बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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दिल्लासिंह पर पूरा भरोसा किया जाय ? कुछ खटका तो नही ?” तब उक्त
सैनिक ने उसकी ओर से बेफ़िक्र रहने को कहकर उसे भला आदमी बतलाया । मैंने
उस दिन भी यह बात किसी से नही छिपाई थी कि दिल्लासिंह मुझे भला आदमी
नही जंचता । उस दिन दिल्लासिंह जब तक वहां लौट नही आया तब तक हर
घड़ी-पल पर मैं अपने मित्र से कहता था कि “क्योंजी, अब तक आया नही, कहाँ
गया ?” और एक-दूसरे की ओर देख-देखकर हम दोनों परस्पर मुस्कराते थे ।
जो हो, हमारा सन्देह जाता रहा, उस दिन तो दिल्लासिंह दुबारा लौट आया ।
उस दिन मामूली बातचीत करते-करते शाम हो गई, फिर हमसे एकान्त में बातें
करने के लिए दिल्लासिंह उस पूर्व-परिचित सिपाही को लेकर हमारे साथ-साथ
बारक के बाहर चला आया । दिल्लासिंह ने हमारे प्रस्ताव को मान लिया और
कहा कि हम बारक के कुछ अन्य सिपाहियो से भी बातचीत कर रखेंगे । दिल्ला-
सिंह के लौट जाने पर भी पूर्व-परिचित सैनिक महोदय और भी थोड़ी देर तक
हमारे पास बने रहे । अब दिल्लासिंह के ऊपर हमारे शक करने पर इन्होने
हमसे फिर उसकी ओर से बेखटके रहने को कहा । तब यह सोचकर मन में
आनन्द हुआ कि चलो, एक हवलदार तो दल मे आ गया । इस रीति से इस फ़ौजी
बारक में हमारा आवागमन आरम्भ हुआ और एकाध महीने के भीतर हम यहाँ
कम से कम दस-बारह बार आए-गए । इन सिपाहियो में से कुछ लोग शहर मे
हमारे डेरे पर भी आए थे और तब, हम लोगों ने भी इन्हें हर मर्तबा रसगुल्ला
आदि कई प्रकार की बंगाली मिठाई खिलाकर खुश किया था ।
मालूम होता है कि समूचे भारत मे ऐसा एक भी शहर न था जहाँ स्वदेशी
आन्दोलन और बम के गोले के दल का बात किसी को मालूम न हो । हम
लोगों ने इन सिपाहियों को अपने घर बुलाकर बम के गोले, रिवाल्वर और
मोज़र पिस्टल आदि के दर्शन कराकर विश्वास करा दिया कि वास्तव मे हम
लोग भी उल्लिखित दल के सदस्य हैं । इस प्रकार कुछ दिनों तक आवाजाही
होने पर इनको बतलाया गया कि पंजाब की फ़ौज मे भी विप्लव की तैयारी
जोरों से हो रही है । हम लोग बखूबी जानते थे कि इन लोगों को भेद की सारी
बाते सुना देने से क्या अनर्थ हो सकता है, क्योकि इन लोगों के ज़रिए यदि
सरकारी पक्ष को हमारी गदर की तैयारी का तनिक भी पता मिल जाता तो
पंजाब का सब किया-कराया मिट्टी मे मिल जाता । किन्तु इनसे दुराव रखने मे
भी तो सुभीता न था, जब इनसे कहा गया कि “यदि हमारी बातो पर विश्वास
न हो तो तुम अपने किसी आदमी को कुछ दिनों के लिए पंजाब भेज दो, हम उन
रेजिमेंटों से इसकी जान-पहचान करा देगे जिन्होंने कि प्रस्ताव को मान लिया
है ।” तब हमारी बात पर इन्हें बहुत कुछ विश्वास हो गया । इस प्रकार धीरे-धीरे
तीन-चार हवलदारों और सिपाहियो से हमारा परिचय हुआ ।
हम लोग ज्यादातर शाम को या अंधेरा हो जाने पर बारको में जाते थे किन्तु
दो-एक बार दिन को दोपहर के वक़्त भी जाना पड़ा है । इसी प्रकार एक दिन