बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इस समय मैंने एक बात पर विशेष रूप से ध्यान दिया—क्या रेल, क्या सड़क
और क्या हाट-बाजार, सभी जगह अशिक्षित जनता में अंग्रेजों के प्रति तीव्र विद्वेष
फैलता जाता था। एक दिन काशी में, बस्ती से बाहर, कुएं की जगत पर बैठकर
एक संयुक्तप्रदेशवासी व्यक्ति के साथ हमारे ही किसी काम की आलोचना हो
रही थी। पास ही एक किसान घास छील रहा था। थोड़ी देर में देखा कि वह
और भी समीप आ गया और घास छीलते-छीलते मुसकराकर पूछने लगा,
“अंग्रेजों का राज्य रहेगा भी या नही ?” हम लोगों ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता
है ?” उत्तर मिला, “बाबू, अब ये हिन्दुस्तान में नही ठहर सकते, इनका वक़्त
हो चुका। बाबू, जर्मन लोग कब तक आएंगे ?” तब हम लोगों ने उसे समझाया
कि जर्मनो के आने से हमारा कुछ फ़ायदा नही; किन्तु उसने फिर कहा, “नही
बाबूजी, अग्रेज लोग अब न्याय नही करते, अब इनका चला जाना ही भला है ।”
इस पर हमको जो कहना चाहिए था वही कहा। यहाँ उसका उल्लेख करने की
आवश्यकता नही। मैने देखा कि ‘बाबू लोग’ यदि ऐसे लोगो की बाते सुनकर हाँ
मे हां न मिलाते तो ये बाबुओं को जरा टेढी नजर मे देखने लगते थे ।
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काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध
काशी मे पजाबमेल तीन बजे पहुँची । मेरे ऊपर पुलिस की खास नज़र
रहती थी । सबेरे से लेकर नौ-दस बजे तक पुलिस या तो मेरे घर के दरवाजे के
सामने ही अथवा वही-कही अगल-बगल मे बैठी रहती थी और घर से बाहर
पैर रखते ही मेरी गतिविधि पर नज़र रखने के लिए वह परछाईं की तरह मेरा
पीछा करती थी । घर मे रहने पर भी मुझसे मिलना-जुलना लोगो के लिए सहज
काम न था । क्योकि पुलिस जिसके साथ मेरा हेल-मेल देखती उसकी भी निग-
रानी उसी तरह करने लगती, जैसी कि मेरी करती थी । इस कारण उन दिनो
मेरे-जैसे लोगो के साथ मामूली ढग पर लोगो का मिलना-जुलना भी जुर्म समझा
जाता था । ऐसा सख्त पहरा रहने पर भी मै इस प्रकार के काम करता गहता था।
बगाल से काशी विभाग मे बम के गोले और रिवाल्वर इत्यादि ले आता और
फिर वहाँ से पजाब के विभिन्न प्रदेशो मे इन चीजो को पहुँचाता था, सभी काम
इस सख्त पहरे के बीच होते रहते थे । पुलिस की आँखो मे धूल झोकना हम लोगो
के लिए साधारण-सी बात थी। आगे की बाते लिखने से पहले यहाँ मैं कुछ वे
लटके लिखता हूँ, जिनमे मालूम होगा कि किस प्रकार हम लोग पुलिस के पहरे-
वाले को छकाते थे ।
पुलिम की नजर मे बचने के लिए हमारी सबसे बढ़िया हिकमत यह थी कि
पहले तो घर से निकलते समय ही होशियारी से किसी तरह पहरे वाले को धोखा
दिया । यदि घर से रवाना होते समय पहरेदार की नज़र न बचा सके तो यह
किया कि उस बार न तो दल का कुछ काम किया और न दल के किसी व्यक्ति
से ही भेट की। उस समय या तो अपने किसी सहपाठी के घर चले गए या हाट-
बाजार मे जाकर ज़रूरी सौदा-सुलुफ मे ऐसा चित्त लगा दिया कि घरवाले मम-
झते कि “आज तो शचीन्द्र का ध्यान गृहस्थी के कामो की ओर बेतरह लगा हुआ
है।” अथवा कारमाइकेल लाइब्रेरी मे जाकर मासिकपत्रो और समाचार-पत्रो
की सैर करके फिर जहाँ-के-तहाँ अपने घर आ गए। आखिरी हिकमत यह थी
कि यदि गर्मी का मोसम हुआ तो घर लौटकर थोडी-मी मालिश की और जाह्नवी
के पवित्र जल मे देह तथा मन को शीतल करके पहरेवाले को महज ही छुट्टी दे
दी, सहज इसलिए कि किमी-किसी दिन बेचारे को हमारा पीछा करते-करते
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नाकों चने चबाने पड़ते थे। इन पहरे वालों में से प्रायः किसी के भी साथ मेरा
व्यक्तिगत विरोध न था। आँख से आँख मिलते ही मैं मुसकरा देता था। कभी
तिमंजिले की खिड़की से झांककर मैंने देखना चाहा कि देखें पहरेदार किस ओर
क्या कर रहा है और ठीक इसी समय उसकी भी नज़र मुझ पर पड़ गई तब मैंने
जंगले को खोल दिया। हज़रत नीची निगाह करके टहलते हुए, घर के सामने
से, मुसकराकर कुछ आगे बढ़ गए। ऐसा अवसर होता ही रहता था। इन पहरे-
दारों को धोखा देने में भी मज़ा आता था और धोखा देने में विफल हो जाने से
भी हँसी-मज़ाक का मसाला हाथ लगता था। किन्तु किसी-किसी दिन इम तेज़
निगाह की बदौलत काम में गड़बड़ हो जाने से इन लोगों पर क्रोध भी कम न
होता था। इन्हें हम लोग जब-तब समझाया करते कि "भैया, किसी तरह नौकरी
सँभाले रहो, भला इस तरह दिन-भर दरवाज़े पर डटे रहना कहाँ की भलमनसी
है ? घरवाले और टोले-मुहल्लेवाले भला क्या कहेंगे ? सरकार समझती है कि
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काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध / 65
बाहर से काशी में लाये भी, फिर वहां से बाहर भेज भी दिया। मैं एक दिन
सबेरे घर जा रहा था। घर के पास आते ही एकदम भेदिया विभाग के दारोगा
के सामने जा पड़ा। दारोगा अकेला न था, उसके साथ उसका एक अनुचर भी
था। मुझ पर नज़र पड़ते ही वह मुसकराकर आगे बढ़ा और मेरे पास आ खड़ा
हुआ। मैं भी उसी तरह हंस-हंसकर उससे बातचीत करने लगा। "क्या मार्निंग
वाक करने तशरीफ ले गए थे ?" मैंने भी कहा, "जी हां, ज़रा घूम-घाम आया
हूँ।" "यह क्या है ?" कहकर मेरे बुक-पॉकेट की एक छोटी-सी किताब की ओर
उसने अंगुली से इशारा किया। मैंने उसी दम किताब निकालकर दारोगा को दे
दी। उसमें नैपोलियन की कुछ उक्तियां और ऐसे ही दो-एक अन्य विख्यात
पुरुषों के जीवन की कोई-कोई विशेष घटना लिखी हुई थी। उसने खूब देख-
भालकर मुझे किताब लौटा दी। फिर मुसकराकर हम लोग अपनी-अपनी राह
से लगे। उस दिन और उसी समय मेरे कोट के नीचेवाले पॉकेट में गनकाटन
(इस कपास से बम चलाने की बत्ती का पलीता बनता है) और इसी किस्म के
अन्यान्य भीषण पदार्थ भरे हुए थे।
दूर से नज़र पड़ते ही हम लोग ताड़ लेते थे कि यह पुलिस का आदमी है।
मामूली पहरेदारों को तो उनकी जूतियों से ही पहचान लिया जाता था। फिर
ज्यादातर उनके सिर की टोपी, चलन का ढंग और हाथ में छड़ी लेने की रीति—
अपनी विशेषता के कारण—हमारी दृष्टि को धोखे से बचा लेती थी। कभी-
कभी अपने साथियों के कारण ये लोग पहचान लिए जाते थे। सड़क पर चलते
समय हम लोगों को कुछ ऐसी आदत पड़ गई थी जो कि जेल से लौट आने पर
भी बहुत दिन तक बनी रही। वह यह कि सड़क पर चलते समय एकाएक किसी
जगह ठहरकर किसी व्यक्ति से बातचीत करने लगे और उसी अवसर पर आगे-
पीछे नज़र डालकर एक बार भली भांति देख लिया कि कोई पीछा तो नहीं कर
रहा है। सड़क के मोड़ पर जाकर पीछे भेद भरी निगाह डालने की जो आदत
मुझे पड़ गई थी उसके लिए अभी उस दिन लोगों ने खूब मज़ाक किया। अथवा
कोई चीज़ मोल लेने के बहाने किसी दूकान पर ठहरकर या किसी और ढंग से
चलते-चलते एकदम रुककर आगे-पीछे देखे बिना मैं रास्ता चलता ही न था। मैं
इस बात का ध्यान हमेशा रखता था कि मेरी तनिक-सी भी ग़फ़लत से समूचा दल
तहस-नहस हो सकता है। किन्तु चलते-चलते ठहरे बिना कभी पीछे मुड़कर न
देखता था। यदि एक ही चेहरे पर कई बार नज़र पड़ती तो उस पर तुरन्त सन्देह
हो जाता और मैं अपने सन्देह को जांचने के लिए किसी सुनसान गली में जा
निकलता। उस समय या तो पीछा करनेवाला पकड़ लिया जाता यानी विश्वास
हो जाता कि यह जासूस है अथवा उसे लाचार होकर पीछा छोड़ देना पड़ता था।
अपना पीछा करनेवाले को जब इस तरह हम चंगुल में फांस लेते थे तब किसी
तरह उसे धोखा देना ही हमारा पहला काम होता था। ऐसे मौके पर चकमा
देने का खास ढंग था सुनसान रास्ते पर चलते-चलते एकाएक किसी भीड़-भाड़
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की जगह में जाकर गायब हो जाना। इसके सिवा घर से चलने के पहले ही मैं खूब
चौकन्ना हो जाता था और जिस दिन खास काम होता उस दिन तो बड़े तड़के
घर से चल देता था। जब लौटकर घर आता तो देखता कि मेरा पीछा करने के
लिए तैनात किए गए पहरेदारजी घर को घेरे हुए इस तरह बैठे हैं गोया मैं घर के
भीतर ही हूँ।
पुलिस के साथ मेरा ऐसा ही सम्बन्ध था। ऐसी ही दशा में तीन बजे दिन
को मैं काशी आ पहुँचा। पुलिस की नज़र बचाकर घर गया और फिर वहाँ से
दादा के डेरे पर। रासबिहारी उस समय काशी में ही थे। किन्तु पुलिस को उस
समय स्वप्न में भी हमारी गतिविधि की कुछ भी जानकारी न थी।
दादा से सलाह करने पर निश्चय हुआ कि युक्त प्रान्त के सैनिकों में भी
विप्लव के विचार फैला देने चाहिएँ। और बंगाल को पंजाब के विद्रोह की खबर
बहुत जल्द दे देनी चाहिए। पाँचवीं दिसम्बर की बाट जोही जाने लगी, क्यों-
कि पृथ्वीसिंह से बातचीत हो जाने पर बंगाल को मेरा जाना निश्चित किया गया
था। इस बीच अब मैं इस ताक में लगा कि काशी की छावनी में—बारकों में—
किस प्रकार मेरी रसाई हो। दो-एक दिन के बाद अखबार में पढ़ा कि अमेरिका
से लौटे हुए कुछ सिक्ख, ताँगे में सवार हो, एक गाँव में जा रहे थे। सन्देह करके
पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने गई तो उनके पास से रिवाल्वर इत्यादि अस्त्र
बरामद हुए। फिर पुलिस जब उन्हें गिरफ़्तार करने को तैयार हुई तब सिक्खों ने
गोली चलाई जिससे एक सिपाही बहुत घायल हो गया। बाद को मालूम हुआ
कि ये किसी खज़ाने को लूटने गए थे। किन्तु इनकी 'होशियारी' की 'तारीफ़'
करनी पड़ती है कि इन पर नज़र पड़ते ही पुलिस को शक हो गया !
ध्यान देने की बात है कि इस मौके पर गाँववालों ने पुलिस को सहायता दी
थी। गाँववालों ने समझा कि पुलिस मामूली उचक्कों और चोरों को गिरफ़्तार
कर रही है। बस, इसी धोखे में आकर उन्होंने पुलिस को मदद दी थी। इससे
कुछ दिन बाद की एक घटना का हाल सुनिए। उस समय विप्लव की तैयारी का
भण्डा फूट चुका था। सारे पंजाब में धर-पकड़ की धूम से विचित्र कोलाहल
मचा हुआ था। पुलिस भाई प्यारासिंह नामक एक सिक्ख युवक को गिरफ़्तार
करने की फ़िक्र में थी। एक दिन ऐसा हुआ कि पुलिस का एक घुड़सवार एक
युवक के पीछे बेतहाशा घोड़ा दौड़ाए जा रहा था। इस दशा में वह युवक तीन
मील के लगभग दौड़ा। घोड़े की दौड़ से बाजी मारने में वह असमर्थ होने पर था
कि उसी के गाँववालों ने आकर उसका रास्ता रोक लिया। पल-भर में पुलिस के
सवार ने आकर बहुत दिनों से भागे हुए आसामी भाई प्यारासिंह को गिरफ़्तार कर
लिया। गाँववालों को जब यह मालूम हुआ कि उन्होंने जिन्हें गिरफ़्तार कराया है
वह उन्हीं के गाँव के सुपरिचित और सभी के परमप्रिय भाई प्यारासिंह हैं, तब
उनके पछतावे का अन्त न रहा। जो लोग कभी इन भाई प्यारासिंह से मिले हैं
वे इनके चरित्र की मधुरता से अवश्य मुग्ध हुए हैं, और उन सभी को स्वीकार
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करना पड़ेगा कि इनका 'प्यारा' नाम सोलहों आने ठीक है। जैसे ये स्वभाव
से नम्र थे वैसे ही इनके चरित्र से एक शान्त, समाहित संयत तेज का आभास
मिलता था । गाँववाले सचमुच इनके गुणो पर लट्टू थे और विधाता की मर्जी
देखिए कि उन्ही गुण-मुग्ध गाँववालों ने मानो अपने हाथों अपने प्यारे को पुलिस
के पंजे मे फँसा दिया ।
अस्तु, पंजाब में गिरफ्तारियां होने की खबर पढकर हम लोग किंचित् विच-
लित हुए, क्योंकि हम लोग हरदम यही सोचते रहते थे कि ऐसा बढ़िया मौक़ा
तनिक-सी भूल से कही हाथ से न निकल जाय । इधर अपने दल के उपर्युक्त दो-
एक लड़कों से हमने अपने निश्चित कार्य की बाते कही । इस समय से हम लोगो
ने और सब कामो से ध्यान हटाकर अपना सारा सामर्थ्य सैनिकों का मन परि-
वर्तन करने की चेष्टा करने मे लगा दिया। मै एक दिन अपने एक महाराष्ट्री
मित्र के साथ फौज की बारको की ओर गया । हम लोग सीधे बारकों मे नही
गए, पहले छावनी स्टेशन पर पहुँचे । यह इसलिए किया कि यदि कोई हमारा
पीछा कर रहा हो तो, स्टेशन पर जाने से, बारको मे जाने की हमारी इच्छा उसे
न मालूम हो । स्टेशन पर पहुँचने के बाद हम लोग रेल की पटरी के किनारे-
किनारे बारको की ओर बढे । स्टेशन पर पहुँचने और वहाँ के लम्बे प्लेटफार्म
को तय करने में साफ मालूम हो सकता था कि हमारा पीछा तो नही किया जा
रहा है। और जब मैं रेल की पटरी के किनारे-किनारे चलने लगता था तब तो
कुछ छिप ही न सकता था। फौज की बारकों में जाते-आते समय किसी भी दिन
हमारा पीछा नही किया गया। रेल की लाइन, फौज की बारक के पास से, ग्रैण्ड-
ट्रंक रोड को काटती हुई चली गई है। ग्रैण्डट्रंक रोड के मोड़ पर आकर हमने
देखा कि दो युवा सिक्ख, बारक से निकलकर, शायद बाजार की ओर जा रहे
थे। हमको अपनी ओर आते देखकर वे लोग खड़े हो गए। मैंने इन लोगों से
कितनी ही बाते पूछी । कुछ प्रश्न ये है—“आप कहाँ जा रहे है ? आपकी पलटन
का क्या नाम है ? आपका हवलदार कौन है ? इस समय पलटन मे कितने जवान
हैं ? इससे पहले आप लोग कहाँ थे ? यहाँ से कही जल्दी बदली तो नही होने-
वाली है ? गोरो की बारको मे कितने सिपाही हैं ? और यहाँ की छावनी में
आपको आए कितना समय हुआ है ?” इत्यादि । सभी प्रश्नों के उत्तर देकर
उन्होंने मुस्कराकर पूछा — “ये बाते आप क्यों पूछते हैं ? हम पर हमला तो न
कीजिएगा ?” तब हम लोग भी इसलिए खिलखिलाकर हँस पड़े कि जिसमें इस
उच्च हास्य के अनन्तर इन लोगों के मन में हमारे किए हुए प्रश्नों के सम्बन्ध में
कुछ खटका न रहे । वे लोग अपने रास्ते लगे और हम धीरे-धीरे सडक पर,
बारकों के पास से होकर जाने लगे । बारकों में जाने की हमें हिम्मत न हुई ।
इतने में देखा कि एक और सिक्ख सड़क की तरफ आ रहा है। उससे हवल-
दार की बाबत पूछा तो वह बारक के एक स्थान की ओर अँगुली से इशारा
करके हमसे वहीं जाने को कहकर चला गया । अब हमने सोचा कि शायद बारकों
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में बाहरी आदमियों के जाने-आने की रोक-टोक नहीं है। किन्तु फिर भी बारक में
किसी से कुछ भी परिचय न होने के कारण उस दिन वहाँ जाने की हिम्मत न
हुई। हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी फौज की कुछ बातें मालूम करके हम लोग उस
दिन घर की ओर लौट पड़े। काशी में सिक्खों की पलटन देखने से मुझे उस दिन
बहुत ही उत्साह हुआ क्योंकि पंजाब में जाकर मैंने देख लिया था कि सिक्खों को
बड़ी सरलता से उत्तेजित किया जा सकता है। इसके सिवा यह भी सोचा था कि
यदि यह पलटन यहाँ कुछ दिन तक बनी रहे तो पंजाब से सिक्ख नेताओं को
यहाँ बुलाकर सहज ही काम कर लिया जाएगा। उस दिन मेरी एक यही कामना
थी कि यह सिक्खों की टुकड़ी कुछ दिन तक और यही बनी रहे। इन दिनों कोई
भी सेना की टुकड़ी एक स्थान पर बहुत दिनों तक न रहने पाती थी। यह टुकड़ी
भी थोड़े ही समय में, कितनी ही छावनियों की सैर कर आई थी और कुछ भरोसा
न था कि न जाने किस दिन यहाँ से कूच करने का हुक्म हो जाय।
इधर दिसम्बर की पाँचवी तारीख आ गई। यथासमय स्टेशन पर जाकर
देखा कि पंजाब मेल धक-धक करती हुई प्लेटफार्म पर आ गई। मन में तरंग
उठी कि हमारे विप्लव की तैयारी के साथ इंजन का बहुत घना सम्बन्ध है, इसी
से उसका प्रचण्ड वेग देखकर मैंने सोचा कि मानो पंजाब के विप्लव का समाचार
लेकर वह पागल की तरह दौड़ता आ रहा है। अब पंजाब की चिनगारियाँ इसी
दम बात की बात में इस प्रान्त में भी फैल जाएँगी। किन्तु गाड़ी में पृथ्वीसिंह
के दर्शन न हुए। उनको बहुत ढूँढा किन्तु कहीं न देख पड़े। तब पंजाबियों पर
बहुत क्रोध हुआ कि इन्हें वक़्त की क़द्र मालूम नहीं। अब क्या किया जाय? उन
लोगों को ढूँढ़ना सहज काम नहीं है। जाकर दादा को सब समाचार सुनाया।
यह अनुमान किया गया कि किसी कारण से पृथ्वीसिंह आज यहाँ न पहुँच सके
होंगे, इसलिए मैं अगले दिन फिर स्टेशन पर गया किन्तु आज का जाना भी व्यर्थ
हुआ। तीसरे दिन जाने पर भी भेंट न हुई।
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भाव और कर्म
दादा से सलाह करके अब मैं बंगाल को चला गया । वास्तव में देखा जाय तो
दादा ही सारे उत्तर-भारतीय विप्लव-पन्थ के नेता थे । तथापि, दल की पुरानी
पद्धति के अनुसार, उन्हें अपना कार्यकलाप और भी दो-एक व्यक्तियों पर प्रकट
करना पड़ता था । रासबिहारी पहले अन्यान्य सदस्यों की भाँति दल के एक
साधारण कार्यकर्ता ही थे । लेकिन वह धीरे-धीरे अपनी अद्भुत कार्यकुशलता से
सबकी जानकारी से बाहर आश्चर्यजनक रीति से संगठन करते रहे और एक
दिन बहुत-से कामों का भार अपने ऊपर लेकर वह नेताओं के सम्मुख अकस्मात्
प्रकट हुए । अस्तु, अब पंजाब का पर्व समाप्त करने के पहले बंगाल की चर्चा न
छेड़ूँगा ।
इस समय हमारे दल का विस्तार पूर्वी बंगाल की अन्तिम सीमा से लेकर
अब पंजाब में प्रवेश करने की सूचना दे रहा था । अपने प्रधान नेता और पूर्वी
बंगाल के कुछ नेताओं को पंजाब का नया समाचार सुनाने के लिए मैं बंगाल को
भेजा गया । किन्तु कलकत्ता में उस समय पूर्वी बंगाल का कोई भी व्यक्ति न
मिला । अतएव मैंने उचित स्थान पर खबर कर दी कि जितनी जल्दी हो सके,
पूर्वी बंगाल का कोई व्यक्ति काशी आ जाय । फिर केन्द्र के नेताओं के पास जाकर
मैंने पंजाब का सारा समाचार विस्तार के साथ कह सुनाया । उन लोगों में एक
नये उत्साह की तरंग मैंने देखी सही, किन्तु पूरे समाचार पर वे लोग उस समय
विश्वास नहीं कर सके । बहुत रात तक बातचीत होती रही । यदि सचमुच
विद्रोह हो जाय और फिर यदि ऐसी दशा हो कि आमने-सामने युद्ध न करके हमें
पीछे हटना पड़े तो उस समय हम लोगों को कहाँ आश्रय मिलेगा ? हम लोगों
को रसद किस प्रकार मिलेगी और परस्पर सम्बन्ध-सूत्र किस प्रकार से रक्षित
रहेगा ?—इत्यादि अनेक विषयों पर जो बातचीत हुई थी उसका यहाँ पर उल्लेख
करने से कुछ लाभ नहीं । उस समय भी सिक्खों के दल विदेश से भारत में चले
आ रहे थे और उनमें बहुतेरे लोग कलकत्ता में कुछ दिन तक विश्राम करके पंजाब
को चले जाते थे । मैंने नेताओं से कहा कि इन विदेशों से आए हुए सिक्खों से
संयोग स्थापित करने की विशेष रूप से चेष्टा कीजिए । इस बात पर भी विचार
किया गया कि अब बहुत जल्द बम के गोले बहुत अधिक बनाने पड़ेंगे और उसके
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लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ।
अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित-नए'—'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली । जब एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती थी
तब फिर जल्द समाप्त न होती थी । मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रणोदित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों
में कितनी ही नई रीतियों से विकसित होने की चेष्टा करता है । इसलिए एक
भाव के उपासक होकर भी, उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी, हम लोगों के
बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। गानेवाला तो एक ही है, किन्तु
वही एक स्वरलहरी पांच श्रोताओं के लिए कितने प्रकार की मूर्च्छना उत्पन्न
नहीं कर देता ! मेल तो काफ़ी रहता है, किन्तु बेमेल भी क्या कुछ कम रहता
है ? जिस आदर्श से प्रणोदित होकर हम लोग अपने व्यक्तिगत और समष्टिगत
जीवन को नियन्त्रित कर रहे थे उस भाव-स्रोत की तरंग यद्यपि एक ही स्थान से
आती थी तथापि उसने विभिन्न आधारों में अपनी विचित्रता की महिमा को
स्थिर रखा था । हमारे आदर्श सम्बन्धी छोटी-मोटी बातों के झगड़ों में कितनी
ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं; एक व्यक्ति दूसरे को कुछ-
कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता तब उषा की लालिमा, अधखिले
फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में देख पड़ती थी । रास्ता चलते-चलते जब नींद से
अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगतीं तभी मालूम होता था कि इतनी
थकावट हुई है । रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट जाना पड़ता था और
सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलोचना का प्रसंग दुबारा
बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता था; और कभी-
कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब योग की वह भावना आकर
हम पर प्रभाव जमा लेती थी । इस प्रकार भाव और कर्म के मोहक आवेश में
हमारा विचित्र जीवन व्यतीत और गठित होता जाता था ।
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फ़ौज की बारकों में
काशी में वापस आने पर दादा से ज्ञात हुआ कि काम मजे में होता जा रहा
है। उन्होंने कहा, "आज ही दोपहर के बाद अमुक बाग़ में एक सिपाही आने-
वाला है, तुम आज वहाँ जाना ।" यह भी सुना कि वह पलटन काशी से बदल
गई है और उसकी जगह पर नई पलटन आई है। मैं दोपहर के बाद उसी बाग़ में
पहुंचा। उस बाग़ मे मुझे एक मित्र ले गए थे। मैंने रास्ते में उनसे पूछा कि दल
का परिचय इन लोगों के साथ किस प्रकार हुआ ? मित्र ने बतलाया कि "ये लोग
बाजार में सौदा लेने आते थे; एक दिन छावनी की ओर जाते समय, रास्ते में
आते इन्हें देखा । तब हम लोग भी इनसे बातचीत करते हुए शहर की तरफ़ लौट
पड़े । रास्ते में वर्तमान युद्ध-सम्बन्धी बहुत-सी बातें भी हुईं। हिन्दू-मुसलमानों से
सम्बद्ध बहुतेरी बाते भी हुईं । हिन्दुओं का वर्तमान दुर्दशा और अधःपतन की
चर्चा करते-करते हम लोग बस्ती मे आ पहुँचे । इस प्रकार पहले दिन जान-
पहचान हो चुकने पर उनका नाम-धाम पूछ लिया गया और कहा गया कि आपसे
जरूरी काम है इसलिए किसी दिन तकलीफ़ कीजिएगा । बस, उस दिन इतनी
ही बातचीत हुई। दूसरे दिन वे लोग फिर गंगा नहाने के लिए बस्ती में आए ।
उस दिन हम लोगो ने उनको अपनी भीतरी बातें कह सुनाईं। बहुत कुछ बातचीत
हो चुकने पर उन्हें समझाया गया कि वर्तमान युद्ध में, विदेश मे जाकर विधर्मियों
के भले के लिए प्राण देने की अपेक्षा स्वदेश मे स्वधर्म के लिए प्राण देना हजार दर्जे
अच्छा है। इसका उन पर बहुत अच्छा असर पड़ा। आसानी से काम बन गया ।
पलटन में जाकर अपने बेडेवालो से इस विषय की बातचीत करके वे आज मिलने
को आने वाले है ।" थोड़ी ही देर बाट जोही थी कि देखा, एक मनुष्य हाथ मे
सौदा लिये चला आ रहा है। मित्र ने कहा, "यही तो हैं।" ये सिर से पैर तक
सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे, मानो भीतर की विशुद्धता बाहर भी प्रकट हो रही थी ।
इनसे बातचीत करके मैं बहुत ही आनन्दित हुआ । हिन्दुओं की स्वभाव-सिद्ध
नम्रता मानो इनकी देह में भिदी हुई थी । इनमे एक उत्फुल्लता और उत्साह का
भाव मैंने देखा, किन्तु उत्तेजना इन्हें छू तक नही.गई थी । उस दिन इनके साथ
सीधे बारक में जाकर और इनकी चारपाई पर बैठकर बहुत बातचीत हुई । हम
लोग इनकी चारपाई पर बैठकर बाते करने लगे और ये हमारी खातिर के लिए
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समीप के बाज़ार से मिठाई मँगाने का इन्तज़ाम करने लगे ।
उस दिन अपने जीवन में पहले-पहल अंग्रेजों की फ़ौजी बारक में मैंने क़दम
रखा था। इससे पहले इन फ़ौजी बारकों के कितने ही अस्फुट रहस्य मन में न
जाने कितनी बार कितनी ही सूरतों में देख पड़ते थे। आज उसी फ़ौजी बारक
में बैठे रहने पर भी ऐसा लगता था कि मानो वे सब रहस्य हमारे आस-पास
चक्कर काट रहे हैं। बीच-बीच में ऐसा प्रतीत होने लगा कि बहुत पुराना सुख-
स्वप्न मानो इस छावनी की बारक में लिपटा हुआ है।
लम्बी बारक के बीच में दोहरी कतार में सिलसिले से चारपाइयां बिछी हुई
हैं। कोई तो चारपाई पर बैठा इधर-उधर की बातें मार रहा है, कोई पुस्तक पढ़
रहा है और कोई किसी काम से बारक में आता-जाता है। हम लोग परिचित
सिपाहियों से उमंग के साथ बातचीत कर रहे थे सही; किन्तु मन में एक ही साथ
डर, अचरज और आनन्द की विचित्र हलचल मची हुई थी। हमारे लिए मिठाई
मँगाने का जब ये इन्तज़ाम करने लगे तब पहले तो हम लोगों ने इन्हें रोका कि
अजी, मिठाई की क्या ज़रूरत है, रहने भी दीजिए; किन्तु इनका आग्रह देखकर
अन्त में चुप हो जाना पड़ा। इधर जब मिठाई के आने में विलम्ब होने लगा तब
बीच-बीच में खटका होने लगा कि ज़रूर कुछ-न-कुछ दाल में काला है। शायद
किसी अजगर को हमारी खबर देने के लिए कोई दौड़ाया गया है। थोड़ी ही देर
में आस-पास के सिपाहियों ने हमारी चारपाइयों पर आकर हमारे साथ बातचीत
छेड़ दी। बारकों में हम लोगों ने अपने को राजपूत क्षत्रिय बतलाया था। सिर्फ़
राजपूतों ही के लिए बनारस में एक स्कूल और कालेज था। वहाँ राजपूतों के
सिवा और कोई पढ़ने न पाता था और न वहाँ के बोर्डिंग में ही रहने पाता था।
अपने पूर्व-परिचित सिपाही की बात के अनुसार हमने इन लोगों को बतलाया कि
हम लोग उक्त राजपूत कालेज के छात्र हैं। सिपाहियों द्वारा नाम-धाम पूछा
जाने पर हमने बड़े तपाक से अमरसिंह और जगतसिंह प्रभृति नाम बतला दिए।
किन्तु मन में धुकुर-पुकुर होने लगी कि कहीं हमारा असली स्वरूप प्रकट न हो
जाय। यह बतलाने की ज़रूरत ही नहीं कि वहाँ पर हम लोग बंगाली लिबास
में नहीं गए थे। हममें से एक के सिर पर तो साफ़ा था और दूसरे के सिर पर
थी टोपी। पहनावा भी संयुक्त प्रांतवासियों जैसा था। मुझसे साफ़ा बाँधते न
बनता था, इसलिए मैं अक्सर टोपी से ही काम लेता था।
हमारे पूर्व-परिचित सैनिक ने एक हवलदार से परिचय करा देने का वादा
किया। इस हवलदार से ये हमारी चर्चा पहले ही कर चुके थे और हवलदार भी
हमारे प्रस्ताव के पक्ष में हो गया था। थोड़ी देर बाद हवलदार से हमारा परिचय
हुआ। इसका नाम दिल्लासिंह था। इसने हमसे कुछ झिझकते हुए बातचीत की
और थोड़ी देर मे यह कहकर कहीं चल दिया कि एक काम करके आता हूँ।
दिल्लासिंह उसी समय से हमें कुछ भला न जँचा और जब वह काम का बहाना
करके खिसक गया तब मैंने डरते-डरते पूर्व-परिचित सैनिक से धीरे से पूछा कि
फ़ौज की बारकों में / 73
दिल्लासिंह पर पूरा भरोसा किया जाय ? कुछ खटका तो नही ?” तब उक्त
सैनिक ने उसकी ओर से बेफ़िक्र रहने को कहकर उसे भला आदमी बतलाया । मैंने
उस दिन भी यह बात किसी से नही छिपाई थी कि दिल्लासिंह मुझे भला आदमी
नही जंचता । उस दिन दिल्लासिंह जब तक वहां लौट नही आया तब तक हर
घड़ी-पल पर मैं अपने मित्र से कहता था कि “क्योंजी, अब तक आया नही, कहाँ
गया ?” और एक-दूसरे की ओर देख-देखकर हम दोनों परस्पर मुस्कराते थे ।
जो हो, हमारा सन्देह जाता रहा, उस दिन तो दिल्लासिंह दुबारा लौट आया ।
उस दिन मामूली बातचीत करते-करते शाम हो गई, फिर हमसे एकान्त में बातें
करने के लिए दिल्लासिंह उस पूर्व-परिचित सिपाही को लेकर हमारे साथ-साथ
बारक के बाहर चला आया । दिल्लासिंह ने हमारे प्रस्ताव को मान लिया और
कहा कि हम बारक के कुछ अन्य सिपाहियो से भी बातचीत कर रखेंगे । दिल्ला-
सिंह के लौट जाने पर भी पूर्व-परिचित सैनिक महोदय और भी थोड़ी देर तक
हमारे पास बने रहे । अब दिल्लासिंह के ऊपर हमारे शक करने पर इन्होने
हमसे फिर उसकी ओर से बेखटके रहने को कहा । तब यह सोचकर मन में
आनन्द हुआ कि चलो, एक हवलदार तो दल मे आ गया । इस रीति से इस फ़ौजी
बारक में हमारा आवागमन आरम्भ हुआ और एकाध महीने के भीतर हम यहाँ
कम से कम दस-बारह बार आए-गए । इन सिपाहियो में से कुछ लोग शहर मे
हमारे डेरे पर भी आए थे और तब, हम लोगों ने भी इन्हें हर मर्तबा रसगुल्ला
आदि कई प्रकार की बंगाली मिठाई खिलाकर खुश किया था ।
मालूम होता है कि समूचे भारत मे ऐसा एक भी शहर न था जहाँ स्वदेशी
आन्दोलन और बम के गोले के दल का बात किसी को मालूम न हो । हम
लोगों ने इन सिपाहियों को अपने घर बुलाकर बम के गोले, रिवाल्वर और
मोज़र पिस्टल आदि के दर्शन कराकर विश्वास करा दिया कि वास्तव मे हम
लोग भी उल्लिखित दल के सदस्य हैं । इस प्रकार कुछ दिनों तक आवाजाही
होने पर इनको बतलाया गया कि पंजाब की फ़ौज मे भी विप्लव की तैयारी
जोरों से हो रही है । हम लोग बखूबी जानते थे कि इन लोगों को भेद की सारी
बाते सुना देने से क्या अनर्थ हो सकता है, क्योकि इन लोगों के ज़रिए यदि
सरकारी पक्ष को हमारी गदर की तैयारी का तनिक भी पता मिल जाता तो
पंजाब का सब किया-कराया मिट्टी मे मिल जाता । किन्तु इनसे दुराव रखने मे
भी तो सुभीता न था, जब इनसे कहा गया कि “यदि हमारी बातो पर विश्वास
न हो तो तुम अपने किसी आदमी को कुछ दिनों के लिए पंजाब भेज दो, हम उन
रेजिमेंटों से इसकी जान-पहचान करा देगे जिन्होंने कि प्रस्ताव को मान लिया
है ।” तब हमारी बात पर इन्हें बहुत कुछ विश्वास हो गया । इस प्रकार धीरे-धीरे
तीन-चार हवलदारों और सिपाहियो से हमारा परिचय हुआ ।
हम लोग ज्यादातर शाम को या अंधेरा हो जाने पर बारको में जाते थे किन्तु
दो-एक बार दिन को दोपहर के वक़्त भी जाना पड़ा है । इसी प्रकार एक दिन
74 / बन्दी जीवन
हम दो व्यक्ति बारक के समीप घने पेड़ों की छांह में बाट जोह रहे थे और हमारे
बीच का एक व्यक्ति बारक में दो-एक सिपाहियों को बुलाने गया था। देर तक
राह देखने पर भी जब हमारा साथी नहीं लौटा तब हम लोग दुचित्ते हो गए और
डर लगने लगा कि कहीं कोई विपत्ति तो नहीं आ गई। तब तो फिर यहां इस
प्रकार, प्रतीक्षा करना भी युक्तिसंगत नहीं। किन्तु अपने साथी को ही किस प्रकार
छोड़कर चल दें ? ऐसी-ऐसी बहुतेरी बातों पर हम सोच-विचार करने लगे।
डर तो हम लोगों को खूब लगता था किन्तु डर के मारे हम लोगों के हाथ-पैर
नहीं फूल गए, हमारा तो विश्वास है कि,विषाद की तनिक-सी भी कालिमा हमारे
चेहरे पर नहीं आने पाई। और हम ही बारक में कितनी ही बार आए-गए हैं, किन्तु
खटके ने एक भी बार साथ नहीं छोड़ा, फिर भी हम प्रत्येक बार साफ निर्विघ्न
लौट आए। लौटने पर सोचते थे कि चलो, आज का दिन तो निर्विघ्न व्यतीत
हुआ; किन्तु फिर भी कई बार बारकों में आना-जाना पड़ा। जो हो, देर तक
बाट जोहने पर भी जब मित्र महोदय न लौटे तब सोचा कि क्या सचमुच आफ़त
ने घेर लिया ! फिर सोचा कि हम लोग बंगाली हैं, हाथ में टोपी और साफ़ा है,
बारक के पास ही पेड़ की छांह में हम भले आदमी के लड़के बैठे हैं, इन घने
पेड़ों की क़तार के पास से ही ग्रैण्डट्रंक रोड गई है, जो कोई हाकिम-हुक्काम हमें
यहां पर इस दशा में बैठा हुआ देख ले तो क्या समझेगा ? हम ऐसी ही उधेड़-
बुन में थे कि मित्र महोदय को दो सिपाहियों के साथ अपनी ओर आते हुए देखा।
अतः हमारे सिर से बड़ा भारी बोझा-सा उतर गया। इसके पश्चात् इस बारक
के पास दो-एक बार सबेरे के समय भी आया हूँ, उस समय सिपाही लोग परेड पर
क़वायद करते थे। अपने ही परिचित एक हवलदार को सेना-परिचालन-कार्य
करते देखकर ऐसा लगा कि रेजिमेंट मानो हमारी ही है, हमारे उद्देश्य की
सफलता के लिए ही मानो यह सारी तैयारी की जा रही है। सामने से दो-एक
अंग्रेज़ अफ़सर घोड़े पर बैठे हुए निकल गए, किन्तु किसी ने हम लोगों
की ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय तो किसी के मन में रत्ती-भर भी सन्देह
न था।
एक दिन की बात का मुझे खूब स्मरण है। उम समय पंजाब का दुबारा
चक्कर लग चुका था। विप्लव की तैयारी पूरी होने को थी। एक दिन उन्हीं घने
पेड़ों के नीचे बैठकर, गारों की फ़ौजी बारक के बिलकुल ही समीप, अंग्रेज़ों के ही
राज्य को उलट देने के लिए कैसी भीषण गुप्त योजना की गई थी। उस दिन कोई
तीन हवलदार और नायब हवलदार तथा कुछ सिपाही, शाम होने पर, उन्हीं पेड़ों
के नीचे एकत्र हुए। हम लोग भी तीन व्यक्ति थे। इन पेड़ों की क़तार के एक
ओर रेल की पटरी है और दूसरी ओर है ग्रैण्डट्रंक रोड। इसी ग्रैण्डट्रंक रोड के
बग़ल में थोड़ा-सा मैदान छोड़कर सेना की बारकें हैं। कुछ सिपाही सड़क के
किनारे पेड़ों की ओट में इसलिए बैठे हुए थे कि यदि किसी को उस ओर आते
देखें अथवा ऐसा ही कुछ और खटका हो तो उसी दम हम लोगों को सावधान
फ़ौज की बारकों में / 75
कर दें। हम लोग भी यथासम्भव वृक्षों की ओट में बैठकर आसन्न-विद्रोह का
दिन, समय और अन्यान्य छोटी-मोटी बातों पर विचार कर रहे थे। बीच-बीच में
ये लोग शंकित-चित्त से इधर-उधर देख लेते थे। उस दिन मानो कई युगों की
संचित काल्पनिक वीर मूर्तियां, कलेवर धारण करके, उस अँधेरे में परछाईं की
तरह हमारे आगे देख पड़ीं थीं। सन् 1857 के गदर के पश्चात् फिर उसी तांडव
नृत्य की जंगी तैयारी का विचार करके देह और मन सचमुच ही पुलकित और
रोमांचित हो रहे थे। पलटन के लोग बड़ी ही आन्तरिकता के साथ हम लोगों से
बातचीत कर रहे थे। इस प्रकार घने पेड़ों के नीचे गुप्त रूप से हम लोगों को
सलाह करते समय, यदि सिपाहियों में से ही कोई जाकर अपने ऊँचे अफ़सरों को
इसकी इत्तिला दे आता तब तो कोर्ट मार्शल में इन सबकी जान के लिए बड़ी
मुसीबत पड़ती। यही कारण था कि उस दिन पेड़ों के नीचे आकर वे लोग इस
प्रकार चौकन्ने थे। किन्तु मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका, क्योंकि इस प्रकार की
तैयारी में छिपने-छिपाने का भाव बड़ी आसानी से ताड़ लिया जाता था और
इसीलिए मैंने वृक्षों की ओट में इस प्रकार छिपने के उद्योग का विरोध किया तथा
इस प्रकार संदिग्ध भाव से बार-बार इधर-उधर ताकने को भी मना किया। हम
लोग कहीं भी जब इस प्रकार सलाह करने के लिए आपस में एकत्र होते थे तब
इस बात पर हम सबका सदा ही ध्यान रहता था कि सहज-सरल भाव ही हममें
बना रहे; किसी प्रकार की चंचलता न आने पाए। किन्तु उस दिन मना कर
देने पर भी जब सिपाहियों ने मेरी बात न मानकर इस तरह चौकन्ने रहने मे
ही भला समझा तब मेरे मन में यही आया कि ये लोग यों ही भोले-भाव से और
अत्यन्त आग्रह की प्रेरणा से यहाँ चले आए हैं; इस विप्लव की तैयारी मे ये जी-
जान से शामिल हैं और इस तरह हमारे पास आने-जाने मे अपनी जान को
जोखिम में समझते भी हैं लेकिन—'ओखली में सिर दिया तो मूसल की चोट
का डर ही क्या ?' ऐसी भावना से ही ये लोग हमारे पास आने और विप्लव
की तैयारी की सलाह करने में हिचकते नही। इस तरह वे न जाने कितनी बार
हमारे पास आए होंगे।
इधर तो फ़ौजी बारकों में पहुँच हो गई और उधर बंगाल से लौटने पर
कुछ ही दिनों में, अमेरिका से लौटे हुए एक महाराष्ट्री युवक के आ जाने से,
पंजाब के साथ और भी घना सम्बन्ध करने का नया ज़रिया मिल गया। इन
महाराष्ट्री युवक का नाम पिंगले था। इनका पूरा मराठी नाम इस समय मुझे
याद नही। स्वदेश को वापस आते समय इन्होंने जहाज़ पर ही निश्चय कर
लिया था कि पहले बंगाल के विप्लवपन्थी दल का बंगाल में पता लगाएँगे, तब
पंजाब जाएँगे। कलकत्ता में विप्लव दल के कई लोगों मे इन्होंने भेंट की। इससे
पंजाब में विप्लव की तैयारी होने की बात कलकत्ता-भर में फैल गई। इधर
इनके कुछ मित्रों के साथ हमारे दल का भी सम्बन्ध था और इसी नाते पिंगले
हमारे दल में आ गए। हमारे दल में आते ही ये सीधे काशी भेज दिए गए।
76 / बन्दी जीवन
पिंगले ने कलकत्ता में बहुत लोगों से बमगोले मांगे थे। उस समय समूचे
बंगाल को प्रधानतया हमारे केन्द्र से ही बमगोले मिलते थे। अतएव बमगोलों
के लिए हम लोगों से पिंगले का घना सम्बन्ध हो गया।
काशी में इन्हीं दिनों हमारे मन में यह आशंका हो रही थी कि शायद अब
हमारा सम्बन्ध पंजाब से जुड़ना कठिन हो जाय; क्योंकि पाँचवीं दिसम्बर को
पृथ्वीसिंह काशी आनेवाले थे, किन्तु न तो उनके दर्शन हुए और न पंजाब का ही
समाचार मिला। ऐसे अवसर पर पिंगले के मिल जाने से ऐसी प्रसन्नता हुई मानो
कुबेर का धन हाथ लग गया हो। पिंगले के आ जाने से हम लोगों को सचमुच
बड़ा आसरा मिल गया। इनकी देह समुन्नत और बलिष्ठ थी, खूब गोरा रंग था
और इनकी आँखों तथा चेहरे से सुतीक्ष्ण बुद्धि झलकती थी। इस बुद्धिमत्ता ने
उस दिन हमारे मन में खास जगह कर ली थी। इन्हें देखने और इनसे बातचीत
करने से हम लोगों को पक्का विश्वास हो गया था कि इनके हाथों हमारे कई काम
सिद्ध होंगे, किन्तु सच तो यह है कि मनुष्य को पहचान लेना बड़ा कठिन काम
है।
मनुष्य जीवन का आदर्श कैसा हो—इस सम्बन्ध में पिंगले के साथ बहुतेरी
बातें होते-होते न जाने किस तरह गीता की चर्चा छिड़ गई और उस समय जब
उन्होंने गीता के कुछ श्लोक पढ़कर सुनाए तब हम लोगों को ज्ञात हुआ कि गीता
इन्हें कण्ठस्थ है। उन्होंने स्वयं कहा कि 'जब हम साधु हो गए थे तब अठारहों
अध्याय गीता मुखाग्र थी।' इस पर उनके जीवन का थोड़ा-बहुत पिछला इतिहास
जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होंने कोट इत्यादि उतारते-उतारते विस्तार-
पूर्वक बतलाया कि वह किस प्रकार साधु होकर भारत के विभिन्न स्थानों में
विचरते रहे, फिर किस तरह मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अमेरिका
गए और वहाँ इस विप्लवदल में भर्ती हो गए।
8
पंजाब की कथा
पिंगले के जीवन की पिछली बातों का आज मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं।
आज तो इतना ही याद पड़ता है कि साधु होकर उन्होंने समूचे भारत की
यात्रा की थी और फिर अमेरिका के मैकेनिकल इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते समय
वहाँ के विप्लव दल में सम्मिलित हो गए थे; किन्तु यह नहीं मालूम कि वह
किसलिए साधु हुए और क्यों इंजीनियर हुए और इसके पश्चात् किम तरह गदर-
पार्टी में शामिल हुए ? शायद स्वयं पिंगले ने भी इस विषय में और कुछ नहीं
बतलाया था ।
इस अध्याय में जो बातें मुझे कहनी हैं उनमें से बहुतेरी बातें आज स्मृति में
धूमिल हो गई हैं, इससे शायद कुछ बातें लिखने से रह जायें । ऐसा लगता है कि
इस भूल जाने और याद रहने के साथ हमारी प्रकृति का घना सम्बन्ध है । हमारे
स्मृतिपट पर कितनी ही बड़ी-बड़ी चीजें छोटा रूप धारण कर लेती हैं और छोटी
चीजें बड़े रूप में आ जाती है, फिर बहुतेरी बातो को न जाने हम किस तरह भूल
ही जाते है। इसका कारण यह मालूम होता है कि जो बात हमारे स्वभाव के
अनुकूल है, जिसका हमारी प्रकृति से मेल मिलता है वह चाहे कोई घटना हो या
कोई दार्शनिक मत अथवा चाहे कुछ और हो, वह तो हमारे चेतन अथवा अव-
चेतन में भी स्मृति-पट पर चित्र की भाँति अपने आप अंकित हो जाती है । परन्तु
जो बात हमारे स्वभाव के प्रतिकूल होती है उसे या तो हम भूल जाते हैं या केवल
खण्डन करने के लिए ही याद रखते हैं और खण्डन करने मे जिन युक्तियों तथा
घटनाओं से हमें सहायता मिलती है उन्हें भी हम अपनी अवस्था और अभिज्ञता
के अनुरूप याद रखते हैं ।
मुझे याद आता है कि अण्डमन द्वीप में रहते समय एक दिन रामेन्द्र बाबू की
'विचित्र प्रसंग' नामक पुस्तक पढ़ने से बिलकुल इसी ढंग के अनेक प्रकार के
विचार मन मे गम्भीर भाव से फैल गए थे और उनको मैंने अपनी नोट-बुक में लिख
रखा था । उन्हें मैं उपेन्द्र दादा (उपेन्द्रनाथ बनर्जी जो कि 'युगान्तर' के सम्पादक
थे और जिन्हें अलीपुरवाले मामले में काला पानी हुआ था) को प्रायः दिखलाता
था और वह उनकी तारीफ़ करते तो इमसे मन में बड़ा आनन्द होता था ।
अण्डमन की बातें जहाँ लिखी जाएँगी वही बतलाया जाएगा कि मेरी वह नोट-
78 / बन्दी जीवन
बुक किस तरह नष्ट हुई ।
हमने पिंगले को दो-एक दिन काशी में ठहराकर पंजाब भेज दिया। उनका
अनुरोध था कि पंजाब में हम उनके पास बेहिसाब बमगोले भेज दें, अतएव उनसे
कहा गया कि गोले तो भेजे जा सकते हैं किन्तु एक-एक बमगोले के बनवाने में
सोलह रुपये के लगभग खर्च बैठता है, इसलिए रुपये की मदद मिले बिना
बेहिसाब बमगोलों का भेजा जाना कठिन है। इनसे पृथ्वीसिंह और करतारसिंह की
भी चर्चा कर दी गई। अब रुपये लाने और पंजाबियों का कच्चा हाल जानने के
लिए पिंगले पंजाब को गए। पिंगले के पास इनके कुछ साथियों का पता-ठिकाना
था। लगभग एक हफ्ते में ही ये काशी लौट आए। अब रासबिहारी की पंजाब-
यात्रा में भी कुछ रोक-टोक न थी। किन्तु उनके जाने के पहले मैं एक बार फिर
पिंगले के साथ पंजाब हो आया।
दिसम्बर महीने के एक सबेरे खासी ठंड पड़ रही थी जब मैं साधारण हिन्दु-
स्तानी के लिबास में पिंगले के साथ अमृतसर पहुँचा। मैं तो पंजाबी भाषा बोल
न सकता था किन्तु पिंगले को इसका अभ्यास था। हम लोग एक गुरुद्वारे में
जाकर ठहरे। यहाँ पर पिंगले ने एक पंजाबी मुखिया से मेरा परिचय कराया।
इनका नाम मूलासिंह था।
मूलासिंह संघाई के पुलिस विभाग मे नौकर रह चुके थे और वहाँ पर भी
पुलिस के हड़तालियों के मुखिया बने थे। इस बार उन लोगों से भी मेरा परिचय
हुआ जो कि पिनांग में नौकर रह चुके थे। इस समय मैंने बहुत से देहाती सिक्खों
को यहाँ आते-जाते देखा था। ये अधिकतर किसान या मजदूर थे, किन्तु ये भी
देश का काम करने के लिए मतवाले हो रहे थे। सिक्ख सम्प्रदाय की ऐसी ही
शिक्षा-दीक्षा है। इनमें से बहुतेरों की देह खासी गठीली और कसी हुई थी।
इस बार मैने मूलासिंह को एक केन्द्र बनाने की आवश्यकता भली भांति
समझाई और इसके अनन्तर इन्ही ने केन्द्र का भार ग्रहण किया। किन्तु यदि ये
केन्द्रपति न बनते तो बहुत अच्छा होता।
पंजाब के विभिन्न स्थानो से आए हुए कार्यकर्ता लोग इस समय हाथ मे कुछ
काम न होने और खाने-पहनने का सुभीता न रहने के कारण कुनमुना रहे थे और
इनमे से बहुतों के दिल में एक तरह से असन्तोष की आग धधक रही थी। इसका
दायित्व प्रधानतया मूलासिंह पर ही था। ये सब लोग जी लगाकर देश का काम
करने के लिए दूर-दूर से घर-द्वार और अपना काम-काज छोड़कर आये हुए थे।
इनमे से कोई भी जीविका के लिए कुछ उद्योग नही करता था और उस समय
जैसी दशा थी उसके लिहाज़ से उद्योग करने का कुछ सुभीता भी न था। यदि दो
रोटियों के लिए शाम-सवेरे नेताओ से तकाजा करना पडे तो ऐसी स्थिति मे काम
करने मे सचमुच सभी का चिढ जाना सम्भव है। बेचारे ये सभी लोग गुरुद्वारे में
तो रहते और पास के होटल में खाते थे। अपने यहाँ देश का काम करने की इस
दशा मे अक्सर इस तरह की मामूली छोटी-छोटी बातो ने बहुतो के दिलो को
दुखाया है और इसके फलस्वरूप कई अवसरो पर बहुत-कुछ अनर्थ भी हुए हैं।
इससे कई बार यह विचार आता है कि जब तक गांठ में काफ़ी रकम न हो तब
तक दूसरों की दी हुई रोटियों के भरोसे देश का और दस भाइयो का कार्य करने
को तैयार होना ठीक नही। फिर यह भी देखा है कि आर्थिक स्वाधीनता प्राप्त
करने की चेष्टा में प्रायः अर्थोपार्जन करना ही मुख्य काम हो जाता है और तन-
मन से देश का काम न किया जाय तो प्रायः कुछ भी नही होता। इसके सिवा
काम न रहने से भी बहुत मे दल नष्ट हो चुके हैं। इस समय पंजाब में उपयुक्त
नेता न रहने के कारण वहाँ बहुतेरे कार्यकर्ता हाथ पर हाथ रखे बेकार पडे थे, काम
न किया जाने के कारण देश चौपट हो रहा था और मज़ा यह कि काम करनेवालों
को खोजने पर भी काम न मिलता था। रासबिहारी ही एक ऐसे 'नेता' थे जिन्होंने
इस उतावले जनसघ को कुछ परिमाण मे सुनियन्त्रित कर लिया था। मैंने भी इस
गोलमाल को सुधारने की भरसक कोशिश की थी। मूलासिंह से मुझे मालूम हुआ।
कि विद्रोह होने पर बहुत-सी रेजिमेटो ने देशवासियो के अनुकूल हो जाने का
वचन दिया है। जिन पलटनो मे इस समय तक अपने आदमी नही भेजे गए थे
उनकी मैंने एक फेहरिस्त बनाई और विभिन्न प्रदेशो से आए हुए पंजाबी कार्य-
कर्ताओ को उल्लिखित पलटनो मे भेजने की व्यवस्था की।
मूलासिंह से मेरा परिचय कराके पिंगले अन्यान्य परिचित सिक्खो की तलाश
मे 'मुक्तसर' के मेले को गए। इस मुक्तसर के मेले का थोडा-सा अद्भुत इतिहास
पाठको को सुनाए बिना मुझमे नही रहा जाता।
एक बार 'आनन्दपुर' के किले मे गुरु गोविन्दसिंह अपने परिवार और
अन्यान्य लोगो के साथ शत्रु मुमलमान सेना द्वारा घेर लिये गए। यह घेरा लगातार
सात महीने तक रहा। घेरे के कारण दोनो दल—जो किले मे घिरे हुए थे, और
जो लोग बाहर से घेरा डाले हुए थे—बहुत ऊब गए। मुसलमानो की ओर मे
बार-बार गुरु से 'आनन्दपुर' छोडकर चले जाने का प्रस्ताव किया गया किन्तु गुरु
ने इसे नही माना। गुरु को उम प्रस्ताव पर किसी भी तरह राजी न होते
देख, बाहर जाने की इच्छा से कुछ सिक्खो ने गुरुजी की स्त्री गुजरी को
यहाँ मे हट जाने के प्रस्ताव पर राजी कर लिया, किन्तु गुरु गोविन्दसिंह इतने
पर भी अपने निश्चय से विचलित न हुए। भूख के कारण बहुतेरे सिक्ख अधीर
हो रहे थे। पेट की ज्वाला के कारण उम समय वे गुरु की आज्ञा टालने पर
उतारू हो गए। तब गुरु गोविन्दसिंह ने कहा—"तुम लोग अब तक सिक्ख गुरु
के आश्रय मे थे, किन्तु अब भूख के मारे बेचैन हो, गुरु का वाक्य उल्लंघन करके
शत्रुओ के हाथ मे आत्म-समर्पण करने जा रहे हो। इसमे सिक्ख गुरु की कोई
जवाबदारी नही है। अतएव इसके लिए 'बे-दावा' लिखकर चाहे जहाँ चले
जाओ।" और सब सिक्ख तो इस प्रकार 'बे-दावा' लिखकर गुरु को वही छोडकर
चलते हुए किन्तु चालीस सिक्खो ने गुरु का साथ नही छोडा। अन्त मे गुरु गोविन्द-
सिंह को भी यह स्थान छोड़ना पडा और शत्रु के पीछा करने पर वे अनेक
80 / बन्दी जीवन
स्थानों में बचाव के लिए दौड़-धूप करने लगे। किन्तु उन चालीस सिक्खों ने
किसी भी दशा में गुरु का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रकार घूमते-फिरते हुए गुरु
गोविन्दसिंह जब भद्र देश में पहुँचे तब उन 'बे-दावा' सिक्खों में से बहुतों ने
आकर गुरु से भेंट की। अब इन्होंने शत्रु से सन्धि करने के लिए गुरुजी से दोबारा
अनुरोध किया। इस पर गोविन्दसिंह ने कहा—"जो तुम चाहो तो यह लिखकर
चले जा सकते हो कि हम सिक्ख नहीं हैं।" तब 'हम सिक्ख नहीं हैं' यह बात
लिखकर और वह पत्र गुरुजी को देकर चालीस सिक्ख चले गए। किन्तु इस संकट
के समय श्रीगुरु को छोड़कर चले जाने के कुछ ही देर बाद उन लोगों के मन में
बड़ा पछतावा हुआ। इधर 'खेदराना' नामक तालाब के समीप शत्रु-दल ने फिर
गुरु गोविन्दसिंह पर हमला किया। घोर संग्राम करते-करते गुरु ने देखा कि किसी
ओर से एक दल ने आकर शत्रु-पक्ष पर धावा बोल दिया है। गुरु गोविन्दसिंह
की समझ में न आया कि इस विपत्ति के समय में हमारी सहायता करने यह कौन
आ पहुँचा है। इन नए आये हुए योद्धाओं की मार के आगे मुसलमान तो ढीले
पड़ गए परन्तु ये सब थोड़ी देर युद्ध करके प्रायः सभी जूझ गए। इस युद्ध में एक
मुसलमान के बल्लम से निहत एक व्यक्ति की लाश उठाकर देखी गई तो वह
लाश एक स्त्री की निकली इसका नाम माई भागो था। इसी की सलाह और
प्रेरणा से 'बे-दावा' सिक्खों ने अपनी भूल को सुधारने का मार्ग ढूँढ़ निकाला था।
युद्ध का अन्त हो चुकने पर गुरु गोविन्दसिंह रणभूमि में लेटे हुए प्रत्येक मृत सिक्ख
के पास जाकर उसके धूल में लिपटे हुए मुंह को पोंछकर वैसे प्यार और आदर
का व्यवहार कर रहे थे जैसाकि पिता अपने पुत्र का करता है। अन्त में उन्होंने
देखा कि एक व्यक्ति में उस समय तक प्राण थे। इसका नाम महासिंह था। महा-
सिंह के मस्तक को अपनी गोद मे रखकर और उसके सिर पर हाथ फेरते-फेरते
गुरु गोविन्दसिंह ने पूछा—'महासिंह, तुम क्या चाहते हो ?' महासिंह की आंखो
में आँसू भर आए। उसने कहा—"मैं यही चाहता हूँ कि हम लोगो के उस पत्र
को फाड़ डालिए जिसमे हम लोगों ने लिख दिया था कि हम लोग सिक्ख नहीं
हैं।" अब गुरुजी ने समझा कि दूसरी ओर से शत्रु पर किसने हमला किया था।
गुरुजी ने देखा उन चालीसों सिक्खों ने रणक्षेत्र मे प्राण दे दिए हैं। लाशो मे
उन्होंने स्त्रियों की भी लाशें देखीं। अब 'सिक्ख नहीं' वाला पत्र गुरुजी ने फाड़-
कर फेंक दिया। महासिंह भी महानिद्रा मे मग्न हो गया। वहाँ पर जो लोग
उपस्थित थे उनसे गुरु गोविन्दसिंह ने कहा कि 'जिस खालसा' में ऐसे महाप्राण हैं
वह खालसा सहज ही नष्ट नही होगा। जहाँ पर एक भी भक्तप्राण आत्माहुति
देता है वह स्थान पवित्र हो जाता है यहाँ पर तो इतने अधिक महाप्राण व्यक्तियों
ने प्राण दे डाले हैं, इसलिए इस स्थान का नाम 'मुक्तसर' हुआ और यहाँ के
तालाब मे जो कोई स्नान करेगा, वह मुक्त हो जाएगा। इस प्रकार मुक्तसर-मेले
की उत्पत्ति हुई। यह सिक्खों का महामेला है। यहाँ पर हर साल एक लाख से
अधिक सिक्खों का जमाव होता है। सिक्खों के प्रत्येक उत्सव के साथ ऐसे एक-
पंजाब की कथा / 81
न-एक अपूर्व इतिहास की कथा संलग्न है और हरेक एक सिक्ख का ऐसे उत्सव
और उमंग के बीच लालन-पालन होता है तथा ऐसे ही वातावरण मे वह
मनुष्य बनता है। मेरी समझ से तो सिक्ख जाति भारत की एक अपूर्व वीर
जाति है।
पिंगले जिस समय 'मुक्तसर' के मेले से लौटकर आए उस समय करतारसिंह,
अमरसिंह आदि सभी गुरुद्वारे मे उपस्थित थे। मुझे देखकर करतारसिंह बहुत ही
प्रसन्न हुए और पूछा कि "बोलो, रासबिहारी कब आएँगे ?" मैंने कहा- "बस,
अब उन्ही का नम्बर है; यहाँ ठहरने के लिए कुछ इन्तजाम हो जाए और आपका
काम भी तनिक सिलसिले से होने लगे, बस फिर उनके आने मे देर नही।" इस
समय मैंने करतारसिंह को केन्द्र की आवश्यकता विशेष रूप से समझाई और यह
भी कहा कि केन्द्र का भार मूलासिंह ने ग्रहण कर लिया है। रासबिहारी के लिए
अमृतसर और लाहौर मे दो-दो किराए के मकान लेने को कह दिया। इन सारी
बातो के सम्बन्ध मे दादा ने मुझसे पहले ही कह रखा था, एक ही समय मे विभिन्न
स्थानों पर कई मकान अपने अधिकार मे होने चाहिए। अतः ऐसा ही किया गया।
अमृतसर का मकान तो मैंने ही देखकर पसन्द किया। लाहौर मे मकान लेने के
लिए दूसरा आदमी भेजा गया। पंजाब की उस समय की दशा का हाल करतार-
सिंह से सुनकर मुझे बहुत कुछ आशा हुई। मैंने सोचा कि इस बार सचमुच कुछ
कहने लायक काम हो रहा है। इस समय सिक्खो का एक और दल अमृतसर मे
आया। यह दल अमेरिका से लौटकर आया था इस दल के कुछ नेताओ को मैने
देखा। इनमे एक तो इतने बूढ़े थे कि उनके गालो मे झुर्रियाँ पडकर लटकने को
थी। मेरा ख्याल है कि ये वही वृद्ध पुरुष थे जिन्होने बाद मे अण्डमन टापू मे भी
बडे तेज के साथ के अपनी थोडी-सी शेष आयु बिताकर साठ या सत्तर वर्ष की
अवस्था मे उसी द्वीप मे जीवन को विसर्जित कर दिया। इस बुढापे मे भी इन्होने
अण्डमन मे हडतालियो के साथ हडताल करने मे कभी पीछे पैर नही रखा। इस
दल का कोई व्यक्ति उस समय अपने घर न पहुँचा था। अमेरिका से भारत मे
आकर अमृतसर मे ही ये लोग ठहरे थे। इन्होने अपनी गाढी कमाई मे से हम
लोगो को पाँच सौ रुपये दिए थे।
इन दिनो करतारसिंह अद्भुत परिश्रम कर रहे थे। वे प्रतिदिन साइकिल
पर बैठकर देहात मे लगभग चालीस-पचास मील का चक्कर लगाते थे। गाँव-
गाँव मे काम करने को जाते थे। इतना परिश्रम करने पर भी वे थकते न थे।
जितना ही वे परिश्रम करते थे उतनी ही मानो उनमे फुर्ती आती थी। देहात का
चक्कर लगाकर अब वे उन पल्टनो मे गए जिनमे कि काम नही किया गया था। इन
लोगो के काम करने का ढंग इतना कच्चा था कि इसमे इस समय इनमे से बहुतो
की गिरफ्तारी के लिए वारंट निकला। करतारसिंह को गिरफ्तार करने के लिए
इस समय पुलिस ने एक गाँव को जाकर घेर लिया। उस समय करतारसिंह गाँव
के पास ही कही मौजूद थे। पुलिस के आने की खबर पाते ही वे साइकिल पर