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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 788 में से

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पृष्ठ 643

से आज्ञाकारी होना चाहिए।” वह नागरिकों के सचेत प्रशिक्षण और शिक्षा पर ज़ोर
देता है।
अरस्तू :
वह पहला व्यक्ति था जिसने राजनीति को नीतिशास्त्र से मुक्त किया, हालाँकि
वह सतर्क भी था कि ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक न हो जायें। उसकी
दलील थी, “लोगों की बहुसंख्या विवेक के बजाय अपनी भावनाओं से शासित
होती है, और इसीलिए राज्य के लिए ज़रूरी है कि वह उन्हें जीवन-पर्यन्त
अनुशासन में रहने का प्रशिक्षण दे, जैसाकि स्पार्टा में है। जब तक राजनीतिक समाज
स्थापित नहीं होता, तब तक न्याय का कोई प्रशासन नहीं हो सकता...(लेकिन)
इसके लिए आवश्यक है कि सर्वोत्तम संविधान और विधि-निर्माण की सर्वोत्तम
प्रणाली की खोज की जाये...। [पृष्ठ 166 (101) पर जारी]
“राज्य का बीज परिवार या कुटुम्ब में होता है। कई कुटुम्बों के संयुक्त होने
से ग्राम समुदाय की उत्पत्ति हुई है (जिसके) सदस्य पितृसत्तात्मक सरकार के
अधीन होते हैं।
“कई गाँवों को मिलाकर राज्य का निर्माण हुआ, जो एक प्राकृतिक, स्वतन्त्र,
और आत्मनिर्भर संगठन था।
“लेकिन जहाँ कुटुम्ब एक व्यक्तित्व द्वारा शासित होता है, वहीं संवैधानिक
सरकारों में व्यक्ति स्वतन्त्र और अपने शासकों के समान होते हैं।
“प्राकृतिक सामाजिक मैत्री और परस्पर लाभ से एकता गठित होती है। मनुष्य
अपने स्वभाव से एक राजनीतिक ( सामाजिक ) प्राणी है।
“राज्य एक संश्रय से कहीं अधिक है, जिससे व्यक्ति जुड़ सकते हैं या बिना
कोई फ़र्क़ पड़े छोड़ सकते हैं, लेकिन स्वतन्त्र या नागरिकतारहित मनुष्य
अविश्वसनीय, असभ्य, और एक नागरिक से भिन्न कोई चीज़ होता है।
प्लेटो :
प्लेटो ने एक ऐसे निकाय के रूप में राज्य की इस अवधारणा का पूर्वानुमान
किया था जिसके सदस्य एक सर्वमान्य लक्ष्य के लिए सामंजस्यपूर्ण ढंग से
संयुक्त हों।
अरस्तू :
अरस्तू का मानना था कि जहाँ स्वतन्त्रता और समानता हो, वहाँ बारी-बारी से
शासन और अधीनीकरण हो, लेकिन सबसे अच्छा यही है कि यदि सम्भव हो तो,
वे ही व्यक्ति हमेशा शासन करते रहें।
प्लेटो के साम्यवाद के विरोध में उसकी दलील बाक़ायदा नियम निर्धारित
निजी सम्पत्ति के पक्ष में थी, जिसके पीछे उसका विचार यह था कि राज्य में
सिर्फ़ एक नैतिक एकता ही सम्भव या वांछनीय है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 637