भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished788 पृष्ठ
पृष्ठ 634, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 634
- निरोधक : दूसरे मामले में, यह निरोधक या अयोग्य सिद्ध करने वाला है।
इसका विशेष उद्देश्य अपराधकर्ता को नाकाम कर उसे पुनः ग़लत काम करने से
रोकना है।
प्राणदण्ड हम हत्यारों को फाँसी महज इसीलिए नहीं देते कि यह दूसरों को
का (हत्या करने से) विरत करती है, बल्कि उसी कारण से, जिस
औचित्य : कारण से हम, उदाहरण के लिए, साँप को मार डालते हैं, क्योंकि
हमारे लिए यही बेहतर है कि वे इस दुनिया में रहने के बजाय इससे
बाहर हो जायें। - सुधारात्मक : अपराध चरित्र के ऊपर इरादों के प्रभाव से किये जाते हैं,
और वे या तो इरादों के बदलाव से या चरित्र के बदलाव से रोके जा सकते हैं।
निवारक सज़ा पहले मामले में दी जाती है, (कुछ शब्द अस्पष्ट – स.)
जबकि सुधारात्मक (सज़ा) दूसरे मामले में दी जाती है।
पृष्ठ 114 (87)
“सुधारात्मक सिद्धान्त” के पैरोकार सज़ा के सिर्फ़ उन्हीं रूपों की हिमायत
करते हैं, जो अपराधी की शिक्षा और उसे अनुशासित करने के लिए उपयोगी होते
हैं, और बाक़ी उन सभी (सज़ाओं) को अमान्य ठहराते हैं जो लाभकारी तौर पर
सिर्फ़ निवारक या अयोग्यकारी (होती हैं)। उनकी दृष्टि में मृत्यु कोई उपयुक्त सज़ा
नहीं हैं, 'हमें अपने अपराधियों का इलाज करना चाहिए, उनकी हत्या नहीं।'
पिटाई और अन्य शारीरिक सज़ाएँ बर्बरता की निशानी कहकर निन्दित की जाती
हैं। वे ऐसी सज़ाओं को सज़ा भोगने वाले और सज़ा देने वाले दोनों को ही नीचे
गिराने वाली और क्रूर मानते हैं।
कड़ी सज़ा का नतीजा। राज्य की बलप्रयोग की कार्रवाई जितनी सक्षम होती
अपराधियों का ख़तरनाक है, वह सभी सामान्य मनुष्यों को ख़तरनाक रास्तों (पर
और दुस्साहसिक वर्ग जाने) से रोकने में उतनी ही सफल होती है, लेकिन
पैदा हो जाता है। क़ानून तोड़ने वालों में अधःपतन का अनुपात भी
उतना ही अधिक होता है। - प्रतिकारात्मक सज़ा :
सर्वाधिक भयावह सिद्धान्त! ऐसी सोच रखने वाले लोग वास्तव में प्राचीन और
सभ्यतापूर्व कालों की बर्बर मनःस्थितियों के हिमायती होते हैं।¹
यह प्रतिशोध या बदले की उस नैसर्गिक प्रवृत्ति को तुष्ट करती है, जो सिर्फ़
- हाशिये पर लिखा हुआ
628 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़