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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 408 में से

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पृष्ठ 89

काशी केन्द्र की कहानी / 87
भला ही होगा, बुराई तनिक-सी भी न होगी। देश में विप्लव की जैसी प्रचण्ड
तैयारी हुई थी उसे छिपाने की अब कुछ भी आवश्यकता नहीं है। मैं तो चाहता
हूँ कि देशवासियों को उसका रत्ती-रत्ती-भर हाल मालूम हो जाय। मेरी पुस्तक
पूर्ण होने पर देशवासियों को मालूम होगा कि गदर की तैयारी कुछ इने-गिने लड़कों
और नवयुवकों के मन की लहर ही न थी, और न इसकी तैयारी ही कुछ ऐसे
अव्यवस्थित रूप में हुई थी जैसाकि रौलट रिपोर्ट में प्रकट किया गया है। रौलट
रिपोर्ट तो लिखी ही इस दृष्टि से गई है कि भारतवासियों को आत्मशक्ति पर
विश्वास न होने पावे, अतः उसमें घटनाओं का वर्णन इस ढंग पर किया गया है
जिससे कि सरकार की दमन-नीति को सहायता मिले। इस रिपोर्ट में बहुत-सी
बातें बढ़ाकर लिखी गई हैं, किन्तु इनमें यह बढ़ावा बिलकुल तुच्छ विषयों को
दिया गया है और यह काम इस ढंग से किया गया है जिससे कि विप्लववादी लोग
देशवासियों की नज़र में हास्यास्पद जँचें। फिर ऐसी खास-खास बातें बड़ी सफाई
से दबा दी गई हैं कि जिनके प्रकट होने से देशवासियों के मन में आशा का संचार
हो सकता है। रौलट-रिपोर्ट पढ़ने से यह हरगिज़ नहीं मालूम हो सकता कि कितने
समय से, बड़ी सावधानी के साथ बहुत ही धीरे-धीरे कितने नर-रत्न किस प्रकार
इकट्ठे किये गये थे, फिर कितने दुःखों और कष्टों के बीच होकर, कितने भीतरी-
बाहरी कष्टों की कसौटी पर कसे जाकर कितनी नीरव वीरताओं की महिमा से
मण्डित हुए इन नर-रत्नों की माला गूंथी गई थी। मुझे तो इसी बात का दुःख
है कि उन सारी बातों को उपयुक्त रूप में प्रकट करने योग्य शक्ति मुझमें नहीं है,
तथापि जैसा मुझसे बनता है, करता हूँ।
बहुत-से लोग यह भी सोच सकते हैं कि इस प्रकार सारी बातें प्रकट कर
देना (मानो ये बातें अभी तक गुप्त हैं ¹) सरकारी पक्ष को दमन-नीति का
प्रयोग करने के लिए और अधिक मौका देना है। किन्तु इसके उत्तर में मुझे यही
कहना है कि विप्लव की जो आग एक दिन सिर्फ बंगाल के एक प्रान्त की सीमा
के ही भीतर थी उसी की अग्निशिखा सोलह-सत्तरह वर्ष की दमन-नीति का
ईंधन पाकर रावलपिण्डी और पेशावर तक फैल गई थी, अतएव जो लोग इस
दमननीति की जड़ उखाड़ना चाहते हों उनसे मेरा यही कहना है कि कृपया
विगत युग के विप्लव की तैयारी के प्रयत्न को मज़ाक में उड़ाकर नाचीज़ न
कहिए या उसके अस्तित्व को ही अस्वीकार मत कीजिए, प्रत्युत सरकार को
भलीभांति समझा दीजिए कि देश की सच्ची आकांक्षा को दबाने का उद्योग करने
से, अथवा वैध आन्दोलन का विकास होने के लिए मौका और समय न देने से,
इस प्रकार गुप्त-प्रलयाग्नि का उत्पन्न होना अनिवार्य है। वैध प्रकाश्य आन्दोलन
की अपेक्षा छिपकर विप्लव का उद्योग करना कम शक्तिशाली नहीं जान पड़ता
है। इंग्लैंड में प्रकाश्य आन्दोलन करने का सुभीता रहने के कारण – फिर वह
आन्दोलन कितना ही उग्र क्यों न हो—वहां गुप्त रूप में विप्लव का उद्योग उतने
ही परिमाण में नहीं किया जाता जितने परिमाण में कि फ्रांस अथवा यूरोप के