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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 408 में से

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पृष्ठ 88

86 / बन्दी जीवन
को दी गई, किन्तु बंगाल के भीतर जो काम हो रहा था उसका भार किसी एक
व्यक्ति पर न था ।
यतीन्द्र बाबू काशी इसलिए बुलाये गए थे जिसमें कि सारा उत्तर भारत एक
सूत्र में और एक सुर में कर लिया जाए । इस प्रकार पंजाब के सीमान्त प्रदेश से
लेकर पूर्व बंगाल और असम की सीमा तक समूचा देश एक संगठन में रहकर
विप्लव के लिए तैयार ही था। पंजाब के सिपाही इस समय कुछ कर दिखाने के
लिए ऐसे उतावले हो गए थे कि अब किसी भी तरह इन्हें शान्त न रखा जा
सकता था। मैं नहीं कह सकता कि इस प्रकार इन्हें संयत कर देना अच्छा हुआ
या बुरा, क्योंकि यदि हम लोगों की रोक-टोक न रहती तो पंजाब में अवश्य ही कुछ
न कुछ भीषण घटना हो जाती । कौन कह सकता है कि उसका फल क्या और
कैसा होता ? हम लोगों ने उनकी जल्दीबाजी को इसलिए रोका था कि सारा
देश एक मत से विप्लव के ताण्डव-नृत्य में सम्मिलित हो जाय ।
मालूम नहीं कि यतीन्द्र बाबू के काशी आने का हाल सरकार को कुछ ज्ञात
हुआ था या नहीं, और यदि हुआ था तो कितना ? अतः मुझे यह स्पष्ट करना
चाहिए कि यहाँ पर इस बात का उल्लेख मैंने किसलिए किया है। क्योंकि यहाँ
तक मैंने जो कुछ लिखा है उसमें एक भी गुप्त बात प्रकट नहीं की गई है, यहाँ तो
मैंने उन्हीं घटनाओं का उल्लेख किया है जिन पर कि षड्यन्त्र-सम्बन्धी मुकदमों
में प्रकाश पड़ चुका है और जो अदालतों में प्रमाणित हो चुकी हैं। कुछ बातें तो
ऐसी भी हैं जिन्हें सरकारी पक्ष ठीक-ठीक नहीं जानता, इसीलिए इन घटनाओं
को भी मैंने छोड़ दिया है। क्योंकि उन घटनाओं को सिद्ध करने योग्य उपयुक्त
प्रमाण इस समय तक सरकार के पास नहीं हैं। जिन घटनाओं के प्रकट होने से
किसी पर तनिक भी आंच आने की सम्भावना नहीं है और जिन्हें सरकार तो भली
भाँति जानती है किन्तु हमारे देशवासी जिनके अत्यन्त अस्पष्ट आभास के सिवा
और कुछ भी नहीं जानते, ऐसी ही घटनाओं का वर्णन मैं अपनी लेखन-शक्ति
क्षीण होते हुए भी करना चाहता हूँ। विगत युद्ध के समय भारत में जो षड्यन्त्र-
सम्बन्धी मुकदमे हुए थे उनकी सुनवाई अधिकतर जेलों में हुई थी, उन मुकदमों
का कच्चा हाल जनता को प्रायः मालूम ही नहीं हुआ, क्योंकि पुलिस और न्याय-
कर्त्ता को जिस बात का प्रकाशन पसन्द न होता था, फिर वह भले न्यायकर्त्ताओं
के सामने प्रमाणित हो चुकी हो उसका समाचार प्रकाशित न किया जाता था।
इन कारणों से वे घटनाएँ बहुतों के लिए बिलकुल ही नई होंगी। मैं सिर्फ यही
चाहता हूँ कि जो बातें सरकार तक पहुँच गई हैं उनसे जनता भी परिचित हो
जाय। जो सचमुच एक दिन देश में हुआ था और जिसको जान लेने से अपनी
शक्ति-सामर्थ्य का ज्ञान हो जाता है और यह भी मालूम हो जाता है कि किस
जगह हमारी दुर्बलता थी, कहाँ हमने दुर्बुद्धि का परिचय दिया था, और किस
स्थान पर हमारे मन की संकीर्णता तथा कार्य की त्रुटि प्रकट हुई थी—अतएव ही
उन घटनाओं पर मैं निःसंकोच होकर प्रकाश डालना चाहता हूँ। इससे हमारा