बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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अन्यान्य देशों में किया जाता है। मरणोन्मुख जाति ही दमनास्त्र से वश में कर
ली जाती है किन्तु विकासोन्मुख जाति के आत्मप्रकाश करने के उपायों को किसी
भी दमनास्त्र द्वारा व्यर्थ नहीं किया जा सकता। आज यह बात, क्या सरकार
और क्या भारत की जनता, सभी को अच्छी तरह जाननी चाहिए।
यतीन्द्र बाबू अब इस लोक में नहीं हैं, इसी से उनकी बात प्रकट करने में
मुझे झिझक नहीं हुई। शायद हमारे देशवासियों को ठीक-ठीक मालूम नहीं कि
इस समय हम लोग सारे उत्तरी भारत में एक दिल से और एक ही उद्देश्य के
लिए काम कर रहे थे; और शायद बंगाल के विप्लवकारी दलों को भी इसका
सोलहों आने पता न था।
यतीन्द्रबाबू का विशेष रूप से अनुरोध था कि इस विप्लव के लिए निर्धारित
दिन इतना पीछे हटा दिया जाए जिससे कि बंगाल में पहुँचने पर उन्हें कम
से कम दो महीने का समय मिले और इस बीच वे कुछ रुपये-पैसे भी जमा कर
सकें। उन्होंने बार-बार कहा कि बिना हाथ में काफ़ी धन किए इस काम में
कूदना ठीक नहीं। किन्तु उनकी इस 'काफ़ी' की धारणा की सीमा बड़ी लम्बी-
चौड़ी थी। उतने अपरिमित द्रव्य का थोड़े समय में संग्रह किया जाना भी
असाध्य काम था। इस बात को अन्त में यतीन्द्रबाबू ने स्वीकार कर लिया था किन्तु
इस ओर की दशा को वे ठीक-ठीक समझ न सकते थे। उस समय पंजाब के
सिपाही बहुत ही अधीर हो रहे थे। इसका एक कारण यह अनिश्चय की स्थिति
थी कि वे न जाने किस दिन पश्चिम के रणक्षेत्र में भेज दिये जाएँ। इसके सिवा
भारत के विभिन्न सैनिक-दलों को भी लगातार एक छोर के स्थान से दूसरे छोर
के स्थान में बदलकर भेज दिया जाता था। इसीलिए, अनुकूल दशा में न रहने
दिये जाने पर, यदि उन सैनिकों को सुदूर दक्षिण की किसी छावनी में भेज दिया
जाय तब तो उनकी सारी आशाओं पर पाला पड़ जायगा। ऐसे ही अनेक कारणों
से पंजाब के सिपाहियों को शान्त रखना तो कठिन हो ही गया था, साथ ही हमें
भी यह बड़ा खटका था कि विप्लव के लिए तैयार किये गए सैनिक कही अन्यत्र
न भेज दिये जाएँ। इन कारणों से हम लोग यतीन्द्रबाबू के अनुरोध को न मान
सके हम लोग भी कुछ-कुछ उतावले हो गये थे कि ऐसा बढ़िया मौका किसी
कारण हाथ से न निकल जाय। इसी से एक ओर तो हम सिपाहियों को शान्त
रखने का उद्योग कर रहे थे और दूसरी ओर ऐसी तैयारी में लगे हुए थे जिससे
कि देश-भर मे एक-जी होकर कुछ कर दिखाया जाय। साथ ही यह भी ध्यान
रक्खा गया था कि इस काम में वृथा विलम्ब न होने पाये। यतीन्द्र बाबू से भी ये
सारी बातें समझाकर कही गईं और लाचारी से उन लोगों को भी हमारे साथ
ही साथ समान भाव से क़दम बढ़ाना पड़ा।
यह हम बहुत दिनो से समझते थे कि अपढ़ जनता को उभाड़ देना कुछ
कठिन काम नही है, परन्तु इसके साथ-साथ हम यह भी जानते थे कि सिर्फ
जनता को भड़का देने से ही हमारी कार्य-सिद्धि की आशा विशेष रूप से नहीं है।