बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी सच्चाई सिद्ध हुई है। यतीन्द्र बाबू ऐसे ही सम्प्रदाय के प्राण-स्वरूप थे और
कई विभिन्न सम्प्रदायों पर उन्होंने अपने चरित्र-बल से अपना सुदृढ़ आधिपत्य
जमा लिया था।
विप्लव का काम-काज बहुत ही गुप्त रीति से करना पड़ता था। भारत के
विभिन्न स्थानों में विप्लव के लिए भिन्न-भिन्न कितने ही दल बन गये थे। उन
सब का शायद अब तक भली भाँति पता भी नही लगा। शक्तिशाली महापुरुषों
की सर्वग्राही प्रतिभा का आश्रय न मिलने से ये दल एक विशाल सगठन में
संगठित न हो सके। वे अलग-अलग ही रहे। इन छोटे-छोटे स्वतन्त्र दलों का
होना भला हुआ या बुरा, यह कहना कठिन है।
इन विभिन्न दलो को सम्मिलित करके एक विराट् दल के रूप मे परिणत
करने का उद्योग बहुत दिनो मे किया जा रहा था किन्तु कोई शक्तिशाली नेता न
रहने से किसी भी दल ने दूसरे दल में मिलकर अपनी स्वतन्त्रता खो देना स्वीकार
नही किया। इन दलों के मुखिया लोग ही अक्सर इस कारण कि वे अपने-अपने
दलों पर अपना साधारण आधिपत्य बनाए रखना चाहते थे ऐसे मिलन के
विरोधी थे। 'मनुष्य सहज ही पराई अधीनता स्वीकार करने को तैयार नही हो
जाता, परन्तु फिर भी सचमुच शक्तिशाली पुरुष के आगे उसे माथा झुकाना ही
पडता है।' जिस समय किसी अभिनव आदर्श अथवा अद्भुत कार्य की प्रेरणा मे
मनुष्य जाग पड़ता है उस समय व्यक्तिगत अहंकार की ये सारी तुच्छताएँ और
स्वार्थपरताएँ सिर नही उठा सकती।
यतीन्द्र बाबू का नेतृत्व इस ढंग का था कि इसके प्रभाव से बंगाल के बहुत-से
छोटे-छोटे दल एक मे मिल गये थे। यद्यपि यतीन्द्र बाबू कोई धुरन्धर विद्वान् नही
थे किन्तु इनके चरित्र के प्रभाव से बहुतेरे शिक्षित युवको ने इन्हें आत्मसमर्पण कर
दिया था। इनमे जैसा अतुल साहस था वैसे ही इनके प्राण भी उदार थे। इनके
चरित्र-बल की बाते बंगाल के विप्लवपन्थी लोगो को भलीभाँति मालूम है।
किन्तु इनके द्वारा इन भिन्न-भिन्न दलो का एक सूत्र में आबद्ध होना उसी दिन
सम्भव हुआ जिस दिन कि पजाब मे गदर होने की तैयारी के समाचार से एक
नये काम की प्रेरणा ने उन सबको उतावला कर दिया था। फिर भी, इस मिलन-
कार्य मे यतीन्द्र बाबू का चरित्र बहुत ही सुन्दर रूप में प्रकट हुआ है। क्योकि
दल के भिन्न-भिन्न सम्प्रदायो में कुछ इने-गिने ही आदमी न थे, और इन
सबका स्वभाव और चरित्र भी मामूली आदमियो के स्वभाव और चरित्र जैसा
नही था, अतः उन सबके मन पर आधिपत्य कर लेना कुछ मामूली शक्ति का काम
नही है।
सच तो यह है कि बंगाल मे इस समय विप्लव का उद्योग करने वाले दो ही
दल थे। इनमें से एक के मुखिया यतीन्द्र बाबू थे। दूसरे दल के दो भाग किये जा
सकते हैं, एक बंगाल के बाहर काम करता था और दूसरे ने बंगाल के भीतर ही
अपना कार्यक्षेत्र बना रक्खा था। बंगाल के बाहर की कुल जिम्मेदारी रासबिहारी