बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ।
अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित-नए'—'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली । जब एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती थी
तब फिर जल्द समाप्त न होती थी । मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रणोदित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों
में कितनी ही नई रीतियों से विकसित होने की चेष्टा करता है । इसलिए एक
भाव के उपासक होकर भी, उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी, हम लोगों के
बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। गानेवाला तो एक ही है, किन्तु
वही एक स्वरलहरी पांच श्रोताओं के लिए कितने प्रकार की मूर्च्छना उत्पन्न
नहीं कर देता ! मेल तो काफ़ी रहता है, किन्तु बेमेल भी क्या कुछ कम रहता
है ? जिस आदर्श से प्रणोदित होकर हम लोग अपने व्यक्तिगत और समष्टिगत
जीवन को नियन्त्रित कर रहे थे उस भाव-स्रोत की तरंग यद्यपि एक ही स्थान से
आती थी तथापि उसने विभिन्न आधारों में अपनी विचित्रता की महिमा को
स्थिर रखा था । हमारे आदर्श सम्बन्धी छोटी-मोटी बातों के झगड़ों में कितनी
ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं; एक व्यक्ति दूसरे को कुछ-
कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता तब उषा की लालिमा, अधखिले
फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में देख पड़ती थी । रास्ता चलते-चलते जब नींद से
अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगतीं तभी मालूम होता था कि इतनी
थकावट हुई है । रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट जाना पड़ता था और
सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलोचना का प्रसंग दुबारा
बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता था; और कभी-
कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब योग की वह भावना आकर
हम पर प्रभाव जमा लेती थी । इस प्रकार भाव और कर्म के मोहक आवेश में
हमारा विचित्र जीवन व्यतीत और गठित होता जाता था ।