बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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काशी केन्द्र की कहानी
इस बार पंजाब से नया उत्साह लेकर लौटने पर भी काशी आने पर मुझे
ऐसा लगा मानो अब तक मैं बहुत अनाचार और अनियमों में था। मैं नहीं कह
सकता कि पंजाब के मुकाबले में काशी कितनी मनोहर और पुनीत मालूम हुई।
मैं नहीं कह सकता कि ऐसा क्यों हुआ, किन्तु इस मर्तबा काशी के जिस स्निग्ध
रूप का अनुभव मुझे हुआ उसका अनुभव काशी मे मुद्दत से रहने पर भी नहीं
हुआ था। देह में काशी की हवा लगते ही ऐसा मालूम हुआ कि बहुत दिनों की
अपवित्र देह शुद्ध हो गई। काशी में सिर्फ एक दिन रहने से ही ऐसा जान पड़ा कि
बहुत दिनों की संचित ग्लानि दूर हो गई।
विप्लव की तैयारी व्यर्थ हो जाने पर रासबिहारी जब काशी मे वापस आए
तब उनके मन मे भी बिलकुल ऐसा ही भाव हुआ था।
काशी लौट आने पर पूर्व बंगाल के एक नेता से भेंट हुई। हमारे एक पूर्व-
परिचित नेता इसमे पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे। इसमे, ऐसी आशा के वाता-
वरण में सभी पूर्व-परिचित व्यक्तियो के जेल चले जाने से मुझे एक अनिर्दिष्ट-सी
वेदना हो रही थी। इतने काम-काज के बीच ज्यों ही थोड़ी-सी फुरसत मिल
जाती थी त्यों ही अक्सर मन में यह बात कसकने लगती थी कि आज वे लोग क्यों
हमारे साथ नहीं है। उस आनन्द को उस समय सभी के साथ न लूट सकने से
जब-तब उनका वह विच्छेद प्राणों को बहुत ही सताने लगता था।
कलकत्ता-विभाग के एक सुप्रसिद्ध नेता, श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय,
इन्ही दिनों काशी आए। विप्लव-युग के श्रेष्ठ कार्यकर्ताओं के बीच उनका स्थान
बहुत उच्च है। इतिहास में यह अक्सर देखा जाता है कि जब कोई नया आन्दोलन
समाज अथवा राष्ट्र के आम व्यवहार के विरुद्ध सिर उठाता है तब जो लोग वैसे
आन्दोलन के प्राण-स्वरूप होते हैं उनका चरित्र अनन्य-साधारण हुए बिना वह
आन्दोलन कारगर नहीं हो सकता। इसी से जिस समय कोई सम्प्रदाय राज-रोष
में दग्ध किया जाता है अथवा समाज के निग्रह में पीसा जाता है उस समय भी
उस सम्प्रदाय के व्यक्तियों के चरित्र में कुछ न कुछ विशेषता अवश्य रहती है।
यही कारण है कि ऐसे सम्प्रदायों की सदस्य-संख्या स्वल्प होते हुए भी समाज पर
उनका प्रभाव कुछ कम नहीं पड़ता। विप्लव के विगत इतिहास से भी इस बात