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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 788 में से

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पृष्ठ 635

ग़लती का शिकार हुए व्यक्ति में ही नहीं मौजूद रहती, बल्कि व्यापक पैमाने पर
समाज में उसके प्रति हमदर्दी के रूप में भी मौजूद रहती है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, यह सही और उचित है कि बुराई का बदला बुराई
से लिया जाये। आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत प्राकृतिक न्याय का
एक सीधा और अपनेआप में पूर्ण नियम माना जाता है। सज़ा खुद में एक मक़सद
बन जाती है।
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सज़ा एक बुराई :
सज़ा अपनेआप में ही एक बुराई है, और इसे सिर्फ़ एक महत्तर उद्देश्य की
प्राप्ति के साधन के तौर पर ही उचित ठहराया जा सकता है।
लेकिन प्रतिकारात्मक सिद्धान्त के समर्थक इस ढंग से दलील देते हैं : “दोष
धन सज़ा बराबर निर्दोषता।”
“उसने न्याय के क़ानून का जिस ग़लती द्वारा उल्लंघन किया है, उससे उसके
ऊपर एक ऋण आयद हो गया है। अतः न्याय का तक़ाज़ा है कि वह ऋण चुका
दिया जाये...सज़ा का पहला उद्देश्य भंग किये गये क़ानून को तुष्ट करना है।”
Peine forte et dure : यातना देकर मौत...जिसका फ़ैसला निम्नलिखित रूप
में दिया गया :
“कि तुम्हें फिर उसी जेल में वापस ले जाया जाये जहाँ से तुम आये थे, यानी
कि उसी लम्बी कालकोठरी में, जिसके भीतर कोई रोशनी न जा सके, फिर तुम्हें
वहाँ नंगी फ़र्श पर पीठ के बल लिटाया जाये, सिर्फ़ तुम्हारी कमर में एक कपड़ा
लिपटा रहे, जबकि शेष सभी भाग नंगा रहे, कि तुम्हारे शरीर पर लोहे का एक इतना
भारी बोझ रखा जाये जितना कि तुम बरदाश्त कर सको, और फिर उससे भी
अधिक भारी, कि तुम्हें पहले दिन खाने के लिए मोटी से मोटी रोटियों के सिवाय,
और कोई चीज़ न दी जाये, दूसरे दिन जेल के फाटक के सबसे नज़दीक के गड्ढे
में जमा पानी के तीन घूँट दिये जायें, तीसरे दिन फिर पहले जैसा ही खाना दिया
जाये, और ऐसी रोटियाँ और ऐसा पानी एक-एक दिन के अन्तर पर तब तक दिया
जाये, जब तक कि तुम मर न जाओ।”¹
यह सज़ा स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से उन सभी प्रकार के जुर्मों
**के लिए दी गयी जो ग़ैर-मामूली नहीं थे।**²

  1. उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में इंग्लैण्ड में एक जज द्वारा सुनायी गयी मौत की सज़ा
  2. हाशिये पर नोट किया हुआ और रेखांकित
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 629