बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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भाव और कर्म
दादा से सलाह करके अब मैं बंगाल को चला गया । वास्तव में देखा जाय तो
दादा ही सारे उत्तर-भारतीय विप्लव-पन्थ के नेता थे । तथापि, दल की पुरानी
पद्धति के अनुसार, उन्हें अपना कार्यकलाप और भी दो-एक व्यक्तियों पर प्रकट
करना पड़ता था । रासबिहारी पहले अन्यान्य सदस्यों की भाँति दल के एक
साधारण कार्यकर्ता ही थे । लेकिन वह धीरे-धीरे अपनी अद्भुत कार्यकुशलता से
सबकी जानकारी से बाहर आश्चर्यजनक रीति से संगठन करते रहे और एक
दिन बहुत-से कामों का भार अपने ऊपर लेकर वह नेताओं के सम्मुख अकस्मात्
प्रकट हुए । अस्तु, अब पंजाब का पर्व समाप्त करने के पहले बंगाल की चर्चा न
छेड़ूँगा ।
इस समय हमारे दल का विस्तार पूर्वी बंगाल की अन्तिम सीमा से लेकर
अब पंजाब में प्रवेश करने की सूचना दे रहा था । अपने प्रधान नेता और पूर्वी
बंगाल के कुछ नेताओं को पंजाब का नया समाचार सुनाने के लिए मैं बंगाल को
भेजा गया । किन्तु कलकत्ता में उस समय पूर्वी बंगाल का कोई भी व्यक्ति न
मिला । अतएव मैंने उचित स्थान पर खबर कर दी कि जितनी जल्दी हो सके,
पूर्वी बंगाल का कोई व्यक्ति काशी आ जाय । फिर केन्द्र के नेताओं के पास जाकर
मैंने पंजाब का सारा समाचार विस्तार के साथ कह सुनाया । उन लोगों में एक
नये उत्साह की तरंग मैंने देखी सही, किन्तु पूरे समाचार पर वे लोग उस समय
विश्वास नहीं कर सके । बहुत रात तक बातचीत होती रही । यदि सचमुच
विद्रोह हो जाय और फिर यदि ऐसी दशा हो कि आमने-सामने युद्ध न करके हमें
पीछे हटना पड़े तो उस समय हम लोगों को कहाँ आश्रय मिलेगा ? हम लोगों
को रसद किस प्रकार मिलेगी और परस्पर सम्बन्ध-सूत्र किस प्रकार से रक्षित
रहेगा ?—इत्यादि अनेक विषयों पर जो बातचीत हुई थी उसका यहाँ पर उल्लेख
करने से कुछ लाभ नहीं । उस समय भी सिक्खों के दल विदेश से भारत में चले
आ रहे थे और उनमें बहुतेरे लोग कलकत्ता में कुछ दिन तक विश्राम करके पंजाब
को चले जाते थे । मैंने नेताओं से कहा कि इन विदेशों से आए हुए सिक्खों से
संयोग स्थापित करने की विशेष रूप से चेष्टा कीजिए । इस बात पर भी विचार
किया गया कि अब बहुत जल्द बम के गोले बहुत अधिक बनाने पड़ेंगे और उसके