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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 408 में से

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पृष्ठ 73

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फ़ौज की बारकों में
काशी में वापस आने पर दादा से ज्ञात हुआ कि काम मजे में होता जा रहा
है। उन्होंने कहा, "आज ही दोपहर के बाद अमुक बाग़ में एक सिपाही आने-
वाला है, तुम आज वहाँ जाना ।" यह भी सुना कि वह पलटन काशी से बदल
गई है और उसकी जगह पर नई पलटन आई है। मैं दोपहर के बाद उसी बाग़ में
पहुंचा। उस बाग़ मे मुझे एक मित्र ले गए थे। मैंने रास्ते में उनसे पूछा कि दल
का परिचय इन लोगों के साथ किस प्रकार हुआ ? मित्र ने बतलाया कि "ये लोग
बाजार में सौदा लेने आते थे; एक दिन छावनी की ओर जाते समय, रास्ते में
आते इन्हें देखा । तब हम लोग भी इनसे बातचीत करते हुए शहर की तरफ़ लौट
पड़े । रास्ते में वर्तमान युद्ध-सम्बन्धी बहुत-सी बातें भी हुईं। हिन्दू-मुसलमानों से
सम्बद्ध बहुतेरी बाते भी हुईं । हिन्दुओं का वर्तमान दुर्दशा और अधःपतन की
चर्चा करते-करते हम लोग बस्ती मे आ पहुँचे । इस प्रकार पहले दिन जान-
पहचान हो चुकने पर उनका नाम-धाम पूछ लिया गया और कहा गया कि आपसे
जरूरी काम है इसलिए किसी दिन तकलीफ़ कीजिएगा । बस, उस दिन इतनी
ही बातचीत हुई। दूसरे दिन वे लोग फिर गंगा नहाने के लिए बस्ती में आए ।
उस दिन हम लोगो ने उनको अपनी भीतरी बातें कह सुनाईं। बहुत कुछ बातचीत
हो चुकने पर उन्हें समझाया गया कि वर्तमान युद्ध में, विदेश मे जाकर विधर्मियों
के भले के लिए प्राण देने की अपेक्षा स्वदेश मे स्वधर्म के लिए प्राण देना हजार दर्जे
अच्छा है। इसका उन पर बहुत अच्छा असर पड़ा। आसानी से काम बन गया ।
पलटन में जाकर अपने बेडेवालो से इस विषय की बातचीत करके वे आज मिलने
को आने वाले है ।" थोड़ी ही देर बाट जोही थी कि देखा, एक मनुष्य हाथ मे
सौदा लिये चला आ रहा है। मित्र ने कहा, "यही तो हैं।" ये सिर से पैर तक
सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे, मानो भीतर की विशुद्धता बाहर भी प्रकट हो रही थी ।
इनसे बातचीत करके मैं बहुत ही आनन्दित हुआ । हिन्दुओं की स्वभाव-सिद्ध
नम्रता मानो इनकी देह में भिदी हुई थी । इनमे एक उत्फुल्लता और उत्साह का
भाव मैंने देखा, किन्तु उत्तेजना इन्हें छू तक नही.गई थी । उस दिन इनके साथ
सीधे बारक में जाकर और इनकी चारपाई पर बैठकर बहुत बातचीत हुई । हम
लोग इनकी चारपाई पर बैठकर बाते करने लगे और ये हमारी खातिर के लिए