बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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कर दें। हम लोग भी यथासम्भव वृक्षों की ओट में बैठकर आसन्न-विद्रोह का
दिन, समय और अन्यान्य छोटी-मोटी बातों पर विचार कर रहे थे। बीच-बीच में
ये लोग शंकित-चित्त से इधर-उधर देख लेते थे। उस दिन मानो कई युगों की
संचित काल्पनिक वीर मूर्तियां, कलेवर धारण करके, उस अँधेरे में परछाईं की
तरह हमारे आगे देख पड़ीं थीं। सन् 1857 के गदर के पश्चात् फिर उसी तांडव
नृत्य की जंगी तैयारी का विचार करके देह और मन सचमुच ही पुलकित और
रोमांचित हो रहे थे। पलटन के लोग बड़ी ही आन्तरिकता के साथ हम लोगों से
बातचीत कर रहे थे। इस प्रकार घने पेड़ों के नीचे गुप्त रूप से हम लोगों को
सलाह करते समय, यदि सिपाहियों में से ही कोई जाकर अपने ऊँचे अफ़सरों को
इसकी इत्तिला दे आता तब तो कोर्ट मार्शल में इन सबकी जान के लिए बड़ी
मुसीबत पड़ती। यही कारण था कि उस दिन पेड़ों के नीचे आकर वे लोग इस
प्रकार चौकन्ने थे। किन्तु मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका, क्योंकि इस प्रकार की
तैयारी में छिपने-छिपाने का भाव बड़ी आसानी से ताड़ लिया जाता था और
इसीलिए मैंने वृक्षों की ओट में इस प्रकार छिपने के उद्योग का विरोध किया तथा
इस प्रकार संदिग्ध भाव से बार-बार इधर-उधर ताकने को भी मना किया। हम
लोग कहीं भी जब इस प्रकार सलाह करने के लिए आपस में एकत्र होते थे तब
इस बात पर हम सबका सदा ही ध्यान रहता था कि सहज-सरल भाव ही हममें
बना रहे; किसी प्रकार की चंचलता न आने पाए। किन्तु उस दिन मना कर
देने पर भी जब सिपाहियों ने मेरी बात न मानकर इस तरह चौकन्ने रहने मे
ही भला समझा तब मेरे मन में यही आया कि ये लोग यों ही भोले-भाव से और
अत्यन्त आग्रह की प्रेरणा से यहाँ चले आए हैं; इस विप्लव की तैयारी मे ये जी-
जान से शामिल हैं और इस तरह हमारे पास आने-जाने मे अपनी जान को
जोखिम में समझते भी हैं लेकिन—'ओखली में सिर दिया तो मूसल की चोट
का डर ही क्या ?' ऐसी भावना से ही ये लोग हमारे पास आने और विप्लव
की तैयारी की सलाह करने में हिचकते नही। इस तरह वे न जाने कितनी बार
हमारे पास आए होंगे।
इधर तो फ़ौजी बारकों में पहुँच हो गई और उधर बंगाल से लौटने पर
कुछ ही दिनों में, अमेरिका से लौटे हुए एक महाराष्ट्री युवक के आ जाने से,
पंजाब के साथ और भी घना सम्बन्ध करने का नया ज़रिया मिल गया। इन
महाराष्ट्री युवक का नाम पिंगले था। इनका पूरा मराठी नाम इस समय मुझे
याद नही। स्वदेश को वापस आते समय इन्होंने जहाज़ पर ही निश्चय कर
लिया था कि पहले बंगाल के विप्लवपन्थी दल का बंगाल में पता लगाएँगे, तब
पंजाब जाएँगे। कलकत्ता में विप्लव दल के कई लोगों मे इन्होंने भेंट की। इससे
पंजाब में विप्लव की तैयारी होने की बात कलकत्ता-भर में फैल गई। इधर
इनके कुछ मित्रों के साथ हमारे दल का भी सम्बन्ध था और इसी नाते पिंगले
हमारे दल में आ गए। हमारे दल में आते ही ये सीधे काशी भेज दिए गए।