बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सवार हो उस गांव में ही आ गए ! पुलिस उन्हें पहचानती न थी। इस मर्तबा
करतारसिंह इसी असीम साहस के कारण साफ बच गए। यदि वे ऐसा न करते
तो संभवतः रास्ते में ही पकड़ लिए जाते।
इस समय रुपये-पैसे का खर्च इतना अधिक बढ़ गया था कि अब दान की
रकम से काम न चलता था, इसलिए अब वे कुछ-कुछ डकैती करने के लिए विवश
हुए। बाद में मालूम हुआ कि मूलासिंह भला आदमी न था, इसने दल का रुपया-
पैसा भी हड़प लिया। जिस समय ये बातें मालूम हुईं उस समय सुधार का कोई
उपाय नहीं था। क्योंकि जहां तक मुझे स्मरण है, वह इसके थोड़े ही दिन बाद
नशे की हालत में शीघ्र ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसके सिवा व्यक्तिगत
शत्रुता के कारण उसने एक आदमी के यहाँ डकैती भी कराई थी।
सभी बड़े-बड़े आन्दोलनों में देखा गया है कि साधु और महान् चरित्रवान्
पुरुषों के साथ कुछ नर-पिशाच भी दल में आ मिलते हैं। यह आन्दोलनों का दोष
नहीं है, यह तो हमारे मनुष्य-चरित्र का ऐब है। शायद लेनिन ने भी कहा था कि
प्रत्येक सच्चे बोलशेविक के साथ कम से कम उन्तालीस बदमाश और साठ मूर्ख
उनके दल में मिल गए थे।¹ और मैंने श्रद्धेय शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय जी से सुना है
कि देशबन्धु दास ने भी कदाचित् कहा था कि वकालत करते-करते हम बुड्ढे हो
गए और इस बीच हमको बड़े-बड़े धोखेबाज़ों से भी साबिका पड़ा; किन्तु असह-
योग आन्दोलन में हमने जितने धोखेबाज़ आदमी देखे वैसे ज़िन्दगी-भर में नहीं
देखे थे।
मैं इस बार पंजाब में हफ्ते-भर के लगभग इन लोगों के साथ रहा। अतएव
इनके बहुत-से आचार-व्यवहारों को मैंने ध्यान से देखा। यद्यपि ये लोग कड़ाके
की ठण्ड में भी बहुत ही तड़के नहा-धोकर ग्रन्थसाहब इत्यादि का पाठ करते थे
किन्तु होटल में भोजन करने के कारण इनका खान-पान शुद्धतापूर्वक न होता था,
परन्तु इनका आपस का बर्ताव बहुत ही भला था। एक-दूसरे को बुलाते या बात-
चीत करते समय ये 'सन्तो', 'सज्जनो', 'बादशाह' इत्यादि सम्मानसूचक शब्दों
के सिवा और किसी शब्द का प्रयोग न करते थे। इस बार भाई निधानसिंह से
मेरी मुलाक़ात हुई। यही वह पचास वर्ष के बूढ़े सिक्ख थे। ये कोई तीस-पैंतीस
वर्ष से देश के बाहर थे और चीन में रहते समय एक चीनी सुन्दरी से इन्होंने
विवाह कर लिया था। मैं इन्हें अक्सर धर्म-चर्चा और धर्म-ग्रन्थ का पाठ करते
देखता। एक बार मैंने स्टेशन पर जाकर देखा कि वहाँ प्लेटफार्म पर बैठे हुए आप
छोटी-सी धर्म-पुस्तक को मन ही मन पढ़ रहे हैं। ये कुछ सिर्फ दिखावे के लिए
ही ऐसा नहीं करते थे, क्योकि मैंने अण्डमन में भी इनकी यही दशा देखी थी। मैंने
इनमें जैसा तेज देखा है वैसा नौजवानों में भी नही देखा।
- Russia's Ruin by E. Wilcox p. 249