सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

76 / बन्दी जीवन
पिंगले ने कलकत्ता में बहुत लोगों से बमगोले मांगे थे। उस समय समूचे
बंगाल को प्रधानतया हमारे केन्द्र से ही बमगोले मिलते थे। अतएव बमगोलों
के लिए हम लोगों से पिंगले का घना सम्बन्ध हो गया।
काशी में इन्हीं दिनों हमारे मन में यह आशंका हो रही थी कि शायद अब
हमारा सम्बन्ध पंजाब से जुड़ना कठिन हो जाय; क्योंकि पाँचवीं दिसम्बर को
पृथ्वीसिंह काशी आनेवाले थे, किन्तु न तो उनके दर्शन हुए और न पंजाब का ही
समाचार मिला। ऐसे अवसर पर पिंगले के मिल जाने से ऐसी प्रसन्नता हुई मानो
कुबेर का धन हाथ लग गया हो। पिंगले के आ जाने से हम लोगों को सचमुच
बड़ा आसरा मिल गया। इनकी देह समुन्नत और बलिष्ठ थी, खूब गोरा रंग था
और इनकी आँखों तथा चेहरे से सुतीक्ष्ण बुद्धि झलकती थी। इस बुद्धिमत्ता ने
उस दिन हमारे मन में खास जगह कर ली थी। इन्हें देखने और इनसे बातचीत
करने से हम लोगों को पक्का विश्वास हो गया था कि इनके हाथों हमारे कई काम
सिद्ध होंगे, किन्तु सच तो यह है कि मनुष्य को पहचान लेना बड़ा कठिन काम
है।
मनुष्य जीवन का आदर्श कैसा हो—इस सम्बन्ध में पिंगले के साथ बहुतेरी
बातें होते-होते न जाने किस तरह गीता की चर्चा छिड़ गई और उस समय जब
उन्होंने गीता के कुछ श्लोक पढ़कर सुनाए तब हम लोगों को ज्ञात हुआ कि गीता
इन्हें कण्ठस्थ है। उन्होंने स्वयं कहा कि 'जब हम साधु हो गए थे तब अठारहों
अध्याय गीता मुखाग्र थी।' इस पर उनके जीवन का थोड़ा-बहुत पिछला इतिहास
जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होंने कोट इत्यादि उतारते-उतारते विस्तार-
पूर्वक बतलाया कि वह किस प्रकार साधु होकर भारत के विभिन्न स्थानों में
विचरते रहे, फिर किस तरह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अमेरिका
गए और वहाँ इस विप्लवदल में भर्ती हो गए।