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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 408 में से

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पृष्ठ 80

78 / बन्दी जीवन
बुक किस तरह नष्ट हुई ।
हमने पिंगले को दो-एक दिन काशी में ठहराकर पंजाब भेज दिया। उनका
अनुरोध था कि पंजाब में हम उनके पास बेहिसाब बमगोले भेज दें, अतएव उनसे
कहा गया कि गोले तो भेजे जा सकते हैं किन्तु एक-एक बमगोले के बनवाने में
सोलह रुपये के लगभग खर्च बैठता है, इसलिए रुपये की मदद मिले बिना
बेहिसाब बमगोलों का भेजा जाना कठिन है। इनसे पृथ्वीसिंह और करतारसिंह की
भी चर्चा कर दी गई। अब रुपये लाने और पंजाबियों का कच्चा हाल जानने के
लिए पिंगले पंजाब को गए। पिंगले के पास इनके कुछ साथियों का पता-ठिकाना
था। लगभग एक हफ्ते में ही ये काशी लौट आए। अब रासबिहारी की पंजाब-
यात्रा में भी कुछ रोक-टोक न थी। किन्तु उनके जाने के पहले मैं एक बार फिर
पिंगले के साथ पंजाब हो आया।
दिसम्बर महीने के एक सबेरे खासी ठंड पड़ रही थी जब मैं साधारण हिन्दु-
स्तानी के लिबास में पिंगले के साथ अमृतसर पहुँचा। मैं तो पंजाबी भाषा बोल
न सकता था किन्तु पिंगले को इसका अभ्यास था। हम लोग एक गुरुद्वारे में
जाकर ठहरे। यहाँ पर पिंगले ने एक पंजाबी मुखिया से मेरा परिचय कराया।
इनका नाम मूलासिंह था।
मूलासिंह संघाई के पुलिस विभाग मे नौकर रह चुके थे और वहाँ पर भी
पुलिस के हड़तालियों के मुखिया बने थे। इस बार उन लोगों से भी मेरा परिचय
हुआ जो कि पिनांग में नौकर रह चुके थे। इस समय मैंने बहुत से देहाती सिक्खों
को यहाँ आते-जाते देखा था। ये अधिकतर किसान या मजदूर थे, किन्तु ये भी
देश का काम करने के लिए मतवाले हो रहे थे। सिक्ख सम्प्रदाय की ऐसी ही
शिक्षा-दीक्षा है। इनमें से बहुतेरों की देह खासी गठीली और कसी हुई थी।
इस बार मैने मूलासिंह को एक केन्द्र बनाने की आवश्यकता भली भांति
समझाई और इसके अनन्तर इन्ही ने केन्द्र का भार ग्रहण किया। किन्तु यदि ये
केन्द्रपति न बनते तो बहुत अच्छा होता।
पंजाब के विभिन्न स्थानो से आए हुए कार्यकर्ता लोग इस समय हाथ मे कुछ
काम न होने और खाने-पहनने का सुभीता न रहने के कारण कुनमुना रहे थे और
इनमे से बहुतों के दिल में एक तरह से असन्तोष की आग धधक रही थी। इसका
दायित्व प्रधानतया मूलासिंह पर ही था। ये सब लोग जी लगाकर देश का काम
करने के लिए दूर-दूर से घर-द्वार और अपना काम-काज छोड़कर आये हुए थे।
इनमे से कोई भी जीविका के लिए कुछ उद्योग नही करता था और उस समय
जैसी दशा थी उसके लिहाज़ से उद्योग करने का कुछ सुभीता भी न था। यदि दो
रोटियों के लिए शाम-सवेरे नेताओ से तकाजा करना पडे तो ऐसी स्थिति मे काम
करने मे सचमुच सभी का चिढ जाना सम्भव है। बेचारे ये सभी लोग गुरुद्वारे में
तो रहते और पास के होटल में खाते थे। अपने यहाँ देश का काम करने की इस
दशा मे अक्सर इस तरह की मामूली छोटी-छोटी बातो ने बहुतो के दिलो को