बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुखाया है और इसके फलस्वरूप कई अवसरो पर बहुत-कुछ अनर्थ भी हुए हैं।
इससे कई बार यह विचार आता है कि जब तक गांठ में काफ़ी रकम न हो तब
तक दूसरों की दी हुई रोटियों के भरोसे देश का और दस भाइयो का कार्य करने
को तैयार होना ठीक नही। फिर यह भी देखा है कि आर्थिक स्वाधीनता प्राप्त
करने की चेष्टा में प्रायः अर्थोपार्जन करना ही मुख्य काम हो जाता है और तन-
मन से देश का काम न किया जाय तो प्रायः कुछ भी नही होता। इसके सिवा
काम न रहने से भी बहुत मे दल नष्ट हो चुके हैं। इस समय पंजाब में उपयुक्त
नेता न रहने के कारण वहाँ बहुतेरे कार्यकर्ता हाथ पर हाथ रखे बेकार पडे थे, काम
न किया जाने के कारण देश चौपट हो रहा था और मज़ा यह कि काम करनेवालों
को खोजने पर भी काम न मिलता था। रासबिहारी ही एक ऐसे 'नेता' थे जिन्होंने
इस उतावले जनसघ को कुछ परिमाण मे सुनियन्त्रित कर लिया था। मैंने भी इस
गोलमाल को सुधारने की भरसक कोशिश की थी। मूलासिंह से मुझे मालूम हुआ।
कि विद्रोह होने पर बहुत-सी रेजिमेटो ने देशवासियो के अनुकूल हो जाने का
वचन दिया है। जिन पलटनो मे इस समय तक अपने आदमी नही भेजे गए थे
उनकी मैंने एक फेहरिस्त बनाई और विभिन्न प्रदेशो से आए हुए पंजाबी कार्य-
कर्ताओ को उल्लिखित पलटनो मे भेजने की व्यवस्था की।
मूलासिंह से मेरा परिचय कराके पिंगले अन्यान्य परिचित सिक्खो की तलाश
मे 'मुक्तसर' के मेले को गए। इस मुक्तसर के मेले का थोडा-सा अद्भुत इतिहास
पाठको को सुनाए बिना मुझमे नही रहा जाता।
एक बार 'आनन्दपुर' के किले मे गुरु गोविन्दसिंह अपने परिवार और
अन्यान्य लोगो के साथ शत्रु मुमलमान सेना द्वारा घेर लिये गए। यह घेरा लगातार
सात महीने तक रहा। घेरे के कारण दोनो दल—जो किले मे घिरे हुए थे, और
जो लोग बाहर से घेरा डाले हुए थे—बहुत ऊब गए। मुसलमानो की ओर मे
बार-बार गुरु से 'आनन्दपुर' छोडकर चले जाने का प्रस्ताव किया गया किन्तु गुरु
ने इसे नही माना। गुरु को उम प्रस्ताव पर किसी भी तरह राजी न होते
देख, बाहर जाने की इच्छा से कुछ सिक्खो ने गुरुजी की स्त्री गुजरी को
यहाँ मे हट जाने के प्रस्ताव पर राजी कर लिया, किन्तु गुरु गोविन्दसिंह इतने
पर भी अपने निश्चय से विचलित न हुए। भूख के कारण बहुतेरे सिक्ख अधीर
हो रहे थे। पेट की ज्वाला के कारण उम समय वे गुरु की आज्ञा टालने पर
उतारू हो गए। तब गुरु गोविन्दसिंह ने कहा—"तुम लोग अब तक सिक्ख गुरु
के आश्रय मे थे, किन्तु अब भूख के मारे बेचैन हो, गुरु का वाक्य उल्लंघन करके
शत्रुओ के हाथ मे आत्म-समर्पण करने जा रहे हो। इसमे सिक्ख गुरु की कोई
जवाबदारी नही है। अतएव इसके लिए 'बे-दावा' लिखकर चाहे जहाँ चले
जाओ।" और सब सिक्ख तो इस प्रकार 'बे-दावा' लिखकर गुरु को वही छोडकर
चलते हुए किन्तु चालीस सिक्खो ने गुरु का साथ नही छोडा। अन्त मे गुरु गोविन्द-
सिंह को भी यह स्थान छोड़ना पडा और शत्रु के पीछा करने पर वे अनेक