भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 638, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद या पेंशन नहीं प्रदान करती।
— रूसो, 122
एस.सी.¹
जुर्म और मुजरिम :
"...पकी-पकायी धारणाएँ देकर जुर्म को समझा नहीं सकता। लोग जैसा सोचते
हैं उससे इसका फ़लसफ़ा कुछ अधिक ही जटिल है। यह तो मानी हुई बात है कि
न तो कोई क़ैद, न कोई कालकोठरी और न कोई कड़ी मशक़्क़त की प्रणाली ही
किसी मुजरिम को सुधार सकती है। दण्ड-विधान के ये रूप सिर्फ़ उसे दण्डित
करते हैं और समाज को यह आश्वासन देते हैं कि वह और जुर्म नहीं करेगा। क़ैद,
नियम-विधान और कड़ी से कड़ी मशक़्क़त उस पर कोई असर नहीं डाल पाते,
सिवाय इसके कि ऐसे व्यक्तियों में एक भारी नफ़रत, वर्जित काम को और चाव
से करने की एक ललक, और एक ख़ौफ़नाक नाफ़रमानी ही विकसित हो जाती
है। इसीलिए मेरा पक्के तौर पर मानना है कि यह कालकोठरी वाली परम्परागत
प्रणाली दिखावटी और कपटपूर्ण नतीजे ही देती है। यह मुजरिम से उसकी ताक़त
निचोड़ लेती है, उसे अशक्त करके और डरा कर उसकी आत्मा को निस्तेज कर
डालती है, और इस प्रकार अन्ततः उसे पश्चाताप और सुधार के एक नमूने के तौर
पर, एक बेजान यादगार के रूप में ही प्रस्तुत करती है।
द हाउस ऑफ़ डेड पृष्ठ, 17
फ़ेदोर दोस्तोव्स्की²
पृष्ठ 119 (92)
इच्छा बनाम सन्तुष्टि!
यदि एक चेतन प्राणी की शक्तियाँ उसकी इच्छाओं के बराबर होतीं तो वह
पूरी तरह सुखी होता...। लेकिन सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को सीमित करना ही काफ़ी
नहीं है, क्योंकि यदि वे हमारी शक्तियों से कम हैं, तब तो हमारी क्षमताओं का एक
अंश यों ही बेकार चला जायेगा, और तब हम अपने पूरे अस्तित्व का आनन्द भी
- रूसो की पुस्तक सोशल काण्ट्रैक्ट : इसमें एक ऐसे आदर्श राज्य का वर्णन प्रस्तुत किया
गया है जिसमें सम्प्रभुता पूरी जनता में निहित थी। उसके विचार 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति
की एक महत्त्वपूर्ण प्रेरकशक्ति बने। - फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोयेव्स्की (1821-1881) का उपन्यास द हाउस ऑफ़ डेड,
जो स्वयं उनके कारावास के अनुभवों के आधार पर 1861 में लिखा गया।
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