बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंजाब की कथा / 83
साधारण पंजाबियो के यौन आचरण के सम्बन्ध मे प्रतिष्ठित भारतीय आदर्श
की दृष्टि से सामान्य जन-धारणा अच्छी नही होती और फिर पजाबियो मे सिक्खों
के यौन-व्यवहार को तो और भी चिन्त्य समझा जाता है । शायद इसका प्रधान
कारण पंजाब में पुरुषो की अपेक्षा स्त्रियों की सख्या बहुत ही कम होना है।
इसके सिवा पजाब प्रान्त शायद तमोमुखी राजसिक भाव से परिपूर्ण है। लगातार
मुद्दत से विदेशियो के संघर्ष मे रहने के कारण और क्रमशः निम्नतर सभ्यता के
ही संस्पर्श मे आते रहने से यहाँ की सभ्यता मानो धीरे-धीरे फीकी पड गई है।
अवनति के दिनों मे विदेशियो का यह संस्पर्श जैसे हानिकारक हुआ है वैसे ही
उन्नति के जमाने मे इससे सर्वश्रेष्ठ सभ्यता का विकास भी हो सकता है। जो
लोग बुरे मार्ग पर बहुत आसानी मे चले जाते है उनमे भले बनने का भी बहुत-
कुछ मामर्थ्य है, इतना कि शायद और लोगो मे उतना न हो । इस कारण असयम,
निष्ठुरता, नीचता और हिंसा-वृत्ति से सिक्खो का चरित्र जिस प्रकार कलंकित
हुआ है उसी प्रकार सयम उदारता और क्षमावृत्ति मे भी वे लोग अपना सानी नही
रखते । तभी तो इन गए-बीते दिनो मे भी अध पतित सिक्ख जाति ने, 'ननकाना
माहब' और 'गुरु का बाग' मे अद्भुत वीरता और सयम का नमूना दिखला दिया ।
पजाब मे पुरुषो की अपेक्षा स्त्रियां ही अधिक बदनाम हैं किन्तु इसी पंजाब
मे उस दिन सतीत्व की ऐमी गौरवोज्ज्वल स्निग्ध किरण प्रकट हुई थी जिसकी
तुलना इम कलिकाल मे मिलनी कठिन है । डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूत-
पूर्व अध्यापक भाई परमानन्द के छोटे चाचा के बेटे, भाई बालमुकुन्द, दिल्ली
षड्यन्त्र के मुकदमे मे गिरफ्तार किए। इन्ही बालमुकुन्द के पूर्वपुरुष मोतीदास को
सिक्खो के अभ्युत्थान-समय मे आरे से चीरकर मार डाला गया था। गिरफ्तार
होने मे एक ही वर्ष पहले भाई बालगुकुन्द का विवाह हुआ था। इनकी पत्नी
श्रीमती रामराखी परम सुन्दरी ललना थी। उम्र इनकी नई थी ही। जिम दिन
इनके पति गिरफ्तार हुए उसी दिन से ये व्याकुल हो गईं और अनेक प्रकार से
देह को सुखाने लगी । फिर जब भाई बालमुकुन्द को फाँसी का हुक्म हो गया तब
ये उनसे मिलने गई । किन्तु इनके मर्माश्रुओ ने, जी भरकर स्वामी के दर्शन न
करने दिए। घर लौटकर ये एक प्रकार से अधमरी दशा मे समय बिताने लगी ।
एक दिन ये अपने कमरे मे थी कि बाहर से रोने का कोलाहल सुन पडा । कमरे
से बाहर आने पर श्रीमती रामराखी को असल बात मालूम हो गई । ये अब
और न सहन कर सकी । पति का मृत्यु-समाचार पाकर मती-साध्वी, खासी
नीरोग दशा मे, पति का ध्यान लगाकर मानो पति से जा मिली । मिट्टी मे मिल
जाने के लिए ही मानो उनकी देह लोक मे पडी रह गई। ऐसे पति-प्रेम और
आत्मोत्सर्ग की तुलना है कही ? इम घटना का स्मरण होते ही देह और मन
पुलकित होकर कण्टकित हो जाता है ! बालमुकुन्द की गृहिणी ! तुम धन्य हो ।
ऐसी पत्नी के बिना क्या ऐसा पति हो सकता है । हाय रे भारत के नसीब, ऐमी
पत्नी और ऐसे पति का बना रहना भी तेरे भाग्य मे न था !