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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 408 में से

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पृष्ठ 74

72 / बन्दी जीवन
समीप के बाज़ार से मिठाई मँगाने का इन्तज़ाम करने लगे ।
उस दिन अपने जीवन में पहले-पहल अंग्रेजों की फ़ौजी बारक में मैंने क़दम
रखा था। इससे पहले इन फ़ौजी बारकों के कितने ही अस्फुट रहस्य मन में न
जाने कितनी बार कितनी ही सूरतों में देख पड़ते थे। आज उसी फ़ौजी बारक
में बैठे रहने पर भी ऐसा लगता था कि मानो वे सब रहस्य हमारे आस-पास
चक्कर काट रहे हैं। बीच-बीच में ऐसा प्रतीत होने लगा कि बहुत पुराना सुख-
स्वप्न मानो इस छावनी की बारक में लिपटा हुआ है।
लम्बी बारक के बीच में दोहरी कतार में सिलसिले से चारपाइयां बिछी हुई
हैं। कोई तो चारपाई पर बैठा इधर-उधर की बातें मार रहा है, कोई पुस्तक पढ़
रहा है और कोई किसी काम से बारक में आता-जाता है। हम लोग परिचित
सिपाहियों से उमंग के साथ बातचीत कर रहे थे सही; किन्तु मन में एक ही साथ
डर, अचरज और आनन्द की विचित्र हलचल मची हुई थी। हमारे लिए मिठाई
मँगाने का जब ये इन्तज़ाम करने लगे तब पहले तो हम लोगों ने इन्हें रोका कि
अजी, मिठाई की क्या ज़रूरत है, रहने भी दीजिए; किन्तु इनका आग्रह देखकर
अन्त में चुप हो जाना पड़ा। इधर जब मिठाई के आने में विलम्ब होने लगा तब
बीच-बीच में खटका होने लगा कि ज़रूर कुछ-न-कुछ दाल में काला है। शायद
किसी अजगर को हमारी खबर देने के लिए कोई दौड़ाया गया है। थोड़ी ही देर
में आस-पास के सिपाहियों ने हमारी चारपाइयों पर आकर हमारे साथ बातचीत
छेड़ दी। बारकों में हम लोगों ने अपने को राजपूत क्षत्रिय बतलाया था। सिर्फ़
राजपूतों ही के लिए बनारस में एक स्कूल और कालेज था। वहाँ राजपूतों के
सिवा और कोई पढ़ने न पाता था और न वहाँ के बोर्डिंग में ही रहने पाता था।
अपने पूर्व-परिचित सिपाही की बात के अनुसार हमने इन लोगों को बतलाया कि
हम लोग उक्त राजपूत कालेज के छात्र हैं। सिपाहियों द्वारा नाम-धाम पूछा
जाने पर हमने बड़े तपाक से अमरसिंह और जगतसिंह प्रभृति नाम बतला दिए।
किन्तु मन में धुकुर-पुकुर होने लगी कि कहीं हमारा असली स्वरूप प्रकट न हो
जाय। यह बतलाने की ज़रूरत ही नहीं कि वहाँ पर हम लोग बंगाली लिबास
में नहीं गए थे। हममें से एक के सिर पर तो साफ़ा था और दूसरे के सिर पर
थी टोपी। पहनावा भी संयुक्त प्रांतवासियों जैसा था। मुझसे साफ़ा बाँधते न
बनता था, इसलिए मैं अक्सर टोपी से ही काम लेता था।
हमारे पूर्व-परिचित सैनिक ने एक हवलदार से परिचय करा देने का वादा
किया। इस हवलदार से ये हमारी चर्चा पहले ही कर चुके थे और हवलदार भी
हमारे प्रस्ताव के पक्ष में हो गया था। थोड़ी देर बाद हवलदार से हमारा परिचय
हुआ। इसका नाम दिल्लासिंह था। इसने हमसे कुछ झिझकते हुए बातचीत की
और थोड़ी देर मे यह कहकर कहीं चल दिया कि एक काम करके आता हूँ।
दिल्लासिंह उसी समय से हमें कुछ भला न जँचा और जब वह काम का बहाना
करके खिसक गया तब मैंने डरते-डरते पूर्व-परिचित सैनिक से धीरे से पूछा कि