बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंजाब की कथा / 81
न-एक अपूर्व इतिहास की कथा संलग्न है और हरेक एक सिक्ख का ऐसे उत्सव
और उमंग के बीच लालन-पालन होता है तथा ऐसे ही वातावरण मे वह
मनुष्य बनता है। मेरी समझ से तो सिक्ख जाति भारत की एक अपूर्व वीर
जाति है।
पिंगले जिस समय 'मुक्तसर' के मेले से लौटकर आए उस समय करतारसिंह,
अमरसिंह आदि सभी गुरुद्वारे मे उपस्थित थे। मुझे देखकर करतारसिंह बहुत ही
प्रसन्न हुए और पूछा कि "बोलो, रासबिहारी कब आएँगे ?" मैंने कहा- "बस,
अब उन्ही का नम्बर है; यहाँ ठहरने के लिए कुछ इन्तजाम हो जाए और आपका
काम भी तनिक सिलसिले से होने लगे, बस फिर उनके आने मे देर नही।" इस
समय मैंने करतारसिंह को केन्द्र की आवश्यकता विशेष रूप से समझाई और यह
भी कहा कि केन्द्र का भार मूलासिंह ने ग्रहण कर लिया है। रासबिहारी के लिए
अमृतसर और लाहौर मे दो-दो किराए के मकान लेने को कह दिया। इन सारी
बातो के सम्बन्ध मे दादा ने मुझसे पहले ही कह रखा था, एक ही समय मे विभिन्न
स्थानों पर कई मकान अपने अधिकार मे होने चाहिए। अतः ऐसा ही किया गया।
अमृतसर का मकान तो मैंने ही देखकर पसन्द किया। लाहौर मे मकान लेने के
लिए दूसरा आदमी भेजा गया। पंजाब की उस समय की दशा का हाल करतार-
सिंह से सुनकर मुझे बहुत कुछ आशा हुई। मैंने सोचा कि इस बार सचमुच कुछ
कहने लायक काम हो रहा है। इस समय सिक्खो का एक और दल अमृतसर मे
आया। यह दल अमेरिका से लौटकर आया था इस दल के कुछ नेताओ को मैने
देखा। इनमे एक तो इतने बूढ़े थे कि उनके गालो मे झुर्रियाँ पडकर लटकने को
थी। मेरा ख्याल है कि ये वही वृद्ध पुरुष थे जिन्होने बाद मे अण्डमन टापू मे भी
बडे तेज के साथ के अपनी थोडी-सी शेष आयु बिताकर साठ या सत्तर वर्ष की
अवस्था मे उसी द्वीप मे जीवन को विसर्जित कर दिया। इस बुढापे मे भी इन्होने
अण्डमन मे हडतालियो के साथ हडताल करने मे कभी पीछे पैर नही रखा। इस
दल का कोई व्यक्ति उस समय अपने घर न पहुँचा था। अमेरिका से भारत मे
आकर अमृतसर मे ही ये लोग ठहरे थे। इन्होने अपनी गाढी कमाई मे से हम
लोगो को पाँच सौ रुपये दिए थे।
इन दिनो करतारसिंह अद्भुत परिश्रम कर रहे थे। वे प्रतिदिन साइकिल
पर बैठकर देहात मे लगभग चालीस-पचास मील का चक्कर लगाते थे। गाँव-
गाँव मे काम करने को जाते थे। इतना परिश्रम करने पर भी वे थकते न थे।
जितना ही वे परिश्रम करते थे उतनी ही मानो उनमे फुर्ती आती थी। देहात का
चक्कर लगाकर अब वे उन पल्टनो मे गए जिनमे कि काम नही किया गया था। इन
लोगो के काम करने का ढंग इतना कच्चा था कि इसमे इस समय इनमे से बहुतो
की गिरफ्तारी के लिए वारंट निकला। करतारसिंह को गिरफ्तार करने के लिए
इस समय पुलिस ने एक गाँव को जाकर घेर लिया। उस समय करतारसिंह गाँव
के पास ही कही मौजूद थे। पुलिस के आने की खबर पाते ही वे साइकिल पर