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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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भाव और कर्म
दादा से सलाह करके अब मैं बंगाल को चला गया । वास्तव में देखा जाय तो
दादा ही सारे उत्तर-भारतीय विप्लव-पन्थ के नेता थे । तथापि, दल की पुरानी
पद्धति के अनुसार, उन्हें अपना कार्यकलाप और भी दो-एक व्यक्तियों पर प्रकट
करना पड़ता था । रासबिहारी पहले अन्यान्य सदस्यों की भाँति दल के एक
साधारण कार्यकर्ता ही थे । लेकिन वह धीरे-धीरे अपनी अद्भुत कार्यकुशलता से
सबकी जानकारी से बाहर आश्चर्यजनक रीति से संगठन करते रहे और एक
दिन बहुत-से कामों का भार अपने ऊपर लेकर वह नेताओं के सम्मुख अकस्मात्
प्रकट हुए । अस्तु, अब पंजाब का पर्व समाप्त करने के पहले बंगाल की चर्चा न
छेड़ूँगा ।
इस समय हमारे दल का विस्तार पूर्वी बंगाल की अन्तिम सीमा से लेकर
अब पंजाब में प्रवेश करने की सूचना दे रहा था । अपने प्रधान नेता और पूर्वी
बंगाल के कुछ नेताओं को पंजाब का नया समाचार सुनाने के लिए मैं बंगाल को
भेजा गया । किन्तु कलकत्ता में उस समय पूर्वी बंगाल का कोई भी व्यक्ति न
मिला । अतएव मैंने उचित स्थान पर खबर कर दी कि जितनी जल्दी हो सके,
पूर्वी बंगाल का कोई व्यक्ति काशी आ जाय । फिर केन्द्र के नेताओं के पास जाकर
मैंने पंजाब का सारा समाचार विस्तार के साथ कह सुनाया । उन लोगों में एक
नये उत्साह की तरंग मैंने देखी सही, किन्तु पूरे समाचार पर वे लोग उस समय
विश्वास नहीं कर सके । बहुत रात तक बातचीत होती रही । यदि सचमुच
विद्रोह हो जाय और फिर यदि ऐसी दशा हो कि आमने-सामने युद्ध न करके हमें
पीछे हटना पड़े तो उस समय हम लोगों को कहाँ आश्रय मिलेगा ? हम लोगों
को रसद किस प्रकार मिलेगी और परस्पर सम्बन्ध-सूत्र किस प्रकार से रक्षित
रहेगा ?—इत्यादि अनेक विषयों पर जो बातचीत हुई थी उसका यहाँ पर उल्लेख
करने से कुछ लाभ नहीं । उस समय भी सिक्खों के दल विदेश से भारत में चले
आ रहे थे और उनमें बहुतेरे लोग कलकत्ता में कुछ दिन तक विश्राम करके पंजाब
को चले जाते थे । मैंने नेताओं से कहा कि इन विदेशों से आए हुए सिक्खों से
संयोग स्थापित करने की विशेष रूप से चेष्टा कीजिए । इस बात पर भी विचार
किया गया कि अब बहुत जल्द बम के गोले बहुत अधिक बनाने पड़ेंगे और उसके

70 / बन्दी जीवन
लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ।
अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित-नए'—'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली । जब एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती थी
तब फिर जल्द समाप्त न होती थी । मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रणोदित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों
में कितनी ही नई रीतियों से विकसित होने की चेष्टा करता है । इसलिए एक
भाव के उपासक होकर भी, उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी, हम लोगों के
बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। गानेवाला तो एक ही है, किन्तु
वही एक स्वरलहरी पांच श्रोताओं के लिए कितने प्रकार की मूर्च्छना उत्पन्न
नहीं कर देता ! मेल तो काफ़ी रहता है, किन्तु बेमेल भी क्या कुछ कम रहता
है ? जिस आदर्श से प्रणोदित होकर हम लोग अपने व्यक्तिगत और समष्टिगत
जीवन को नियन्त्रित कर रहे थे उस भाव-स्रोत की तरंग यद्यपि एक ही स्थान से
आती थी तथापि उसने विभिन्न आधारों में अपनी विचित्रता की महिमा को
स्थिर रखा था । हमारे आदर्श सम्बन्धी छोटी-मोटी बातों के झगड़ों में कितनी
ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं; एक व्यक्ति दूसरे को कुछ-
कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता तब उषा की लालिमा, अधखिले
फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में देख पड़ती थी । रास्ता चलते-चलते जब नींद से
अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगतीं तभी मालूम होता था कि इतनी
थकावट हुई है । रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट जाना पड़ता था और
सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलोचना का प्रसंग दुबारा
बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता था; और कभी-
कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब योग की वह भावना आकर
हम पर प्रभाव जमा लेती थी । इस प्रकार भाव और कर्म के मोहक आवेश में
हमारा विचित्र जीवन व्यतीत और गठित होता जाता था ।

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फ़ौज की बारकों में
काशी में वापस आने पर दादा से ज्ञात हुआ कि काम मजे में होता जा रहा
है। उन्होंने कहा, "आज ही दोपहर के बाद अमुक बाग़ में एक सिपाही आने-
वाला है, तुम आज वहाँ जाना ।" यह भी सुना कि वह पलटन काशी से बदल
गई है और उसकी जगह पर नई पलटन आई है। मैं दोपहर के बाद उसी बाग़ में
पहुंचा। उस बाग़ मे मुझे एक मित्र ले गए थे। मैंने रास्ते में उनसे पूछा कि दल
का परिचय इन लोगों के साथ किस प्रकार हुआ ? मित्र ने बतलाया कि "ये लोग
बाजार में सौदा लेने आते थे; एक दिन छावनी की ओर जाते समय, रास्ते में
आते इन्हें देखा । तब हम लोग भी इनसे बातचीत करते हुए शहर की तरफ़ लौट
पड़े । रास्ते में वर्तमान युद्ध-सम्बन्धी बहुत-सी बातें भी हुईं। हिन्दू-मुसलमानों से
सम्बद्ध बहुतेरी बाते भी हुईं । हिन्दुओं का वर्तमान दुर्दशा और अधःपतन की
चर्चा करते-करते हम लोग बस्ती मे आ पहुँचे । इस प्रकार पहले दिन जान-
पहचान हो चुकने पर उनका नाम-धाम पूछ लिया गया और कहा गया कि आपसे
जरूरी काम है इसलिए किसी दिन तकलीफ़ कीजिएगा । बस, उस दिन इतनी
ही बातचीत हुई। दूसरे दिन वे लोग फिर गंगा नहाने के लिए बस्ती में आए ।
उस दिन हम लोगो ने उनको अपनी भीतरी बातें कह सुनाईं। बहुत कुछ बातचीत
हो चुकने पर उन्हें समझाया गया कि वर्तमान युद्ध में, विदेश मे जाकर विधर्मियों
के भले के लिए प्राण देने की अपेक्षा स्वदेश मे स्वधर्म के लिए प्राण देना हजार दर्जे
अच्छा है। इसका उन पर बहुत अच्छा असर पड़ा। आसानी से काम बन गया ।
पलटन में जाकर अपने बेडेवालो से इस विषय की बातचीत करके वे आज मिलने
को आने वाले है ।" थोड़ी ही देर बाट जोही थी कि देखा, एक मनुष्य हाथ मे
सौदा लिये चला आ रहा है। मित्र ने कहा, "यही तो हैं।" ये सिर से पैर तक
सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे, मानो भीतर की विशुद्धता बाहर भी प्रकट हो रही थी ।
इनसे बातचीत करके मैं बहुत ही आनन्दित हुआ । हिन्दुओं की स्वभाव-सिद्ध
नम्रता मानो इनकी देह में भिदी हुई थी । इनमे एक उत्फुल्लता और उत्साह का
भाव मैंने देखा, किन्तु उत्तेजना इन्हें छू तक नही.गई थी । उस दिन इनके साथ
सीधे बारक में जाकर और इनकी चारपाई पर बैठकर बहुत बातचीत हुई । हम
लोग इनकी चारपाई पर बैठकर बाते करने लगे और ये हमारी खातिर के लिए

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समीप के बाज़ार से मिठाई मँगाने का इन्तज़ाम करने लगे ।
उस दिन अपने जीवन में पहले-पहल अंग्रेजों की फ़ौजी बारक में मैंने क़दम
रखा था। इससे पहले इन फ़ौजी बारकों के कितने ही अस्फुट रहस्य मन में न
जाने कितनी बार कितनी ही सूरतों में देख पड़ते थे। आज उसी फ़ौजी बारक
में बैठे रहने पर भी ऐसा लगता था कि मानो वे सब रहस्य हमारे आस-पास
चक्कर काट रहे हैं। बीच-बीच में ऐसा प्रतीत होने लगा कि बहुत पुराना सुख-
स्वप्न मानो इस छावनी की बारक में लिपटा हुआ है।
लम्बी बारक के बीच में दोहरी कतार में सिलसिले से चारपाइयां बिछी हुई
हैं। कोई तो चारपाई पर बैठा इधर-उधर की बातें मार रहा है, कोई पुस्तक पढ़
रहा है और कोई किसी काम से बारक में आता-जाता है। हम लोग परिचित
सिपाहियों से उमंग के साथ बातचीत कर रहे थे सही; किन्तु मन में एक ही साथ
डर, अचरज और आनन्द की विचित्र हलचल मची हुई थी। हमारे लिए मिठाई
मँगाने का जब ये इन्तज़ाम करने लगे तब पहले तो हम लोगों ने इन्हें रोका कि
अजी, मिठाई की क्या ज़रूरत है, रहने भी दीजिए; किन्तु इनका आग्रह देखकर
अन्त में चुप हो जाना पड़ा। इधर जब मिठाई के आने में विलम्ब होने लगा तब
बीच-बीच में खटका होने लगा कि ज़रूर कुछ-न-कुछ दाल में काला है। शायद
किसी अजगर को हमारी खबर देने के लिए कोई दौड़ाया गया है। थोड़ी ही देर
में आस-पास के सिपाहियों ने हमारी चारपाइयों पर आकर हमारे साथ बातचीत
छेड़ दी। बारकों में हम लोगों ने अपने को राजपूत क्षत्रिय बतलाया था। सिर्फ़
राजपूतों ही के लिए बनारस में एक स्कूल और कालेज था। वहाँ राजपूतों के
सिवा और कोई पढ़ने न पाता था और न वहाँ के बोर्डिंग में ही रहने पाता था।
अपने पूर्व-परिचित सिपाही की बात के अनुसार हमने इन लोगों को बतलाया कि
हम लोग उक्त राजपूत कालेज के छात्र हैं। सिपाहियों द्वारा नाम-धाम पूछा
जाने पर हमने बड़े तपाक से अमरसिंह और जगतसिंह प्रभृति नाम बतला दिए।
किन्तु मन में धुकुर-पुकुर होने लगी कि कहीं हमारा असली स्वरूप प्रकट न हो
जाय। यह बतलाने की ज़रूरत ही नहीं कि वहाँ पर हम लोग बंगाली लिबास
में नहीं गए थे। हममें से एक के सिर पर तो साफ़ा था और दूसरे के सिर पर
थी टोपी। पहनावा भी संयुक्त प्रांतवासियों जैसा था। मुझसे साफ़ा बाँधते न
बनता था, इसलिए मैं अक्सर टोपी से ही काम लेता था।
हमारे पूर्व-परिचित सैनिक ने एक हवलदार से परिचय करा देने का वादा
किया। इस हवलदार से ये हमारी चर्चा पहले ही कर चुके थे और हवलदार भी
हमारे प्रस्ताव के पक्ष में हो गया था। थोड़ी देर बाद हवलदार से हमारा परिचय
हुआ। इसका नाम दिल्लासिंह था। इसने हमसे कुछ झिझकते हुए बातचीत की
और थोड़ी देर मे यह कहकर कहीं चल दिया कि एक काम करके आता हूँ।
दिल्लासिंह उसी समय से हमें कुछ भला न जँचा और जब वह काम का बहाना
करके खिसक गया तब मैंने डरते-डरते पूर्व-परिचित सैनिक से धीरे से पूछा कि

फ़ौज की बारकों में / 73
दिल्लासिंह पर पूरा भरोसा किया जाय ? कुछ खटका तो नही ?” तब उक्त
सैनिक ने उसकी ओर से बेफ़िक्र रहने को कहकर उसे भला आदमी बतलाया । मैंने
उस दिन भी यह बात किसी से नही छिपाई थी कि दिल्लासिंह मुझे भला आदमी
नही जंचता । उस दिन दिल्लासिंह जब तक वहां लौट नही आया तब तक हर
घड़ी-पल पर मैं अपने मित्र से कहता था कि “क्योंजी, अब तक आया नही, कहाँ
गया ?” और एक-दूसरे की ओर देख-देखकर हम दोनों परस्पर मुस्कराते थे ।
जो हो, हमारा सन्देह जाता रहा, उस दिन तो दिल्लासिंह दुबारा लौट आया ।
उस दिन मामूली बातचीत करते-करते शाम हो गई, फिर हमसे एकान्त में बातें
करने के लिए दिल्लासिंह उस पूर्व-परिचित सिपाही को लेकर हमारे साथ-साथ
बारक के बाहर चला आया । दिल्लासिंह ने हमारे प्रस्ताव को मान लिया और
कहा कि हम बारक के कुछ अन्य सिपाहियो से भी बातचीत कर रखेंगे । दिल्ला-
सिंह के लौट जाने पर भी पूर्व-परिचित सैनिक महोदय और भी थोड़ी देर तक
हमारे पास बने रहे । अब दिल्लासिंह के ऊपर हमारे शक करने पर इन्होने
हमसे फिर उसकी ओर से बेखटके रहने को कहा । तब यह सोचकर मन में
आनन्द हुआ कि चलो, एक हवलदार तो दल मे आ गया । इस रीति से इस फ़ौजी
बारक में हमारा आवागमन आरम्भ हुआ और एकाध महीने के भीतर हम यहाँ
कम से कम दस-बारह बार आए-गए । इन सिपाहियो में से कुछ लोग शहर मे
हमारे डेरे पर भी आए थे और तब, हम लोगों ने भी इन्हें हर मर्तबा रसगुल्ला
आदि कई प्रकार की बंगाली मिठाई खिलाकर खुश किया था ।
मालूम होता है कि समूचे भारत मे ऐसा एक भी शहर न था जहाँ स्वदेशी
आन्दोलन और बम के गोले के दल का बात किसी को मालूम न हो । हम
लोगों ने इन सिपाहियों को अपने घर बुलाकर बम के गोले, रिवाल्वर और
मोज़र पिस्टल आदि के दर्शन कराकर विश्वास करा दिया कि वास्तव मे हम
लोग भी उल्लिखित दल के सदस्य हैं । इस प्रकार कुछ दिनों तक आवाजाही
होने पर इनको बतलाया गया कि पंजाब की फ़ौज मे भी विप्लव की तैयारी
जोरों से हो रही है । हम लोग बखूबी जानते थे कि इन लोगों को भेद की सारी
बाते सुना देने से क्या अनर्थ हो सकता है, क्योकि इन लोगों के ज़रिए यदि
सरकारी पक्ष को हमारी गदर की तैयारी का तनिक भी पता मिल जाता तो
पंजाब का सब किया-कराया मिट्टी मे मिल जाता । किन्तु इनसे दुराव रखने मे
भी तो सुभीता न था, जब इनसे कहा गया कि “यदि हमारी बातो पर विश्वास
न हो तो तुम अपने किसी आदमी को कुछ दिनों के लिए पंजाब भेज दो, हम उन
रेजिमेंटों से इसकी जान-पहचान करा देगे जिन्होंने कि प्रस्ताव को मान लिया
है ।” तब हमारी बात पर इन्हें बहुत कुछ विश्वास हो गया । इस प्रकार धीरे-धीरे
तीन-चार हवलदारों और सिपाहियो से हमारा परिचय हुआ ।
हम लोग ज्यादातर शाम को या अंधेरा हो जाने पर बारको में जाते थे किन्तु
दो-एक बार दिन को दोपहर के वक़्त भी जाना पड़ा है । इसी प्रकार एक दिन

74 / बन्दी जीवन
हम दो व्यक्ति बारक के समीप घने पेड़ों की छांह में बाट जोह रहे थे और हमारे
बीच का एक व्यक्ति बारक में दो-एक सिपाहियों को बुलाने गया था। देर तक
राह देखने पर भी जब हमारा साथी नहीं लौटा तब हम लोग दुचित्ते हो गए और
डर लगने लगा कि कहीं कोई विपत्ति तो नहीं आ गई। तब तो फिर यहां इस
प्रकार, प्रतीक्षा करना भी युक्तिसंगत नहीं। किन्तु अपने साथी को ही किस प्रकार
छोड़कर चल दें ? ऐसी-ऐसी बहुतेरी बातों पर हम सोच-विचार करने लगे।
डर तो हम लोगों को खूब लगता था किन्तु डर के मारे हम लोगों के हाथ-पैर
नहीं फूल गए, हमारा तो विश्वास है कि,विषाद की तनिक-सी भी कालिमा हमारे
चेहरे पर नहीं आने पाई। और हम ही बारक में कितनी ही बार आए-गए हैं, किन्तु
खटके ने एक भी बार साथ नहीं छोड़ा, फिर भी हम प्रत्येक बार साफ निर्विघ्न
लौट आए। लौटने पर सोचते थे कि चलो, आज का दिन तो निर्विघ्न व्यतीत
हुआ; किन्तु फिर भी कई बार बारकों में आना-जाना पड़ा। जो हो, देर तक
बाट जोहने पर भी जब मित्र महोदय न लौटे तब सोचा कि क्या सचमुच आफ़त
ने घेर लिया ! फिर सोचा कि हम लोग बंगाली हैं, हाथ में टोपी और साफ़ा है,
बारक के पास ही पेड़ की छांह में हम भले आदमी के लड़के बैठे हैं, इन घने
पेड़ों की क़तार के पास से ही ग्रैण्डट्रंक रोड गई है, जो कोई हाकिम-हुक्काम हमें
यहां पर इस दशा में बैठा हुआ देख ले तो क्या समझेगा ? हम ऐसी ही उधेड़-
बुन में थे कि मित्र महोदय को दो सिपाहियों के साथ अपनी ओर आते हुए देखा।
अतः हमारे सिर से बड़ा भारी बोझा-सा उतर गया। इसके पश्चात् इस बारक
के पास दो-एक बार सबेरे के समय भी आया हूँ, उस समय सिपाही लोग परेड पर
क़वायद करते थे। अपने ही परिचित एक हवलदार को सेना-परिचालन-कार्य
करते देखकर ऐसा लगा कि रेजिमेंट मानो हमारी ही है, हमारे उद्देश्य की
सफलता के लिए ही मानो यह सारी तैयारी की जा रही है। सामने से दो-एक
अंग्रेज़ अफ़सर घोड़े पर बैठे हुए निकल गए, किन्तु किसी ने हम लोगों
की ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय तो किसी के मन में रत्ती-भर भी सन्देह
न था।
एक दिन की बात का मुझे खूब स्मरण है। उम समय पंजाब का दुबारा
चक्कर लग चुका था। विप्लव की तैयारी पूरी होने को थी। एक दिन उन्हीं घने
पेड़ों के नीचे बैठकर, गारों की फ़ौजी बारक के बिलकुल ही समीप, अंग्रेज़ों के ही
राज्य को उलट देने के लिए कैसी भीषण गुप्त योजना की गई थी। उस दिन कोई
तीन हवलदार और नायब हवलदार तथा कुछ सिपाही, शाम होने पर, उन्हीं पेड़ों
के नीचे एकत्र हुए। हम लोग भी तीन व्यक्ति थे। इन पेड़ों की क़तार के एक
ओर रेल की पटरी है और दूसरी ओर है ग्रैण्डट्रंक रोड। इसी ग्रैण्डट्रंक रोड के
बग़ल में थोड़ा-सा मैदान छोड़कर सेना की बारकें हैं। कुछ सिपाही सड़क के
किनारे पेड़ों की ओट में इसलिए बैठे हुए थे कि यदि किसी को उस ओर आते
देखें अथवा ऐसा ही कुछ और खटका हो तो उसी दम हम लोगों को सावधान

फ़ौज की बारकों में / 75

कर दें। हम लोग भी यथासम्भव वृक्षों की ओट में बैठकर आसन्न-विद्रोह का
दिन, समय और अन्यान्य छोटी-मोटी बातों पर विचार कर रहे थे। बीच-बीच में
ये लोग शंकित-चित्त से इधर-उधर देख लेते थे। उस दिन मानो कई युगों की
संचित काल्पनिक वीर मूर्तियां, कलेवर धारण करके, उस अँधेरे में परछाईं की
तरह हमारे आगे देख पड़ीं थीं। सन् 1857 के गदर के पश्चात् फिर उसी तांडव
नृत्य की जंगी तैयारी का विचार करके देह और मन सचमुच ही पुलकित और
रोमांचित हो रहे थे। पलटन के लोग बड़ी ही आन्तरिकता के साथ हम लोगों से
बातचीत कर रहे थे। इस प्रकार घने पेड़ों के नीचे गुप्त रूप से हम लोगों को
सलाह करते समय, यदि सिपाहियों में से ही कोई जाकर अपने ऊँचे अफ़सरों को
इसकी इत्तिला दे आता तब तो कोर्ट मार्शल में इन सबकी जान के लिए बड़ी
मुसीबत पड़ती। यही कारण था कि उस दिन पेड़ों के नीचे आकर वे लोग इस
प्रकार चौकन्ने थे। किन्तु मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका, क्योंकि इस प्रकार की
तैयारी में छिपने-छिपाने का भाव बड़ी आसानी से ताड़ लिया जाता था और
इसीलिए मैंने वृक्षों की ओट में इस प्रकार छिपने के उद्योग का विरोध किया तथा
इस प्रकार संदिग्ध भाव से बार-बार इधर-उधर ताकने को भी मना किया। हम
लोग कहीं भी जब इस प्रकार सलाह करने के लिए आपस में एकत्र होते थे तब
इस बात पर हम सबका सदा ही ध्यान रहता था कि सहज-सरल भाव ही हममें
बना रहे; किसी प्रकार की चंचलता न आने पाए। किन्तु उस दिन मना कर
देने पर भी जब सिपाहियों ने मेरी बात न मानकर इस तरह चौकन्ने रहने मे
ही भला समझा तब मेरे मन में यही आया कि ये लोग यों ही भोले-भाव से और
अत्यन्त आग्रह की प्रेरणा से यहाँ चले आए हैं; इस विप्लव की तैयारी मे ये जी-
जान से शामिल हैं और इस तरह हमारे पास आने-जाने मे अपनी जान को
जोखिम में समझते भी हैं लेकिन—'ओखली में सिर दिया तो मूसल की चोट
का डर ही क्या ?' ऐसी भावना से ही ये लोग हमारे पास आने और विप्लव
की तैयारी की सलाह करने में हिचकते नही। इस तरह वे न जाने कितनी बार
हमारे पास आए होंगे।
इधर तो फ़ौजी बारकों में पहुँच हो गई और उधर बंगाल से लौटने पर
कुछ ही दिनों में, अमेरिका से लौटे हुए एक महाराष्ट्री युवक के आ जाने से,
पंजाब के साथ और भी घना सम्बन्ध करने का नया ज़रिया मिल गया। इन
महाराष्ट्री युवक का नाम पिंगले था। इनका पूरा मराठी नाम इस समय मुझे
याद नही। स्वदेश को वापस आते समय इन्होंने जहाज़ पर ही निश्चय कर
लिया था कि पहले बंगाल के विप्लवपन्थी दल का बंगाल में पता लगाएँगे, तब
पंजाब जाएँगे। कलकत्ता में विप्लव दल के कई लोगों मे इन्होंने भेंट की। इससे
पंजाब में विप्लव की तैयारी होने की बात कलकत्ता-भर में फैल गई। इधर
इनके कुछ मित्रों के साथ हमारे दल का भी सम्बन्ध था और इसी नाते पिंगले
हमारे दल में आ गए। हमारे दल में आते ही ये सीधे काशी भेज दिए गए।

76 / बन्दी जीवन
पिंगले ने कलकत्ता में बहुत लोगों से बमगोले मांगे थे। उस समय समूचे
बंगाल को प्रधानतया हमारे केन्द्र से ही बमगोले मिलते थे। अतएव बमगोलों
के लिए हम लोगों से पिंगले का घना सम्बन्ध हो गया।
काशी में इन्हीं दिनों हमारे मन में यह आशंका हो रही थी कि शायद अब
हमारा सम्बन्ध पंजाब से जुड़ना कठिन हो जाय; क्योंकि पाँचवीं दिसम्बर को
पृथ्वीसिंह काशी आनेवाले थे, किन्तु न तो उनके दर्शन हुए और न पंजाब का ही
समाचार मिला। ऐसे अवसर पर पिंगले के मिल जाने से ऐसी प्रसन्नता हुई मानो
कुबेर का धन हाथ लग गया हो। पिंगले के आ जाने से हम लोगों को सचमुच
बड़ा आसरा मिल गया। इनकी देह समुन्नत और बलिष्ठ थी, खूब गोरा रंग था
और इनकी आँखों तथा चेहरे से सुतीक्ष्ण बुद्धि झलकती थी। इस बुद्धिमत्ता ने
उस दिन हमारे मन में खास जगह कर ली थी। इन्हें देखने और इनसे बातचीत
करने से हम लोगों को पक्का विश्वास हो गया था कि इनके हाथों हमारे कई काम
सिद्ध होंगे, किन्तु सच तो यह है कि मनुष्य को पहचान लेना बड़ा कठिन काम
है।
मनुष्य जीवन का आदर्श कैसा हो—इस सम्बन्ध में पिंगले के साथ बहुतेरी
बातें होते-होते न जाने किस तरह गीता की चर्चा छिड़ गई और उस समय जब
उन्होंने गीता के कुछ श्लोक पढ़कर सुनाए तब हम लोगों को ज्ञात हुआ कि गीता
इन्हें कण्ठस्थ है। उन्होंने स्वयं कहा कि 'जब हम साधु हो गए थे तब अठारहों
अध्याय गीता मुखाग्र थी।' इस पर उनके जीवन का थोड़ा-बहुत पिछला इतिहास
जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होंने कोट इत्यादि उतारते-उतारते विस्तार-
पूर्वक बतलाया कि वह किस प्रकार साधु होकर भारत के विभिन्न स्थानों में
विचरते रहे, फिर किस तरह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अमेरिका
गए और वहाँ इस विप्लवदल में भर्ती हो गए।

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पंजाब की कथा
पिंगले के जीवन की पिछली बातों का आज मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं।
आज तो इतना ही याद पड़ता है कि साधु होकर उन्होंने समूचे भारत की
यात्रा की थी और फिर अमेरिका के मैकेनिकल इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते समय
वहाँ के विप्लव दल में सम्मिलित हो गए थे; किन्तु यह नहीं मालूम कि वह
किसलिए साधु हुए और क्यों इंजीनियर हुए और इसके पश्चात् किम तरह गदर-
पार्टी में शामिल हुए ? शायद स्वयं पिंगले ने भी इस विषय में और कुछ नहीं
बतलाया था ।
इस अध्याय में जो बातें मुझे कहनी हैं उनमें से बहुतेरी बातें आज स्मृति में
धूमिल हो गई हैं, इससे शायद कुछ बातें लिखने से रह जायें । ऐसा लगता है कि
इस भूल जाने और याद रहने के साथ हमारी प्रकृति का घना सम्बन्ध है । हमारे
स्मृतिपट पर कितनी ही बड़ी-बड़ी चीजें छोटा रूप धारण कर लेती हैं और छोटी
चीजें बड़े रूप में आ जाती है, फिर बहुतेरी बातो को न जाने हम किस तरह भूल
ही जाते है। इसका कारण यह मालूम होता है कि जो बात हमारे स्वभाव के
अनुकूल है, जिसका हमारी प्रकृति से मेल मिलता है वह चाहे कोई घटना हो या
कोई दार्शनिक मत अथवा चाहे कुछ और हो, वह तो हमारे चेतन अथवा अव-
चेतन में भी स्मृति-पट पर चित्र की भाँति अपने आप अंकित हो जाती है । परन्तु
जो बात हमारे स्वभाव के प्रतिकूल होती है उसे या तो हम भूल जाते हैं या केवल
खण्डन करने के लिए ही याद रखते हैं और खण्डन करने मे जिन युक्तियों तथा
घटनाओं से हमें सहायता मिलती है उन्हें भी हम अपनी अवस्था और अभिज्ञता
के अनुरूप याद रखते हैं ।
मुझे याद आता है कि अण्डमन द्वीप में रहते समय एक दिन रामेन्द्र बाबू की
'विचित्र प्रसंग' नामक पुस्तक पढ़ने से बिलकुल इसी ढंग के अनेक प्रकार के
विचार मन मे गम्भीर भाव से फैल गए थे और उनको मैंने अपनी नोट-बुक में लिख
रखा था । उन्हें मैं उपेन्द्र दादा (उपेन्द्रनाथ बनर्जी जो कि 'युगान्तर' के सम्पादक
थे और जिन्हें अलीपुरवाले मामले में काला पानी हुआ था) को प्रायः दिखलाता
था और वह उनकी तारीफ़ करते तो इमसे मन में बड़ा आनन्द होता था ।
अण्डमन की बातें जहाँ लिखी जाएँगी वही बतलाया जाएगा कि मेरी वह नोट-

78 / बन्दी जीवन
बुक किस तरह नष्ट हुई ।
हमने पिंगले को दो-एक दिन काशी में ठहराकर पंजाब भेज दिया। उनका
अनुरोध था कि पंजाब में हम उनके पास बेहिसाब बमगोले भेज दें, अतएव उनसे
कहा गया कि गोले तो भेजे जा सकते हैं किन्तु एक-एक बमगोले के बनवाने में
सोलह रुपये के लगभग खर्च बैठता है, इसलिए रुपये की मदद मिले बिना
बेहिसाब बमगोलों का भेजा जाना कठिन है। इनसे पृथ्वीसिंह और करतारसिंह की
भी चर्चा कर दी गई। अब रुपये लाने और पंजाबियों का कच्चा हाल जानने के
लिए पिंगले पंजाब को गए। पिंगले के पास इनके कुछ साथियों का पता-ठिकाना
था। लगभग एक हफ्ते में ही ये काशी लौट आए। अब रासबिहारी की पंजाब-
यात्रा में भी कुछ रोक-टोक न थी। किन्तु उनके जाने के पहले मैं एक बार फिर
पिंगले के साथ पंजाब हो आया।
दिसम्बर महीने के एक सबेरे खासी ठंड पड़ रही थी जब मैं साधारण हिन्दु-
स्तानी के लिबास में पिंगले के साथ अमृतसर पहुँचा। मैं तो पंजाबी भाषा बोल
न सकता था किन्तु पिंगले को इसका अभ्यास था। हम लोग एक गुरुद्वारे में
जाकर ठहरे। यहाँ पर पिंगले ने एक पंजाबी मुखिया से मेरा परिचय कराया।
इनका नाम मूलासिंह था।
मूलासिंह संघाई के पुलिस विभाग मे नौकर रह चुके थे और वहाँ पर भी
पुलिस के हड़तालियों के मुखिया बने थे। इस बार उन लोगों से भी मेरा परिचय
हुआ जो कि पिनांग में नौकर रह चुके थे। इस समय मैंने बहुत से देहाती सिक्खों
को यहाँ आते-जाते देखा था। ये अधिकतर किसान या मजदूर थे, किन्तु ये भी
देश का काम करने के लिए मतवाले हो रहे थे। सिक्ख सम्प्रदाय की ऐसी ही
शिक्षा-दीक्षा है। इनमें से बहुतेरों की देह खासी गठीली और कसी हुई थी।
इस बार मैने मूलासिंह को एक केन्द्र बनाने की आवश्यकता भली भांति
समझाई और इसके अनन्तर इन्ही ने केन्द्र का भार ग्रहण किया। किन्तु यदि ये
केन्द्रपति न बनते तो बहुत अच्छा होता।
पंजाब के विभिन्न स्थानो से आए हुए कार्यकर्ता लोग इस समय हाथ मे कुछ
काम न होने और खाने-पहनने का सुभीता न रहने के कारण कुनमुना रहे थे और
इनमे से बहुतों के दिल में एक तरह से असन्तोष की आग धधक रही थी। इसका
दायित्व प्रधानतया मूलासिंह पर ही था। ये सब लोग जी लगाकर देश का काम
करने के लिए दूर-दूर से घर-द्वार और अपना काम-काज छोड़कर आये हुए थे।
इनमे से कोई भी जीविका के लिए कुछ उद्योग नही करता था और उस समय
जैसी दशा थी उसके लिहाज़ से उद्योग करने का कुछ सुभीता भी न था। यदि दो
रोटियों के लिए शाम-सवेरे नेताओ से तकाजा करना पडे तो ऐसी स्थिति मे काम
करने मे सचमुच सभी का चिढ जाना सम्भव है। बेचारे ये सभी लोग गुरुद्वारे में
तो रहते और पास के होटल में खाते थे। अपने यहाँ देश का काम करने की इस
दशा मे अक्सर इस तरह की मामूली छोटी-छोटी बातो ने बहुतो के दिलो को

दुखाया है और इसके फलस्वरूप कई अवसरो पर बहुत-कुछ अनर्थ भी हुए हैं।
इससे कई बार यह विचार आता है कि जब तक गांठ में काफ़ी रकम न हो तब
तक दूसरों की दी हुई रोटियों के भरोसे देश का और दस भाइयो का कार्य करने
को तैयार होना ठीक नही। फिर यह भी देखा है कि आर्थिक स्वाधीनता प्राप्त
करने की चेष्टा में प्रायः अर्थोपार्जन करना ही मुख्य काम हो जाता है और तन-
मन से देश का काम न किया जाय तो प्रायः कुछ भी नही होता। इसके सिवा
काम न रहने से भी बहुत मे दल नष्ट हो चुके हैं। इस समय पंजाब में उपयुक्त
नेता न रहने के कारण वहाँ बहुतेरे कार्यकर्ता हाथ पर हाथ रखे बेकार पडे थे, काम
न किया जाने के कारण देश चौपट हो रहा था और मज़ा यह कि काम करनेवालों
को खोजने पर भी काम न मिलता था। रासबिहारी ही एक ऐसे 'नेता' थे जिन्होंने
इस उतावले जनसघ को कुछ परिमाण मे सुनियन्त्रित कर लिया था। मैंने भी इस
गोलमाल को सुधारने की भरसक कोशिश की थी। मूलासिंह से मुझे मालूम हुआ।
कि विद्रोह होने पर बहुत-सी रेजिमेटो ने देशवासियो के अनुकूल हो जाने का
वचन दिया है। जिन पलटनो मे इस समय तक अपने आदमी नही भेजे गए थे
उनकी मैंने एक फेहरिस्त बनाई और विभिन्न प्रदेशो से आए हुए पंजाबी कार्य-
कर्ताओ को उल्लिखित पलटनो मे भेजने की व्यवस्था की।
मूलासिंह से मेरा परिचय कराके पिंगले अन्यान्य परिचित सिक्खो की तलाश
मे 'मुक्तसर' के मेले को गए। इस मुक्तसर के मेले का थोडा-सा अद्भुत इतिहास
पाठको को सुनाए बिना मुझमे नही रहा जाता।
एक बार 'आनन्दपुर' के किले मे गुरु गोविन्दसिंह अपने परिवार और
अन्यान्य लोगो के साथ शत्रु मुमलमान सेना द्वारा घेर लिये गए। यह घेरा लगातार
सात महीने तक रहा। घेरे के कारण दोनो दल—जो किले मे घिरे हुए थे, और
जो लोग बाहर से घेरा डाले हुए थे—बहुत ऊब गए। मुसलमानो की ओर मे
बार-बार गुरु से 'आनन्दपुर' छोडकर चले जाने का प्रस्ताव किया गया किन्तु गुरु
ने इसे नही माना। गुरु को उम प्रस्ताव पर किसी भी तरह राजी न होते
देख, बाहर जाने की इच्छा से कुछ सिक्खो ने गुरुजी की स्त्री गुजरी को
यहाँ मे हट जाने के प्रस्ताव पर राजी कर लिया, किन्तु गुरु गोविन्दसिंह इतने
पर भी अपने निश्चय से विचलित न हुए। भूख के कारण बहुतेरे सिक्ख अधीर
हो रहे थे। पेट की ज्वाला के कारण उम समय वे गुरु की आज्ञा टालने पर
उतारू हो गए। तब गुरु गोविन्दसिंह ने कहा—"तुम लोग अब तक सिक्ख गुरु
के आश्रय मे थे, किन्तु अब भूख के मारे बेचैन हो, गुरु का वाक्य उल्लंघन करके
शत्रुओ के हाथ मे आत्म-समर्पण करने जा रहे हो। इसमे सिक्ख गुरु की कोई
जवाबदारी नही है। अतएव इसके लिए 'बे-दावा' लिखकर चाहे जहाँ चले
जाओ।" और सब सिक्ख तो इस प्रकार 'बे-दावा' लिखकर गुरु को वही छोडकर
चलते हुए किन्तु चालीस सिक्खो ने गुरु का साथ नही छोडा। अन्त मे गुरु गोविन्द-
सिंह को भी यह स्थान छोड़ना पडा और शत्रु के पीछा करने पर वे अनेक

80 / बन्दी जीवन
स्थानों में बचाव के लिए दौड़-धूप करने लगे। किन्तु उन चालीस सिक्खों ने
किसी भी दशा में गुरु का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रकार घूमते-फिरते हुए गुरु
गोविन्दसिंह जब भद्र देश में पहुँचे तब उन 'बे-दावा' सिक्खों में से बहुतों ने
आकर गुरु से भेंट की। अब इन्होंने शत्रु से सन्धि करने के लिए गुरुजी से दोबारा
अनुरोध किया। इस पर गोविन्दसिंह ने कहा—"जो तुम चाहो तो यह लिखकर
चले जा सकते हो कि हम सिक्ख नहीं हैं।" तब 'हम सिक्ख नहीं हैं' यह बात
लिखकर और वह पत्र गुरुजी को देकर चालीस सिक्ख चले गए। किन्तु इस संकट
के समय श्रीगुरु को छोड़कर चले जाने के कुछ ही देर बाद उन लोगों के मन में
बड़ा पछतावा हुआ। इधर 'खेदराना' नामक तालाब के समीप शत्रु-दल ने फिर
गुरु गोविन्दसिंह पर हमला किया। घोर संग्राम करते-करते गुरु ने देखा कि किसी
ओर से एक दल ने आकर शत्रु-पक्ष पर धावा बोल दिया है। गुरु गोविन्दसिंह
की समझ में न आया कि इस विपत्ति के समय में हमारी सहायता करने यह कौन
आ पहुँचा है। इन नए आये हुए योद्धाओं की मार के आगे मुसलमान तो ढीले
पड़ गए परन्तु ये सब थोड़ी देर युद्ध करके प्रायः सभी जूझ गए। इस युद्ध में एक
मुसलमान के बल्लम से निहत एक व्यक्ति की लाश उठाकर देखी गई तो वह
लाश एक स्त्री की निकली इसका नाम माई भागो था। इसी की सलाह और
प्रेरणा से 'बे-दावा' सिक्खों ने अपनी भूल को सुधारने का मार्ग ढूँढ़ निकाला था।
युद्ध का अन्त हो चुकने पर गुरु गोविन्दसिंह रणभूमि में लेटे हुए प्रत्येक मृत सिक्ख
के पास जाकर उसके धूल में लिपटे हुए मुंह को पोंछकर वैसे प्यार और आदर
का व्यवहार कर रहे थे जैसाकि पिता अपने पुत्र का करता है। अन्त में उन्होंने
देखा कि एक व्यक्ति में उस समय तक प्राण थे। इसका नाम महासिंह था। महा-
सिंह के मस्तक को अपनी गोद मे रखकर और उसके सिर पर हाथ फेरते-फेरते
गुरु गोविन्दसिंह ने पूछा—'महासिंह, तुम क्या चाहते हो ?' महासिंह की आंखो
में आँसू भर आए। उसने कहा—"मैं यही चाहता हूँ कि हम लोगो के उस पत्र
को फाड़ डालिए जिसमे हम लोगों ने लिख दिया था कि हम लोग सिक्ख नहीं
हैं।" अब गुरुजी ने समझा कि दूसरी ओर से शत्रु पर किसने हमला किया था।
गुरुजी ने देखा उन चालीसों सिक्खों ने रणक्षेत्र मे प्राण दे दिए हैं। लाशो मे
उन्होंने स्त्रियों की भी लाशें देखीं। अब 'सिक्ख नहीं' वाला पत्र गुरुजी ने फाड़-
कर फेंक दिया। महासिंह भी महानिद्रा मे मग्न हो गया। वहाँ पर जो लोग
उपस्थित थे उनसे गुरु गोविन्दसिंह ने कहा कि 'जिस खालसा' में ऐसे महाप्राण हैं
वह खालसा सहज ही नष्ट नही होगा। जहाँ पर एक भी भक्तप्राण आत्माहुति
देता है वह स्थान पवित्र हो जाता है यहाँ पर तो इतने अधिक महाप्राण व्यक्तियों
ने प्राण दे डाले हैं, इसलिए इस स्थान का नाम 'मुक्तसर' हुआ और यहाँ के
तालाब मे जो कोई स्नान करेगा, वह मुक्त हो जाएगा। इस प्रकार मुक्तसर-मेले
की उत्पत्ति हुई। यह सिक्खों का महामेला है। यहाँ पर हर साल एक लाख से
अधिक सिक्खों का जमाव होता है। सिक्खों के प्रत्येक उत्सव के साथ ऐसे एक-

पंजाब की कथा / 81

न-एक अपूर्व इतिहास की कथा संलग्न है और हरेक एक सिक्ख का ऐसे उत्सव
और उमंग के बीच लालन-पालन होता है तथा ऐसे ही वातावरण मे वह
मनुष्य बनता है। मेरी समझ से तो सिक्ख जाति भारत की एक अपूर्व वीर
जाति है।
पिंगले जिस समय 'मुक्तसर' के मेले से लौटकर आए उस समय करतारसिंह,
अमरसिंह आदि सभी गुरुद्वारे मे उपस्थित थे। मुझे देखकर करतारसिंह बहुत ही
प्रसन्न हुए और पूछा कि "बोलो, रासबिहारी कब आएँगे ?" मैंने कहा- "बस,
अब उन्ही का नम्बर है; यहाँ ठहरने के लिए कुछ इन्तजाम हो जाए और आपका
काम भी तनिक सिलसिले से होने लगे, बस फिर उनके आने मे देर नही।" इस
समय मैंने करतारसिंह को केन्द्र की आवश्यकता विशेष रूप से समझाई और यह
भी कहा कि केन्द्र का भार मूलासिंह ने ग्रहण कर लिया है। रासबिहारी के लिए
अमृतसर और लाहौर मे दो-दो किराए के मकान लेने को कह दिया। इन सारी
बातो के सम्बन्ध मे दादा ने मुझसे पहले ही कह रखा था, एक ही समय मे विभिन्न
स्थानों पर कई मकान अपने अधिकार मे होने चाहिए। अतः ऐसा ही किया गया।
अमृतसर का मकान तो मैंने ही देखकर पसन्द किया। लाहौर मे मकान लेने के
लिए दूसरा आदमी भेजा गया। पंजाब की उस समय की दशा का हाल करतार-
सिंह से सुनकर मुझे बहुत कुछ आशा हुई। मैंने सोचा कि इस बार सचमुच कुछ
कहने लायक काम हो रहा है। इस समय सिक्खो का एक और दल अमृतसर मे
आया। यह दल अमेरिका से लौटकर आया था इस दल के कुछ नेताओ को मैने
देखा। इनमे एक तो इतने बूढ़े थे कि उनके गालो मे झुर्रियाँ पडकर लटकने को
थी। मेरा ख्याल है कि ये वही वृद्ध पुरुष थे जिन्होने बाद मे अण्डमन टापू मे भी
बडे तेज के साथ के अपनी थोडी-सी शेष आयु बिताकर साठ या सत्तर वर्ष की
अवस्था मे उसी द्वीप मे जीवन को विसर्जित कर दिया। इस बुढापे मे भी इन्होने
अण्डमन मे हडतालियो के साथ हडताल करने मे कभी पीछे पैर नही रखा। इस
दल का कोई व्यक्ति उस समय अपने घर न पहुँचा था। अमेरिका से भारत मे
आकर अमृतसर मे ही ये लोग ठहरे थे। इन्होने अपनी गाढी कमाई मे से हम
लोगो को पाँच सौ रुपये दिए थे।
इन दिनो करतारसिंह अद्भुत परिश्रम कर रहे थे। वे प्रतिदिन साइकिल
पर बैठकर देहात मे लगभग चालीस-पचास मील का चक्कर लगाते थे। गाँव-
गाँव मे काम करने को जाते थे। इतना परिश्रम करने पर भी वे थकते न थे।
जितना ही वे परिश्रम करते थे उतनी ही मानो उनमे फुर्ती आती थी। देहात का
चक्कर लगाकर अब वे उन पल्टनो मे गए जिनमे कि काम नही किया गया था। इन
लोगो के काम करने का ढंग इतना कच्चा था कि इसमे इस समय इनमे से बहुतो
की गिरफ्तारी के लिए वारंट निकला। करतारसिंह को गिरफ्तार करने के लिए
इस समय पुलिस ने एक गाँव को जाकर घेर लिया। उस समय करतारसिंह गाँव
के पास ही कही मौजूद थे। पुलिस के आने की खबर पाते ही वे साइकिल पर

82 / बन्दी जीवन
सवार हो उस गांव में ही आ गए ! पुलिस उन्हें पहचानती न थी। इस मर्तबा
करतारसिंह इसी असीम साहस के कारण साफ बच गए। यदि वे ऐसा न करते
तो संभवतः रास्ते में ही पकड़ लिए जाते।
इस समय रुपये-पैसे का खर्च इतना अधिक बढ़ गया था कि अब दान की
रकम से काम न चलता था, इसलिए अब वे कुछ-कुछ डकैती करने के लिए विवश
हुए। बाद में मालूम हुआ कि मूलासिंह भला आदमी न था, इसने दल का रुपया-
पैसा भी हड़प लिया। जिस समय ये बातें मालूम हुईं उस समय सुधार का कोई
उपाय नहीं था। क्योंकि जहां तक मुझे स्मरण है, वह इसके थोड़े ही दिन बाद
नशे की हालत में शीघ्र ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसके सिवा व्यक्तिगत
शत्रुता के कारण उसने एक आदमी के यहाँ डकैती भी कराई थी।
सभी बड़े-बड़े आन्दोलनों में देखा गया है कि साधु और महान् चरित्रवान्
पुरुषों के साथ कुछ नर-पिशाच भी दल में आ मिलते हैं। यह आन्दोलनों का दोष
नहीं है, यह तो हमारे मनुष्य-चरित्र का ऐब है। शायद लेनिन ने भी कहा था कि
प्रत्येक सच्चे बोलशेविक के साथ कम से कम उन्तालीस बदमाश और साठ मूर्ख
उनके दल में मिल गए थे।¹ और मैंने श्रद्धेय शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय जी से सुना है
कि देशबन्धु दास ने भी कदाचित् कहा था कि वकालत करते-करते हम बुड्ढे हो
गए और इस बीच हमको बड़े-बड़े धोखेबाज़ों से भी साबिका पड़ा; किन्तु असह-
योग आन्दोलन में हमने जितने धोखेबाज़ आदमी देखे वैसे ज़िन्दगी-भर में नहीं
देखे थे।
मैं इस बार पंजाब में हफ्ते-भर के लगभग इन लोगों के साथ रहा। अतएव
इनके बहुत-से आचार-व्यवहारों को मैंने ध्यान से देखा। यद्यपि ये लोग कड़ाके
की ठण्ड में भी बहुत ही तड़के नहा-धोकर ग्रन्थसाहब इत्यादि का पाठ करते थे
किन्तु होटल में भोजन करने के कारण इनका खान-पान शुद्धतापूर्वक न होता था,
परन्तु इनका आपस का बर्ताव बहुत ही भला था। एक-दूसरे को बुलाते या बात-
चीत करते समय ये 'सन्तो', 'सज्जनो', 'बादशाह' इत्यादि सम्मानसूचक शब्दों
के सिवा और किसी शब्द का प्रयोग न करते थे। इस बार भाई निधानसिंह से
मेरी मुलाक़ात हुई। यही वह पचास वर्ष के बूढ़े सिक्ख थे। ये कोई तीस-पैंतीस
वर्ष से देश के बाहर थे और चीन में रहते समय एक चीनी सुन्दरी से इन्होंने
विवाह कर लिया था। मैं इन्हें अक्सर धर्म-चर्चा और धर्म-ग्रन्थ का पाठ करते
देखता। एक बार मैंने स्टेशन पर जाकर देखा कि वहाँ प्लेटफार्म पर बैठे हुए आप
छोटी-सी धर्म-पुस्तक को मन ही मन पढ़ रहे हैं। ये कुछ सिर्फ दिखावे के लिए
ही ऐसा नहीं करते थे, क्योकि मैंने अण्डमन में भी इनकी यही दशा देखी थी। मैंने
इनमें जैसा तेज देखा है वैसा नौजवानों में भी नही देखा।

  1. Russia's Ruin by E. Wilcox p. 249

पंजाब की कथा / 83
साधारण पंजाबियो के यौन आचरण के सम्बन्ध मे प्रतिष्ठित भारतीय आदर्श
की दृष्टि से सामान्य जन-धारणा अच्छी नही होती और फिर पजाबियो मे सिक्खों
के यौन-व्यवहार को तो और भी चिन्त्य समझा जाता है । शायद इसका प्रधान
कारण पंजाब में पुरुषो की अपेक्षा स्त्रियों की सख्या बहुत ही कम होना है।
इसके सिवा पजाब प्रान्त शायद तमोमुखी राजसिक भाव से परिपूर्ण है। लगातार
मुद्दत से विदेशियो के संघर्ष मे रहने के कारण और क्रमशः निम्नतर सभ्यता के
ही संस्पर्श मे आते रहने से यहाँ की सभ्यता मानो धीरे-धीरे फीकी पड गई है।
अवनति के दिनों मे विदेशियो का यह संस्पर्श जैसे हानिकारक हुआ है वैसे ही
उन्नति के जमाने मे इससे सर्वश्रेष्ठ सभ्यता का विकास भी हो सकता है। जो
लोग बुरे मार्ग पर बहुत आसानी मे चले जाते है उनमे भले बनने का भी बहुत-
कुछ मामर्थ्य है, इतना कि शायद और लोगो मे उतना न हो । इस कारण असयम,
निष्ठुरता, नीचता और हिंसा-वृत्ति से सिक्खो का चरित्र जिस प्रकार कलंकित
हुआ है उसी प्रकार सयम उदारता और क्षमावृत्ति मे भी वे लोग अपना सानी नही
रखते । तभी तो इन गए-बीते दिनो मे भी अध पतित सिक्ख जाति ने, 'ननकाना
माहब' और 'गुरु का बाग' मे अद्भुत वीरता और सयम का नमूना दिखला दिया ।
पजाब मे पुरुषो की अपेक्षा स्त्रियां ही अधिक बदनाम हैं किन्तु इसी पंजाब
मे उस दिन सतीत्व की ऐमी गौरवोज्ज्वल स्निग्ध किरण प्रकट हुई थी जिसकी
तुलना इम कलिकाल मे मिलनी कठिन है । डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूत-
पूर्व अध्यापक भाई परमानन्द के छोटे चाचा के बेटे, भाई बालमुकुन्द, दिल्ली
षड्यन्त्र के मुकदमे मे गिरफ्तार किए। इन्ही बालमुकुन्द के पूर्वपुरुष मोतीदास को
सिक्खो के अभ्युत्थान-समय मे आरे से चीरकर मार डाला गया था। गिरफ्तार
होने मे एक ही वर्ष पहले भाई बालगुकुन्द का विवाह हुआ था। इनकी पत्नी
श्रीमती रामराखी परम सुन्दरी ललना थी। उम्र इनकी नई थी ही। जिम दिन
इनके पति गिरफ्तार हुए उसी दिन से ये व्याकुल हो गईं और अनेक प्रकार से
देह को सुखाने लगी । फिर जब भाई बालमुकुन्द को फाँसी का हुक्म हो गया तब
ये उनसे मिलने गई । किन्तु इनके मर्माश्रुओ ने, जी भरकर स्वामी के दर्शन न
करने दिए। घर लौटकर ये एक प्रकार से अधमरी दशा मे समय बिताने लगी ।
एक दिन ये अपने कमरे मे थी कि बाहर से रोने का कोलाहल सुन पडा । कमरे
से बाहर आने पर श्रीमती रामराखी को असल बात मालूम हो गई । ये अब
और न सहन कर सकी । पति का मृत्यु-समाचार पाकर मती-साध्वी, खासी
नीरोग दशा मे, पति का ध्यान लगाकर मानो पति से जा मिली । मिट्टी मे मिल
जाने के लिए ही मानो उनकी देह लोक मे पडी रह गई। ऐसे पति-प्रेम और
आत्मोत्सर्ग की तुलना है कही ? इम घटना का स्मरण होते ही देह और मन
पुलकित होकर कण्टकित हो जाता है ! बालमुकुन्द की गृहिणी ! तुम धन्य हो ।
ऐसी पत्नी के बिना क्या ऐसा पति हो सकता है । हाय रे भारत के नसीब, ऐमी
पत्नी और ऐसे पति का बना रहना भी तेरे भाग्य मे न था !

रासबिहारी बोस से सम्पर्क, १९१५ का अखिल भारतीय सशस्त्र क्रान्ति प्रयास

9
काशी केन्द्र की कहानी
इस बार पंजाब से नया उत्साह लेकर लौटने पर भी काशी आने पर मुझे
ऐसा लगा मानो अब तक मैं बहुत अनाचार और अनियमों में था। मैं नहीं कह
सकता कि पंजाब के मुकाबले में काशी कितनी मनोहर और पुनीत मालूम हुई।
मैं नहीं कह सकता कि ऐसा क्यों हुआ, किन्तु इस मर्तबा काशी के जिस स्निग्ध
रूप का अनुभव मुझे हुआ उसका अनुभव काशी मे मुद्दत से रहने पर भी नहीं
हुआ था। देह में काशी की हवा लगते ही ऐसा मालूम हुआ कि बहुत दिनों की
अपवित्र देह शुद्ध हो गई। काशी में सिर्फ एक दिन रहने से ही ऐसा जान पड़ा कि
बहुत दिनों की संचित ग्लानि दूर हो गई।
विप्लव की तैयारी व्यर्थ हो जाने पर रासबिहारी जब काशी मे वापस आए
तब उनके मन मे भी बिलकुल ऐसा ही भाव हुआ था।
काशी लौट आने पर पूर्व बंगाल के एक नेता से भेंट हुई। हमारे एक पूर्व-
परिचित नेता इसमे पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे। इसमे, ऐसी आशा के वाता-
वरण में सभी पूर्व-परिचित व्यक्तियो के जेल चले जाने से मुझे एक अनिर्दिष्ट-सी
वेदना हो रही थी। इतने काम-काज के बीच ज्यों ही थोड़ी-सी फुरसत मिल
जाती थी त्यों ही अक्सर मन में यह बात कसकने लगती थी कि आज वे लोग क्यों
हमारे साथ नहीं है। उस आनन्द को उस समय सभी के साथ न लूट सकने से
जब-तब उनका वह विच्छेद प्राणों को बहुत ही सताने लगता था।
कलकत्ता-विभाग के एक सुप्रसिद्ध नेता, श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय,
इन्ही दिनों काशी आए। विप्लव-युग के श्रेष्ठ कार्यकर्ताओं के बीच उनका स्थान
बहुत उच्च है। इतिहास में यह अक्सर देखा जाता है कि जब कोई नया आन्दोलन
समाज अथवा राष्ट्र के आम व्यवहार के विरुद्ध सिर उठाता है तब जो लोग वैसे
आन्दोलन के प्राण-स्वरूप होते हैं उनका चरित्र अनन्य-साधारण हुए बिना वह
आन्दोलन कारगर नहीं हो सकता। इसी से जिस समय कोई सम्प्रदाय राज-रोष
में दग्ध किया जाता है अथवा समाज के निग्रह में पीसा जाता है उस समय भी
उस सम्प्रदाय के व्यक्तियों के चरित्र में कुछ न कुछ विशेषता अवश्य रहती है।
यही कारण है कि ऐसे सम्प्रदायों की सदस्य-संख्या स्वल्प होते हुए भी समाज पर
उनका प्रभाव कुछ कम नहीं पड़ता। विप्लव के विगत इतिहास से भी इस बात

की सच्चाई सिद्ध हुई है। यतीन्द्र बाबू ऐसे ही सम्प्रदाय के प्राण-स्वरूप थे और
कई विभिन्न सम्प्रदायों पर उन्होंने अपने चरित्र-बल से अपना सुदृढ़ आधिपत्य
जमा लिया था।
विप्लव का काम-काज बहुत ही गुप्त रीति से करना पड़ता था। भारत के
विभिन्न स्थानों में विप्लव के लिए भिन्न-भिन्न कितने ही दल बन गये थे। उन
सब का शायद अब तक भली भाँति पता भी नही लगा। शक्तिशाली महापुरुषों
की सर्वग्राही प्रतिभा का आश्रय न मिलने से ये दल एक विशाल सगठन में
संगठित न हो सके। वे अलग-अलग ही रहे। इन छोटे-छोटे स्वतन्त्र दलों का
होना भला हुआ या बुरा, यह कहना कठिन है।
इन विभिन्न दलो को सम्मिलित करके एक विराट् दल के रूप मे परिणत
करने का उद्योग बहुत दिनो मे किया जा रहा था किन्तु कोई शक्तिशाली नेता न
रहने से किसी भी दल ने दूसरे दल में मिलकर अपनी स्वतन्त्रता खो देना स्वीकार
नही किया। इन दलों के मुखिया लोग ही अक्सर इस कारण कि वे अपने-अपने
दलों पर अपना साधारण आधिपत्य बनाए रखना चाहते थे ऐसे मिलन के
विरोधी थे। 'मनुष्य सहज ही पराई अधीनता स्वीकार करने को तैयार नही हो
जाता, परन्तु फिर भी सचमुच शक्तिशाली पुरुष के आगे उसे माथा झुकाना ही
पडता है।' जिस समय किसी अभिनव आदर्श अथवा अद्भुत कार्य की प्रेरणा मे
मनुष्य जाग पड़ता है उस समय व्यक्तिगत अहंकार की ये सारी तुच्छताएँ और
स्वार्थपरताएँ सिर नही उठा सकती।
यतीन्द्र बाबू का नेतृत्व इस ढंग का था कि इसके प्रभाव से बंगाल के बहुत-से
छोटे-छोटे दल एक मे मिल गये थे। यद्यपि यतीन्द्र बाबू कोई धुरन्धर विद्वान् नही
थे किन्तु इनके चरित्र के प्रभाव से बहुतेरे शिक्षित युवको ने इन्हें आत्मसमर्पण कर
दिया था। इनमे जैसा अतुल साहस था वैसे ही इनके प्राण भी उदार थे। इनके
चरित्र-बल की बाते बंगाल के विप्लवपन्थी लोगो को भलीभाँति मालूम है।
किन्तु इनके द्वारा इन भिन्न-भिन्न दलो का एक सूत्र में आबद्ध होना उसी दिन
सम्भव हुआ जिस दिन कि पजाब मे गदर होने की तैयारी के समाचार से एक
नये काम की प्रेरणा ने उन सबको उतावला कर दिया था। फिर भी, इस मिलन-
कार्य मे यतीन्द्र बाबू का चरित्र बहुत ही सुन्दर रूप में प्रकट हुआ है। क्योकि
दल के भिन्न-भिन्न सम्प्रदायो में कुछ इने-गिने ही आदमी न थे, और इन
सबका स्वभाव और चरित्र भी मामूली आदमियो के स्वभाव और चरित्र जैसा
नही था, अतः उन सबके मन पर आधिपत्य कर लेना कुछ मामूली शक्ति का काम
नही है।
सच तो यह है कि बंगाल मे इस समय विप्लव का उद्योग करने वाले दो ही
दल थे। इनमें से एक के मुखिया यतीन्द्र बाबू थे। दूसरे दल के दो भाग किये जा
सकते हैं, एक बंगाल के बाहर काम करता था और दूसरे ने बंगाल के भीतर ही
अपना कार्यक्षेत्र बना रक्खा था। बंगाल के बाहर की कुल जिम्मेदारी रासबिहारी

86 / बन्दी जीवन
को दी गई, किन्तु बंगाल के भीतर जो काम हो रहा था उसका भार किसी एक
व्यक्ति पर न था ।
यतीन्द्र बाबू काशी इसलिए बुलाये गए थे जिसमें कि सारा उत्तर भारत एक
सूत्र में और एक सुर में कर लिया जाए । इस प्रकार पंजाब के सीमान्त प्रदेश से
लेकर पूर्व बंगाल और असम की सीमा तक समूचा देश एक संगठन में रहकर
विप्लव के लिए तैयार ही था। पंजाब के सिपाही इस समय कुछ कर दिखाने के
लिए ऐसे उतावले हो गए थे कि अब किसी भी तरह इन्हें शान्त न रखा जा
सकता था। मैं नहीं कह सकता कि इस प्रकार इन्हें संयत कर देना अच्छा हुआ
या बुरा, क्योंकि यदि हम लोगों की रोक-टोक न रहती तो पंजाब में अवश्य ही कुछ
न कुछ भीषण घटना हो जाती । कौन कह सकता है कि उसका फल क्या और
कैसा होता ? हम लोगों ने उनकी जल्दीबाजी को इसलिए रोका था कि सारा
देश एक मत से विप्लव के ताण्डव-नृत्य में सम्मिलित हो जाय ।
मालूम नहीं कि यतीन्द्र बाबू के काशी आने का हाल सरकार को कुछ ज्ञात
हुआ था या नहीं, और यदि हुआ था तो कितना ? अतः मुझे यह स्पष्ट करना
चाहिए कि यहाँ पर इस बात का उल्लेख मैंने किसलिए किया है। क्योंकि यहाँ
तक मैंने जो कुछ लिखा है उसमें एक भी गुप्त बात प्रकट नहीं की गई है, यहाँ तो
मैंने उन्हीं घटनाओं का उल्लेख किया है जिन पर कि षड्यन्त्र-सम्बन्धी मुकदमों
में प्रकाश पड़ चुका है और जो अदालतों में प्रमाणित हो चुकी हैं। कुछ बातें तो
ऐसी भी हैं जिन्हें सरकारी पक्ष ठीक-ठीक नहीं जानता, इसीलिए इन घटनाओं
को भी मैंने छोड़ दिया है। क्योंकि उन घटनाओं को सिद्ध करने योग्य उपयुक्त
प्रमाण इस समय तक सरकार के पास नहीं हैं। जिन घटनाओं के प्रकट होने से
किसी पर तनिक भी आंच आने की सम्भावना नहीं है और जिन्हें सरकार तो भली
भाँति जानती है किन्तु हमारे देशवासी जिनके अत्यन्त अस्पष्ट आभास के सिवा
और कुछ भी नहीं जानते, ऐसी ही घटनाओं का वर्णन मैं अपनी लेखन-शक्ति
क्षीण होते हुए भी करना चाहता हूँ। विगत युद्ध के समय भारत में जो षड्यन्त्र-
सम्बन्धी मुकदमे हुए थे उनकी सुनवाई अधिकतर जेलों में हुई थी, उन मुकदमों
का कच्चा हाल जनता को प्रायः मालूम ही नहीं हुआ, क्योंकि पुलिस और न्याय-
कर्त्ता को जिस बात का प्रकाशन पसन्द न होता था, फिर वह भले न्यायकर्त्ताओं
के सामने प्रमाणित हो चुकी हो उसका समाचार प्रकाशित न किया जाता था।
इन कारणों से वे घटनाएँ बहुतों के लिए बिलकुल ही नई होंगी। मैं सिर्फ यही
चाहता हूँ कि जो बातें सरकार तक पहुँच गई हैं उनसे जनता भी परिचित हो
जाय। जो सचमुच एक दिन देश में हुआ था और जिसको जान लेने से अपनी
शक्ति-सामर्थ्य का ज्ञान हो जाता है और यह भी मालूम हो जाता है कि किस
जगह हमारी दुर्बलता थी, कहाँ हमने दुर्बुद्धि का परिचय दिया था, और किस
स्थान पर हमारे मन की संकीर्णता तथा कार्य की त्रुटि प्रकट हुई थी—अतएव ही
उन घटनाओं पर मैं निःसंकोच होकर प्रकाश डालना चाहता हूँ। इससे हमारा

काशी केन्द्र की कहानी / 87
भला ही होगा, बुराई तनिक-सी भी न होगी। देश में विप्लव की जैसी प्रचण्ड
तैयारी हुई थी उसे छिपाने की अब कुछ भी आवश्यकता नहीं है। मैं तो चाहता
हूँ कि देशवासियों को उसका रत्ती-रत्ती-भर हाल मालूम हो जाय। मेरी पुस्तक
पूर्ण होने पर देशवासियों को मालूम होगा कि गदर की तैयारी कुछ इने-गिने लड़कों
और नवयुवकों के मन की लहर ही न थी, और न इसकी तैयारी ही कुछ ऐसे
अव्यवस्थित रूप में हुई थी जैसाकि रौलट रिपोर्ट में प्रकट किया गया है। रौलट
रिपोर्ट तो लिखी ही इस दृष्टि से गई है कि भारतवासियों को आत्मशक्ति पर
विश्वास न होने पावे, अतः उसमें घटनाओं का वर्णन इस ढंग पर किया गया है
जिससे कि सरकार की दमन-नीति को सहायता मिले। इस रिपोर्ट में बहुत-सी
बातें बढ़ाकर लिखी गई हैं, किन्तु इनमें यह बढ़ावा बिलकुल तुच्छ विषयों को
दिया गया है और यह काम इस ढंग से किया गया है जिससे कि विप्लववादी लोग
देशवासियों की नज़र में हास्यास्पद जँचें। फिर ऐसी खास-खास बातें बड़ी सफाई
से दबा दी गई हैं कि जिनके प्रकट होने से देशवासियों के मन में आशा का संचार
हो सकता है। रौलट-रिपोर्ट पढ़ने से यह हरगिज़ नहीं मालूम हो सकता कि कितने
समय से, बड़ी सावधानी के साथ बहुत ही धीरे-धीरे कितने नर-रत्न किस प्रकार
इकट्ठे किये गये थे, फिर कितने दुःखों और कष्टों के बीच होकर, कितने भीतरी-
बाहरी कष्टों की कसौटी पर कसे जाकर कितनी नीरव वीरताओं की महिमा से
मण्डित हुए इन नर-रत्नों की माला गूंथी गई थी। मुझे तो इसी बात का दुःख
है कि उन सारी बातों को उपयुक्त रूप में प्रकट करने योग्य शक्ति मुझमें नहीं है,
तथापि जैसा मुझसे बनता है, करता हूँ।
बहुत-से लोग यह भी सोच सकते हैं कि इस प्रकार सारी बातें प्रकट कर
देना (मानो ये बातें अभी तक गुप्त हैं ¹) सरकारी पक्ष को दमन-नीति का
प्रयोग करने के लिए और अधिक मौका देना है। किन्तु इसके उत्तर में मुझे यही
कहना है कि विप्लव की जो आग एक दिन सिर्फ बंगाल के एक प्रान्त की सीमा
के ही भीतर थी उसी की अग्निशिखा सोलह-सत्तरह वर्ष की दमन-नीति का
ईंधन पाकर रावलपिण्डी और पेशावर तक फैल गई थी, अतएव जो लोग इस
दमननीति की जड़ उखाड़ना चाहते हों उनसे मेरा यही कहना है कि कृपया
विगत युग के विप्लव की तैयारी के प्रयत्न को मज़ाक में उड़ाकर नाचीज़ न
कहिए या उसके अस्तित्व को ही अस्वीकार मत कीजिए, प्रत्युत सरकार को
भलीभांति समझा दीजिए कि देश की सच्ची आकांक्षा को दबाने का उद्योग करने
से, अथवा वैध आन्दोलन का विकास होने के लिए मौका और समय न देने से,
इस प्रकार गुप्त-प्रलयाग्नि का उत्पन्न होना अनिवार्य है। वैध प्रकाश्य आन्दोलन
की अपेक्षा छिपकर विप्लव का उद्योग करना कम शक्तिशाली नहीं जान पड़ता
है। इंग्लैंड में प्रकाश्य आन्दोलन करने का सुभीता रहने के कारण – फिर वह
आन्दोलन कितना ही उग्र क्यों न हो—वहां गुप्त रूप में विप्लव का उद्योग उतने
ही परिमाण में नहीं किया जाता जितने परिमाण में कि फ्रांस अथवा यूरोप के

88 / बन्दी जीवन
अन्यान्य देशों में किया जाता है। मरणोन्मुख जाति ही दमनास्त्र से वश में कर
ली जाती है किन्तु विकासोन्मुख जाति के आत्मप्रकाश करने के उपायों को किसी
भी दमनास्त्र द्वारा व्यर्थ नहीं किया जा सकता। आज यह बात, क्या सरकार
और क्या भारत की जनता, सभी को अच्छी तरह जाननी चाहिए।
यतीन्द्र बाबू अब इस लोक में नहीं हैं, इसी से उनकी बात प्रकट करने में
मुझे झिझक नहीं हुई। शायद हमारे देशवासियों को ठीक-ठीक मालूम नहीं कि
इस समय हम लोग सारे उत्तरी भारत में एक दिल से और एक ही उद्देश्य के
लिए काम कर रहे थे; और शायद बंगाल के विप्लवकारी दलों को भी इसका
सोलहों आने पता न था।
यतीन्द्रबाबू का विशेष रूप से अनुरोध था कि इस विप्लव के लिए निर्धारित
दिन इतना पीछे हटा दिया जाए जिससे कि बंगाल में पहुँचने पर उन्हें कम
से कम दो महीने का समय मिले और इस बीच वे कुछ रुपये-पैसे भी जमा कर
सकें। उन्होंने बार-बार कहा कि बिना हाथ में काफ़ी धन किए इस काम में
कूदना ठीक नहीं। किन्तु उनकी इस 'काफ़ी' की धारणा की सीमा बड़ी लम्बी-
चौड़ी थी। उतने अपरिमित द्रव्य का थोड़े समय में संग्रह किया जाना भी
असाध्य काम था। इस बात को अन्त में यतीन्द्रबाबू ने स्वीकार कर लिया था किन्तु
इस ओर की दशा को वे ठीक-ठीक समझ न सकते थे। उस समय पंजाब के
सिपाही बहुत ही अधीर हो रहे थे। इसका एक कारण यह अनिश्चय की स्थिति
थी कि वे न जाने किस दिन पश्चिम के रणक्षेत्र में भेज दिये जाएँ। इसके सिवा
भारत के विभिन्न सैनिक-दलों को भी लगातार एक छोर के स्थान से दूसरे छोर
के स्थान में बदलकर भेज दिया जाता था। इसीलिए, अनुकूल दशा में न रहने
दिये जाने पर, यदि उन सैनिकों को सुदूर दक्षिण की किसी छावनी में भेज दिया
जाय तब तो उनकी सारी आशाओं पर पाला पड़ जायगा। ऐसे ही अनेक कारणों
से पंजाब के सिपाहियों को शान्त रखना तो कठिन हो ही गया था, साथ ही हमें
भी यह बड़ा खटका था कि विप्लव के लिए तैयार किये गए सैनिक कही अन्यत्र
न भेज दिये जाएँ। इन कारणों से हम लोग यतीन्द्रबाबू के अनुरोध को न मान
सके हम लोग भी कुछ-कुछ उतावले हो गये थे कि ऐसा बढ़िया मौका किसी
कारण हाथ से न निकल जाय। इसी से एक ओर तो हम सिपाहियों को शान्त
रखने का उद्योग कर रहे थे और दूसरी ओर ऐसी तैयारी में लगे हुए थे जिससे
कि देश-भर मे एक-जी होकर कुछ कर दिखाया जाय। साथ ही यह भी ध्यान
रक्खा गया था कि इस काम में वृथा विलम्ब न होने पाये। यतीन्द्र बाबू से भी ये
सारी बातें समझाकर कही गईं और लाचारी से उन लोगों को भी हमारे साथ
ही साथ समान भाव से क़दम बढ़ाना पड़ा।
यह हम बहुत दिनो से समझते थे कि अपढ़ जनता को उभाड़ देना कुछ
कठिन काम नही है, परन्तु इसके साथ-साथ हम यह भी जानते थे कि सिर्फ
जनता को भड़का देने से ही हमारी कार्य-सिद्धि की आशा विशेष रूप से नहीं है।