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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 408 में से

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पृष्ठ 76

74 / बन्दी जीवन
हम दो व्यक्ति बारक के समीप घने पेड़ों की छांह में बाट जोह रहे थे और हमारे
बीच का एक व्यक्ति बारक में दो-एक सिपाहियों को बुलाने गया था। देर तक
राह देखने पर भी जब हमारा साथी नहीं लौटा तब हम लोग दुचित्ते हो गए और
डर लगने लगा कि कहीं कोई विपत्ति तो नहीं आ गई। तब तो फिर यहां इस
प्रकार, प्रतीक्षा करना भी युक्तिसंगत नहीं। किन्तु अपने साथी को ही किस प्रकार
छोड़कर चल दें ? ऐसी-ऐसी बहुतेरी बातों पर हम सोच-विचार करने लगे।
डर तो हम लोगों को खूब लगता था किन्तु डर के मारे हम लोगों के हाथ-पैर
नहीं फूल गए, हमारा तो विश्वास है कि,विषाद की तनिक-सी भी कालिमा हमारे
चेहरे पर नहीं आने पाई। और हम ही बारक में कितनी ही बार आए-गए हैं, किन्तु
खटके ने एक भी बार साथ नहीं छोड़ा, फिर भी हम प्रत्येक बार साफ निर्विघ्न
लौट आए। लौटने पर सोचते थे कि चलो, आज का दिन तो निर्विघ्न व्यतीत
हुआ; किन्तु फिर भी कई बार बारकों में आना-जाना पड़ा। जो हो, देर तक
बाट जोहने पर भी जब मित्र महोदय न लौटे तब सोचा कि क्या सचमुच आफ़त
ने घेर लिया ! फिर सोचा कि हम लोग बंगाली हैं, हाथ में टोपी और साफ़ा है,
बारक के पास ही पेड़ की छांह में हम भले आदमी के लड़के बैठे हैं, इन घने
पेड़ों की क़तार के पास से ही ग्रैण्डट्रंक रोड गई है, जो कोई हाकिम-हुक्काम हमें
यहां पर इस दशा में बैठा हुआ देख ले तो क्या समझेगा ? हम ऐसी ही उधेड़-
बुन में थे कि मित्र महोदय को दो सिपाहियों के साथ अपनी ओर आते हुए देखा।
अतः हमारे सिर से बड़ा भारी बोझा-सा उतर गया। इसके पश्चात् इस बारक
के पास दो-एक बार सबेरे के समय भी आया हूँ, उस समय सिपाही लोग परेड पर
क़वायद करते थे। अपने ही परिचित एक हवलदार को सेना-परिचालन-कार्य
करते देखकर ऐसा लगा कि रेजिमेंट मानो हमारी ही है, हमारे उद्देश्य की
सफलता के लिए ही मानो यह सारी तैयारी की जा रही है। सामने से दो-एक
अंग्रेज़ अफ़सर घोड़े पर बैठे हुए निकल गए, किन्तु किसी ने हम लोगों
की ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय तो किसी के मन में रत्ती-भर भी सन्देह
न था।
एक दिन की बात का मुझे खूब स्मरण है। उम समय पंजाब का दुबारा
चक्कर लग चुका था। विप्लव की तैयारी पूरी होने को थी। एक दिन उन्हीं घने
पेड़ों के नीचे बैठकर, गारों की फ़ौजी बारक के बिलकुल ही समीप, अंग्रेज़ों के ही
राज्य को उलट देने के लिए कैसी भीषण गुप्त योजना की गई थी। उस दिन कोई
तीन हवलदार और नायब हवलदार तथा कुछ सिपाही, शाम होने पर, उन्हीं पेड़ों
के नीचे एकत्र हुए। हम लोग भी तीन व्यक्ति थे। इन पेड़ों की क़तार के एक
ओर रेल की पटरी है और दूसरी ओर है ग्रैण्डट्रंक रोड। इसी ग्रैण्डट्रंक रोड के
बग़ल में थोड़ा-सा मैदान छोड़कर सेना की बारकें हैं। कुछ सिपाही सड़क के
किनारे पेड़ों की ओट में इसलिए बैठे हुए थे कि यदि किसी को उस ओर आते
देखें अथवा ऐसा ही कुछ और खटका हो तो उसी दम हम लोगों को सावधान