन्हें ये दलीलें, अपने कल के विरोधियों
के बीच, एकदम पके-पकाये तौर पर, मिल भी जाती हैं।
त्रात्स्की 19¹
पृष्ठ 72 (69)
“अब ज़रूरत इस बात कि है कि हम अपनेआप को पुराने फ़ार्मूलों से नहीं,
बल्कि नयी वास्तविकताओं से निर्देशित करें।”
लेनिन (पृष्ठ25)²
वह हमेशा ही भविष्य के लिए अतीत से लड़ते रहे।
पृष्ठ 41³
...लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब सोचने की यह आदत, कि दुश्मन
अधिक बलवान है, विजय के लिए मुख्य बाधा बन जाती है।
त्रात्स्की पृष्ठ 48⁴
...लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हरेक पार्टी के पास अपना लेनिन तो होगा नहीं।
...महत्त्वपूर्ण क्षण को गँवा देने का क्या मतलब होता है?...
रणकौशलों की सारी कला इसी में है, कि जब परिस्थितियों का संयोग
सर्वाधिक अनुकूल हो तो उस क्षण के अनुरूप कार्रवाई की जाये...।
परिस्थितियों ने ऐसा ही संयोग उपस्थित किया था और लेनिन ने कहा था कि
संकट को किसी न किसी पक्ष में हल करना ज़रूरी है। लेनिन ने बार-बार कहा,
‘अभी या कभी नहीं’।
पृष्ठ 52⁵
पृष्ठ 73 (70)
एक क्रान्तिकारी पार्टी की ताक़त एक निश्चित सीमा तक बढ़ती है, लेकिन
उसके बाद इसका उल्टा भी हो सकता है...।⁶
“हिचकिचाना अपराध है”...अक्टूबर की शुरुआत में...(लेनिन ने)...लिखा,
1., 2., 3., 4. और 5. त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
6. आख़िरी शब्द मूल में अस्पष्ट; लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 615
“सोवियतों की कांग्रेस का इन्तज़ार करना औपचारिकताओं का एक बचकाना खेल
खेलना है, औपचारिकताओं के साथ एक अपमानजनक खेल खेलना है, यह क्रान्ति
के साथ विश्वासघात करना है।”
उपयुक्त क्षण :
राजनीति में समय एक महत्त्वपूर्ण कारक है, और युद्ध एवं क्रान्ति में तो यह
हज़ारों गुना अधिक महत्त्वपूर्ण है। चीजें जो आज की जा सकती हैं, कल नहीं की
जा सकतीं। हथियार लेकर उठ खड़े होना, दुश्मन को पराजित करना, सत्ता पर
क़ब्ज़ा करना, आज सम्भव हो सकता है, और कल असम्भव हो सकता है। लेकिन
आप कह सकते हैं कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का मतलब तो इतिहास की धारा
को बदल डालना होता है, और क्या यह सम्भव है कि एक ऐसी चीज़ महज 24
घण्टे की देरी पर निर्भर हो? हाँ, जब सशस्त्र जन-विद्रोह की घड़ी आ जाती है,
तब घटनाएँ राजनीति के लम्बे पैमानों से नहीं, बल्कि युद्ध के छोटे पैमानों से नापी
जाती हैं। इसमें कुछेक हफ़्ते, कुछेक दिन, या यहाँ तक कि कभी-कभी एक दिन
की देरी का मतलब क्रान्ति का परित्याग हो सकती है, घुटने टेक देना हो सकता
है।
राजनीतिक चालबाज़ी, ख़ासतौर से क्रान्ति में, हमेशा ख़तरनाक होती है। आप
दुश्मन को धोखा दे सकते हैं, लेकिन इससे आपके पीछे चलने वाले जनसमुदाय
दिग्भ्रमित हो सकते हैं।
पृष्ठ 74 (71)
हिचकिचाहट :
नेताओं की ओर से दिखायी जाने वाली, और उनके अनुयायियों द्वारा महसूस
की जाने वाली हिचकिचाहट राजनीति में आमतौर पर नुक़सानदेह साबित होती है,
और सशस्त्र जन-विद्रोह की स्थिति में तो यह एक घातक ख़तरा है।
युद्ध
...“युद्ध युद्ध है”, चाहे जो भी हो, इसमें कोई हिचकिचाहट या वक़्त की
बरबादी नहीं होनी चाहिए।¹
- उपरोक्त सभी उद्धरण सम्भवतः त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से हैं।
616 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अक्षम नेता :
...ऐसे नेताओं की दो क़िस्में हैं जो पार्टी को ऐसे वक़्त पीछे खींचने की रुझान
रखते हैं, जब उसे सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ने की ज़रूरत होती है। एक क़िस्म
ऐसे नेताओं की है जिनकी प्रवृत्ति क्रान्ति के रास्ते में हमेशा ही बेपनाह कठिनाइयाँ
और बाधाएँ देखने की होती है, और जो उन्हें देखकर – सचेत या अचेतन तौर पर
– उनसे बचने की इच्छा रखते हैं। ये मार्क्सवाद को तोड़-मरोड़कर इस रूप में
व्याख्यायित करने लगते हैं कि क्रान्तिकारी कार्रवाई क्यों असम्भव है।
दूसरे क़िस्म के नेता महज सतही आन्दोलनकर्ताभर होते हैं। वे जब तक
बाधाओं से टकराकर अपना सिर नहीं फोड़ लेते, तब तक उन्हें कभी बाधाएँ नज़र
ही नहीं आतीं। वे समझते हैं कि बस भाषण झाड़ कर ही वास्तविक कठिनाइयों
से निजात पा लेंगे। वे प्रत्येक चीज़ को अति आशावाद के साथ देखते हैं, और जब
सचमुच कुछ करने को होता है, तब ठीक उसी वक़्त पाला बदल लेते हैं।
पृष्ठ 80¹
पृष्ठ सं. 75 से 100 नोटबुक की हमें उपलब्ध हुई प्रति में नहीं थे।
अगली पृष्ठ अं. 101 (74) है। – सम्पादक
<u>पृष्ठ 101 (74)</u>
समाजशास्त्र²
मूल्य :
“1 पाव मक्का = क/ लोहे की क़ीमत। यह समीकरण हमें क्या बताता है?
यह हमें बताता है कि दो भिन्न-भिन्न चीज़ों में – मक्का पावभर में और लोहे की
क क़ीमत में – समान गुणों वाली कोई चीज़ दोनों में उभयनिष्ठ रूप से मौजूद
है। अतः इन दो चीज़ों को अवश्य ही किसी ऐसी तीसरी चीज़ के बराबर होना
चाहिए, जो स्वयं न तो पहली चीज़ हो, और न ही दूसरी चीज़...। अब आइये हम
इन दोनों उत्पादों में से प्रत्येक के भीतर निहित इस तीसरी अवशिष्ट चीज़ पर विचार
करें, यह प्रत्येक उत्पाद में, एक ही अभौतिक यथार्थ के रूप में, एकसार मानवीय
श्रम, यानी उस श्रम शक्ति के महज एक जमाव के रूप में निहित है, जिसमें इससे
- सम्भवतः लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से ही
- हाशिये पर नोट किया हुआ
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 617
कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उस श्रमशक्ति के खर्च किये जाने की विधा क्या रही
है। अब ये सारी चीजें हमें बताती हैं कि उपर्युक्त उत्पादों के उत्पादन में मानव-श्रम
ख़र्च किया गया है, यानी कि उनमें श्रम ही मूर्तमान हुआ है। जब हम इस सामाजिक
पदार्थ यानी श्रम को उसके अलग-अलग स्पष्ट मूर्तमान रूपों में देखते हैं, तो
सर्वसाधारण के लिए, वे ही 'मूल्य' कहलाते हैं।
मार्क्स – “पूँजी”, अंग्रेज़ी अनुवाद (पृष्ठ 3,4,5)
———o———
✓ क़ानून¹ :
“बहरहाल, समाज क़ानून पर नहीं आधारित होता है। यह तो एक क़ानूनी गल्प
है। इसके विपरीत, क़ानून को अवश्य ही समाज पर आधारित होना चाहिए। इसे
निश्चय ही समाज के हित और आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति होना चाहिए, और
इसे औद्योगिक उत्पादन की स्वेच्छाचारिता के बजाय, उत्पादन की सामाजिक और
निरपवाद रूप से भौतिक उत्पादन-प्रणाली से निःसृत होना चाहिए। इस समय मेरे हाथ
में नेपोलियन संहिता है, लेकिन इसने आधुनिक नागरिक समाज को नहीं पैदा किया
है। 18वीं सदी में जन्मा और 19वीं सदी में विकसित हुआ समाज इस संहिता में सिर्फ़
एक क़ानूनी अभिव्यक्ति के रूप में निहित है। जब यह सामाजिक दशाओं के अनुरूप
नहीं रह जायेगा, तब यह महज रद्दी काग़ज़ का पुलिन्दा ही सिद्ध होगा...। जीवन की
बदलती दशाओं के साथ-साथ क़ानून भी निश्चित तौर पर बदलते रहे हैं। परन्तु
सामाजिक विकास की नयी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को दरकिनार कर (युग
की पुकार के लिहाज़ से) पुराने क़ानून को बनाये रखना, दरअसल, सर्वसाधारण के
हित के विपरीत किन्हीं ख़ास हितों की पाखण्डपूर्ण हिमायत के अलावा और कुछ
नहीं है।”
मार्क्स (कोलोन की जूरी अदालत में)²
———o———
- मूल में शीर्षक की बायीं तरफ़ 'सही' (✓) का निशान
- 1848 में, मार्क्स के ऊपर उनके अख़बार को लेकर कोलोन (जर्मनी) में एक प्रसिद्ध
मुक़दमा चला। मई 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कुछ साथियों की मदद से
न्यू राइनिश ज़ाइटुंग (Neue Rheinische Zeitung) नामक एक राजनीतिक दैनिक अख़बार की
स्थापना की। मार्क्स इसके सम्पादक थे। यह यूरोप में क्रान्तिकारी उथल-पुथल का दौर था।
नवम्बर 1848 में जब प्रशा के राजा ने नेशनल असेम्बली को भंग कर दिया तो मार्क्स और
उनके साथियों ने जनता से कर न चुकाने का आह्वान किया और हथियारबन्द विरोध की
वकालत की। कोलोन की घेरेबन्दी कर ली गयी और उनका अख़बार बन्द कर दिया गया।
मुक़दमे के दौरान मार्क्स ने अपने तर्कों से जूरी को ही दोषी क़रार दिया। उन्हें बरी कर दिया
गया लेकिन प्रशा से निर्वासित कर दिया गया।
618 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
✓ जनसमुदाय :
“जनता एक ऐसे भारी-भरकम और पंचमेल जानवर की भाँति होती है, जो
अपनी ही ताक़त से अनभिज्ञ रहता है और इसीलिए बोझ ढोते हुए कोड़े-डण्डे
खाता रहता है। यह उस फ़ितने बच्चे द्वारा भी हाँक लिया जाता है, जिसे वह जब
चाहे धक्के मारकर फेंक सकता है। लेकिन यह उस बच्चे से डरता है और इसीलिए
यह उसकी सारी सनकों और मनबहकियों को झेलता रहता है, और कभी महसूस
नहीं करता कि वह बच्चा खुद उससे कितना डरता है...। अद्भुत है! लोग खुद अपने
ही हाथों से अपनेआप को फाँसी दे देते हैं और खुद ही जेल चले जाते हैं तथा खुद
ही अपने ऊपर युद्ध और मौत का कहर बरपा कर लेते हैं। किसलिए? बस एक
दमड़ी के लिए, जो उन्हीं तमाम दमड़ियों में से एक होती है जिन्हें वे खुद ही राजा
को दे चुके होते हैं। जबकि धरती और आकाश के बीच जो कुछ है सब तो उनका
ही है, लेकिन वे इसे नहीं जानते और अगर उन्हें कोई यह बता दे तो वे उस आदमी
को गिराकर मार डालेंगे।
तोमासो कैम्पानेला¹
पृष्ठ 102 (75)
“मार्क्सवाद बनाम समाजवाद”
(1908-12) लेखक व्लादिमीर जी. सिखोविच
पीएच.डी., कोलम्बिया विश्वविद्यालय
वह एक-एक करके मार्क्स के सारे सिद्धान्तों की आलोचना करते हैं और इन
सभी को ख़ारिज करते हैं :
- मूल्य का सिद्धान्त
- इतिहास की आर्थिक व्याख्या
- सम्पदा का थोड़े से हाथों, अर्थात पूँजीपतियों के हाथों में संकेन्द्रण, मध्यम
वर्ग का पूरी तरह ख़ात्मा और सर्वहारा वर्ग की बाढ़ - बढ़ती ग़रीबी का सिद्धान्त, जिसकी परिणति के तौर पर
- आधुनिक राज्य और सामाजिक व्यवस्था का अपरिहार्य संकट।
वह निष्कर्ष निकालते हैं कि मार्क्सवाद सिर्फ़ इन्हीं मूलभूत सिद्धान्तों पर
आधारित है, और उन्हें एक-एक करके ख़ारिज करते हुए, निष्कर्ष के तौर पर कहते
हैं कि क्रान्ति के जल्दी फूट पड़ने की सारी धुँधली आशंकाएँ अभी तक निर्मूल
ही साबित हुई हैं। मध्यम वर्ग घट नहीं, बल्कि बढ़ रहा है। धनी वर्ग संख्या में बढ़ - तोमास्सो कैम्पानेला (1568-1639) : इतालवी कवि और दार्शनिक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 619
रहा है, तथा उत्पादन और उपभोग की प्रणाली भी परिस्थितियों के अनुसार बदल
रही है, अतः मज़दूरों की दशा में सुधार करके किसी भी प्रकार के संघर्ष को टाला
जा सकता है। सामाजिक अशान्ति का कारण बढ़ती ग़रीबी नहीं, बल्कि औद्योगिक
केन्द्रों पर ग़रीब वर्गों का संकेन्द्रण है, जिसके नाते वर्ग-चेतना पैदा हो रही है।
इसीलिए यह सब चिल्ल-पों है।¹
पृष्ठ 103 (76)
लेस मिज़रेबल्स की भूमिका
जब तक क़ानून और परम्परा की बदौलत एक ऐसी सामाजिक अधोगति मौजूद
रहेगी जिसमें सभ्यता के भीतर नर्क निर्मित होते रहेंगे और दैवीय नियति के साथ
मानवीय नियति का उलझाव होता रहेगा, जब तक इस युग की तीन समस्याएँ
ग़रीबी के कारण मनुष्य की दुर्गति, भूख के कारण नारी की अधोगति, और अज्ञानता
के कारण बच्चों की अशक्तता – हल नहीं होतीं, जब तक कुछ क्षेत्रों में सामाजिक
घुटन मौजूद रहेगी – दूसरे शब्दों में, तथा एक और भी व्यापक दृष्टिकोण से –
जब तक इस धरती पर अज्ञानता और बदहाली बरक़रार रहेगी, तब तक ऐसी
किताबें व्यर्थ नहीं सिद्ध होंगी।
“विक्टर ह्यूगो”²
न्यायाधीश “न्यायाधीश (अपने फ़ैसले से) जो कष्ट पहुँचाता है, यदि
की परिभाषा : वह स्वयं उसके प्रति निष्ठुर हो, तो वह न्याय करने का
अधिकार खो बैठता है।”
“रवीन्द्रनाथ ठाकुर”³
“लेकिन अप्रतिरोधी शहादत जो कर पाने में असफल रह जाती है, उसे
न्यायप्रिय और प्रतिरोधी शक्ति कर डालती है, तथा अत्याचारी को और अधिक
हानि पहुँचाने में नाकाम कर देती है।”⁴
- भगतसिंह द्वारा पुस्तक पर दर्ज टिप्पणी
- विक्टर ह्यूगो (1802-1885) : फ़्रांसीसी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और रोमांसवाद
के एक प्रवर्तक; लेस मिजरेबल्स उनका 1862 में लिखा एक क्लासिकीय उपन्यास है। - माँ की प्रार्थना नामक कविता की पंक्तियाँ
- अज्ञात
620 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
“धर्मान्तरित होने के बजाय मार डाले जाओ” उस समय हिन्दुओं के बीच यही
पुकार प्रचलित थी। लेकिन रामदास¹ उठ खड़े हुए और कहा, “नहीं! ऐसे नहीं!
धर्मान्तरित होने से बेहतर है मार डाले जाना – यह कहना काफ़ी अच्छा है, लेकिन
इससे भी बेहतर है यह कोशिश करना कि न तो मारे जाओ और न ही धर्मान्तरित
होओ, बल्कि खुद हिंसा की शक्तियों को मार डालो। इसमें अगर मरना ही हो तो
मार दिये जाओ, लेकिन विजय की ख़ातिर मारते हुए मरो – न्याय की जीत के
लिए मरो।”
हिन्दू पद पादशाही पृष्ठ 181-82
पृष्ठ 104 (77)
सभी विधि-निर्माता अपराधियों के रूप में परिभाषित :
आदिकाल से लेकर लाइकरगस², सोलोन³, मोहम्मद⁴, नेपोलियन⁵, आदि तक
मनुष्यों के लिए जितने भी विधि-निर्माता और शासक हुए हैं वे सब के सब
अपराधी रहे हैं, क्योंकि नये क़ानूनों का विधान करके, स्वाभाविक तौर पर, उन्होंने
उन पुराने क़ानूनों को भंग किया, जिन्हें समाज श्रद्धापूर्वक मानता आ रहा था और
जो पूर्वजों से विरासत में मिले हुए थे।
(पृष्ठ 205) अपराध और दण्ड – दोस्तोव्स्की⁶
बर्क⁷ का कहना है, “एक सच्चा राजनीतिज्ञ, हमेशा इस बात पर सोचता रहता
है कि कैसे वह अपने देश में मौजूद संसाधनों से ज़्यादा से ज़्यादा अर्जित करे।”
- प्रसिद्ध मराठा सन्त और शिवाजी के प्रेरणा-गुरु
- लाइकरगस : प्राचीन स्पार्टा (यूनान) का संविधान निर्माता। उसके जीवनीकार प्लुटार्क
के अनुसार वह “विधि निर्माता” था, और हेरोदोतस के अनुसार, उसने “सारी परम्पराएँ” बदल
डालीं। - सोलोन (639 ई.पू.-559 ई.पू.): प्राचीन एथेंस (यूनान) का राजनयिक, जिसने सीमित
जनतन्त्र देने के लिए एथेंस के संविधान का संशोधन किया, और भूमि-सुधार लागू किया। - हज़रत मोहम्मद (570-632 ई.) का उल्लेख अरब देशों में प्रचलित पुराने क़ानूनों और
प्रथाओं के स्थान पर इस्लामी क़ानूनों के संस्थापक के रूप में किया गया है। - नेपोलियन बोनापार्ट (1769-1821) ने नेपोलियन संहिता तैयार की जिसे यूरोप में लागू
किया गया। - प्रसिद्ध रूसी उपन्यासकार फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोयेव्स्की (1821-1881) का
प्रसिद्धतम उपन्यास अपराध और दण्ड जो 1866 में प्रकाशित हुआ। - एडमण्ड बर्क (1729-1797) : ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 621
पृष्ठ 105 (78)
विधिशास्त्र¹ :
क़ानून :
⎧ 1. क़ानून का प्रावधान ⎫ जिस रूप में वह मौजूद है।
⎨ 2. क़ानून का इतिहास ⎬ जिस रूप में उसका विकास हुआ।
⎩ 3. क़ानून-विधान का विज्ञान ⎭ जैसा उसे होना चाहिए।
⎧ 1. सैद्धान्तिक ⎫ (i) दर्शन विधि के विज्ञान के लिए
⎩ 2. सामान्य ⎭ विधिशास्त्र आधार प्रदान करना।
- विश्लेषणात्मक ⎫
- ऐतिहासिक ⎬ विधिशास्त्र
- नीतिशास्त्रीय ⎭
- विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र क़ानून के प्रथम सिद्धान्त की व्याख्या
करता है। इसकी विषय-वस्तु है :
(अ) नागरिक क़ानून की अवधारणा
(ब) नागरिक और अन्य क़ानूनों के बीच सम्बन्ध
(स) विविध संघटक विचार जो क़ानून की धारणा, जैसे राज्य, सम्प्रभुता
और न्याय-प्रशासन का संघटन करते हैं।
(द) क़ानून के क़ानूनी स्रोत और विधि निर्माण का सिद्धान्त आदि।
(य) क़ानून के वैज्ञानिक वर्गीकरण।
(र) क़ानूनी अधिकार
(ल) क़ानूनी (नागरिक और फ़ौजदारी) दायित्व का सिद्धान्त
(व) अन्य क़ानूनी अवधारणाएँ।
पृष्ठ 106 (79) - ऐतिहासिक विधिशास्त्र क़ानून, क़ानूनी अवधारणाओं की उत्पत्ति और
विकास को निर्धारित करने वाले सामान्य सिद्धान्तों का अध्ययन करता है। यह
इतिहास है।
- ऐसा प्रतीत होता है कि भगतसिंह ने विधिशास्त्र सम्बन्धी व्यापक अध्ययन की रूपरेखा
बनायी थी, जो नोटबुक के अगले कई पृष्ठों तक जारी है।
622 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़