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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 408 में से

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पृष्ठ 82

80 / बन्दी जीवन
स्थानों में बचाव के लिए दौड़-धूप करने लगे। किन्तु उन चालीस सिक्खों ने
किसी भी दशा में गुरु का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रकार घूमते-फिरते हुए गुरु
गोविन्दसिंह जब भद्र देश में पहुँचे तब उन 'बे-दावा' सिक्खों में से बहुतों ने
आकर गुरु से भेंट की। अब इन्होंने शत्रु से सन्धि करने के लिए गुरुजी से दोबारा
अनुरोध किया। इस पर गोविन्दसिंह ने कहा—"जो तुम चाहो तो यह लिखकर
चले जा सकते हो कि हम सिक्ख नहीं हैं।" तब 'हम सिक्ख नहीं हैं' यह बात
लिखकर और वह पत्र गुरुजी को देकर चालीस सिक्ख चले गए। किन्तु इस संकट
के समय श्रीगुरु को छोड़कर चले जाने के कुछ ही देर बाद उन लोगों के मन में
बड़ा पछतावा हुआ। इधर 'खेदराना' नामक तालाब के समीप शत्रु-दल ने फिर
गुरु गोविन्दसिंह पर हमला किया। घोर संग्राम करते-करते गुरु ने देखा कि किसी
ओर से एक दल ने आकर शत्रु-पक्ष पर धावा बोल दिया है। गुरु गोविन्दसिंह
की समझ में न आया कि इस विपत्ति के समय में हमारी सहायता करने यह कौन
आ पहुँचा है। इन नए आये हुए योद्धाओं की मार के आगे मुसलमान तो ढीले
पड़ गए परन्तु ये सब थोड़ी देर युद्ध करके प्रायः सभी जूझ गए। इस युद्ध में एक
मुसलमान के बल्लम से निहत एक व्यक्ति की लाश उठाकर देखी गई तो वह
लाश एक स्त्री की निकली इसका नाम माई भागो था। इसी की सलाह और
प्रेरणा से 'बे-दावा' सिक्खों ने अपनी भूल को सुधारने का मार्ग ढूँढ़ निकाला था।
युद्ध का अन्त हो चुकने पर गुरु गोविन्दसिंह रणभूमि में लेटे हुए प्रत्येक मृत सिक्ख
के पास जाकर उसके धूल में लिपटे हुए मुंह को पोंछकर वैसे प्यार और आदर
का व्यवहार कर रहे थे जैसाकि पिता अपने पुत्र का करता है। अन्त में उन्होंने
देखा कि एक व्यक्ति में उस समय तक प्राण थे। इसका नाम महासिंह था। महा-
सिंह के मस्तक को अपनी गोद मे रखकर और उसके सिर पर हाथ फेरते-फेरते
गुरु गोविन्दसिंह ने पूछा—'महासिंह, तुम क्या चाहते हो ?' महासिंह की आंखो
में आँसू भर आए। उसने कहा—"मैं यही चाहता हूँ कि हम लोगो के उस पत्र
को फाड़ डालिए जिसमे हम लोगों ने लिख दिया था कि हम लोग सिक्ख नहीं
हैं।" अब गुरुजी ने समझा कि दूसरी ओर से शत्रु पर किसने हमला किया था।
गुरुजी ने देखा उन चालीसों सिक्खों ने रणक्षेत्र मे प्राण दे दिए हैं। लाशो मे
उन्होंने स्त्रियों की भी लाशें देखीं। अब 'सिक्ख नहीं' वाला पत्र गुरुजी ने फाड़-
कर फेंक दिया। महासिंह भी महानिद्रा मे मग्न हो गया। वहाँ पर जो लोग
उपस्थित थे उनसे गुरु गोविन्दसिंह ने कहा कि 'जिस खालसा' में ऐसे महाप्राण हैं
वह खालसा सहज ही नष्ट नही होगा। जहाँ पर एक भी भक्तप्राण आत्माहुति
देता है वह स्थान पवित्र हो जाता है यहाँ पर तो इतने अधिक महाप्राण व्यक्तियों
ने प्राण दे डाले हैं, इसलिए इस स्थान का नाम 'मुक्तसर' हुआ और यहाँ के
तालाब मे जो कोई स्नान करेगा, वह मुक्त हो जाएगा। इस प्रकार मुक्तसर-मेले
की उत्पत्ति हुई। यह सिक्खों का महामेला है। यहाँ पर हर साल एक लाख से
अधिक सिक्खों का जमाव होता है। सिक्खों के प्रत्येक उत्सव के साथ ऐसे एक-